05 March 2022

अलिफ लैला शहरयार और शहरजाद की शादी की कहानी - Alif Laila The Story of Shahryar and Shehrzad's Wedding

Alif Laila Shaharyar and Shahzads Wedding Story

मंत्री अपनी बेटी शहजाद को कहानी सुनाता है ‘एक समय शहर में बहुत बड़ा व्यापारी हुआ करता था। गांव में उसके कई घर, पशुशालाएं और कारखाने थे। एक रोज वह अपने परिवार के साथ गांव आया और अपनी पशुशाला को देखने गया। जहां एक कोने में खूंटे से बंधा गधा और बैल आपस में बात कर रहे थे। व्यापारी पशु-पक्षियों की भाषा भली-भांति समझता था इसलिए वह कौतूहल से वहां रुक गया और गधे-बैल की बात सुनने लगा।

बैल गधे को अपनी पीड़ा सुना रहा था. वह कह रहा था कि, ‘तू कितना खुशकिस्मत है जो हमेशा मालिक के साथ रहता है। मालिक तेरा ख्याल रखता है, तुझे अच्छा जौ खाने को देता है। बदले में मालिक बस तुझसे इतना ही काम लेता है कि तुझ पर सामान लादकर या खुद बैठकर कभी-कभी कहीं चला जाता है। तेरा जीवन मेरे जीवन से कई गुना अच्छा है’। बैल कहता है, ‘मैं बहुत अभागा हूं। दिन-रात मेहनत करता हूं बावजूद सुबह उठते ही मालिक मेरी पीठ पर हल टांगकर दिन भर मुझे चाबुक मारता और काम कराता है। खाने के लिए भी सूखा भूसा ही मिलता है। गंदगी-गोबर में दिन काटता हूं।’ इतना कहते ही बैल मायूस हो जाता है.

उसे मायूस देख गधा कहता है ‘भाई सच में तुम्हारा जीवन बहुत कष्टकारी है। तुम्हारे साथ अन्याय हो रहा है। मैं तुम्हें मालिक के प्रकोप से बचने का उपाय बताता हूं तुम वही करना, फिर तुम खुशी से रह पाओगे।’ बैल ने तपाक से पूछा ‘क्या सच में ऐसा होगा मेरे दोस्त? जल्दी बताओ क्या तरकीब है।’ गधा कहता है कि ‘तुम एक काम करो अपने आप को बीमार और कमजोर दिखाओ ऐसे में मालिक तुम पर तरस खाएगा और तुमसे ज्यादा मेहनत नहीं करवाएगा।’ बैल को यह तरकीब अच्छी लगी और वह गधे की बात झट से मान गया। व्यापारी वहां खड़े होकर दोनों की बातें सुन चुका था।

अगली सुबह जब हलवाहा खेत जोतने के लिए बैल को लेने गया तो उसने देखा कि बैल अचेत जमीन पर गिरा हुआ है। उसके शरीर में जान नहीं है और वह काफी कमजोर लग रहा है। हलवाहे को कुछ समझ नहीं आया कि अचानक क्या हुआ। वह भागा-भागा व्यापारी के पास आया और बोला ‘मालिक बैल का स्वास्थ्य ठीक नहीं जान पड़ता है। खेत कैसे जोते?’ यह सुनते ही व्यापारी समझ गया कि बैल गधे की तरकीब के अनुरूप बर्ताव कर रहा है। व्यापारी ने चालाकी दिखाई और हलवाहे से कहा कि ‘आज खेत जोतने के लिए गधे को ले जाओ।’

हलवाहा वापस पशुशाला में आया और गधे को लेकर खेत चला गया। गधे ने इससे पहले कभी खेत नहीं जोता था इसलिए दिनभर कड़ी धूप में वह बहुत थक गया। इधर हलवाहा बार-बार उसे कोड़े मार रहा था। शाम होते तक गधे के पांव में जान नहीं बची। किसी तरह दिन गुजरा और गधा वापस पशुशाला पहुंचा। उसे देख बैल बोला ‘भाई तुमने सही तरकीब सुझाया। आज का दिन तो बड़े मौज में बीता’। लेकिन गधा इतना थक चुका था कि कुछ बोल ही नहीं पाया और अपने स्थान पर गिर पड़ा. मन ही मन वह खुद को कोसने लगा कि आखिर क्यों उसने बैल को ज्ञान दिया। बैल की मदद के चक्कर में उसने अपने पैर पर कुल्हाड़ी मार ली।’ ये कहानी सुनाकर मंत्री अपनी बेटी से कहता है, ‘शहजाद तुम क्यों उस गधे की तरह अपने आप को संकट में डालना चाहती हो? क्यों अपना जीवन बर्बाद करना चाहती हो? बेटी, निरंकुश शहरयार से ब्याह की जिद छोड़ दो।’ पिता की कहानी सुनने के बाद भी शहजाद का मन नहीं बदलता और वह शहरयार से विवाह के लिए दोबारा कहती है। मंत्री गुस्सा हो जाता है और कहता है कि ‘अगर तूने अपनी जिद नहीं छोड़ी तो मैं तुझे वह दंड दूंगा जो व्यापारी ने अपनी पत्नी को दिया था.’ शहजाद बोल पड़ती है ‘कौन सा दंड पिताजी? बैल और गधे का क्या हुआ?’

बेटी के पूछने पर मंत्री ने उसे आगे की कहानी सुनाता है। वह कहता है ‘एक रोज व्यापारी रात के भोजन के बाद टहलते-टहलते अपनी पत्नी के साथ पशुशाला पहुंचा। उसने देखा कि आज फिर गधा और बैल आपस में बात कर रहे हैं। वह उत्सुकता से छिपकर उनकी बातें सुनने लगा और पत्नी को भी छिपने को कहा. उसने सुना कि गधा बैल से पूछ रहा है कि ‘कल सुबह जब हलवाहा खेत ले जाने के लिए तुम्हें लेने आएगा तो तुम क्या करोगे?’ बैल जवाब देता है ‘भाई तुमने जो बताया था मैं वैसा ही करूंगा।’ इस पर गधा कहता है ‘ना दोस्त, कल ऐसा न करना। रास्ते में मैंने व्यापारी को कहते सुना था कि कल कसाई आएगा और तुम्हारी खाल ले जाएगा क्योंकि मालिक को लगता है कि तुम बूढ़े हो चुके हो। तुम मेरे दोस्त हो इसलिए मैं तुम्हें आगाह कर रहा हूं बाकी जैसी तुम्हारी इच्छा।’ गधे की बात सुनकर बैल असमंजस में पड़ गया कि वह क्या करें। अंत में उसने कहा कि कल वह बीमार होने का नाटक नहीं करेगा और काम पर जाएगा।

इतने में छिपकर दोनों पशुओं की बातें सुन रहा व्यापारी ठहाके लगाकर हंसने लगा। उसकी पत्नी ने वजह पूछी तो व्यापारी ने महज इतना ही कहा कि वह गधे और बैल की बातें सुनकर हंस रहा है। पत्नी ने उससे कहा ‘आप ये कला मुझे भी सिखाइए। मैं भी जानना चाहती हूं कि पशु-पक्षी आपस में क्या बात करते हैं?’ व्यापारी ने साफ इंकार कर दिया और घर आ गया। पत्नी बार-बार उसे यह कला सिखाने के लिए कहती रही लेकिन व्यापारी मानने को ही तैयार नहीं था उसने कहा कि ‘अगर मैंने तुझे ये विद्या सिखाई तो मैं जीवित नहीं बचूंगा।’ बावजूद पत्नी जिद पर अड़ी रही। वह रात भर नहीं सोई और न व्यापारी को सोने दिया। अगले दिन भी पत्नी की जिद शांत नहीं हुई। कई रोज गुजर गए व्यापारी अपनी पत्नी को समझाता रहा लेकिन मामला खत्म होने की बजाए बढ़ता जा रहा था।

एक रोज व्यापारी परेशान, दुखी मन लिए घर के बाहर बैठा था। उसने देखा कि आंगन में मुर्गा-मुर्गी प्यार भरी बातें कर रहे हैं, जिसे देखकर वहां खड़ा एक कुत्ता उन पर भौंक रहा है. वह मुर्गा-मुर्गी से कहता है, ‘तुम दोनों को लज्जा नहीं आती, हमारे मालिक परेशान हैं और तुम दोनों खुशी मना रहे हो। इस पर मुर्गा कहता है ‘हमारा मालिक मूर्ख है जो एक स्त्री का पति है। मुझे देखो मैं कितना सुखी हूं, यहां की पचास मुर्गियां मेरे अधीन हैं। हमारा स्वामी अगर बुद्धि से काम ले तो एक क्षण में उसकी पीड़ा दूर हो जाएगी।’ कुत्ता कहता है ‘मालिक ऐसा क्या करे?’ मुर्गा कहता है ‘हमारे मालिक को चाहिए कि एक मजबूत लाठी ले और अपनी पत्नी की कोठरी में जाए। पहले मनाएं और तब भी अगर पत्नी हठ न छोड़े तो लाठी से उसकी जमकर पिटाई करें। पत्नी रो-धोकर स्वत: शांत हो जाएगी।’

मुर्गे की बात व्यापारी ने सुनी और उसने वही किया जो मुर्गे ने कहा था। पत्नी की कोठरी में जाकर उसने लाठी से उसकी जमकर पिटाई की। पत्नी लाख चीखती रही, रोती रही, माफी मांगती रही लेकिन व्यापारी तब तक नहीं रुका जब तक पत्नी ने जिद नहीं छोड़ी। शहरजाद पिता के सिरहाने खड़ी ये कहानी सुन रही थी। मंत्री ने कहा कि ‘बेटी अगर तुमने भी अपनी हठ नहीं छोड़ी तो मैं भी तुम्हारे साथ ऐसा ही करुंगा।’ शहरजाद इतने पर भी नहीं मानी और शहरयार से विवाह के फैसले पर कायम रही। उसने मंत्री से कहा, ‘पिताजी मुझे भी ऐसी कई ऐतिहासिक कहानियां मालूम हैं लेकिन उन्हें कहने का कोई फायदा नहीं है। आप मेरी बात मान लें अन्यथा में खुद आपके खिलाफ जाकर शहरयार से विवाह करने चली जाऊंगी।’

बेटी की हठ के आगे मंत्री ने घुटने टेक दिए और कहा ‘मैं कल ही शहजादे शहरयार से इसके लिए बात करुंगा।’ अगले दिन सुबह-सुबह मंत्री शहजादे शहरयार के पास पहुंचा और बोला ‘बादशाह मेरी बेटी आपके साथ विवाह सूत्र में बंधना चाहती है।’ मंत्री की बात सुनकर बादशाह को बड़ा आश्चर्य हुआ उसने कहा ‘मंत्री तुम मेरा व्यवहार जानते हो फिर भी अपनी बेटी को मेरे पास भेज रहे हो क्यों?’ मंत्री बोला ‘बादशाह, मैं बेटी की जिद के आगे विवश हूं वो खुद आपसे विवाह करना चाहती है। उसका कहना है कि इस संसार में वह एक रात किसी की दुल्हन बनकर बिताना और अगले दिन मरना पसंद करेगी।’ बादशाह को बड़ा आश्चर्य हुआ उसने कहा ‘मंत्री तुम जानते हो कि अगले दिन तुम्हें ही उसे मृत्यु देनी होगी। कहीं उस वक्त तुम कमजोर न पड़ जाओ’ मंत्री बोला ‘बादशाह मैंने अपनी बेटी को समझाया लेकिन वह नहीं मानती, मेरे लिए आपकी आज्ञा सर्वोपरि है अत: मैं उसे मृत्युदंड देने से पीछे नहीं हटूंगा।’

ये सुनते ही शहजादे शहरयार ने कहा ‘ठीक है! सब तय है तो देरी किस बात की। जाओ अभी ही अपनी बेटी को ले आओ मैं आज रात ही उससे विवाह करुंगा।’ बादशाह का संदेशा लेकर मंत्री अपनी बेटी शहरजाद के पास आता है और उसे पूरी बात बताता है। शहरजाद ये सुनकर प्रसन्न हुई कि शहजादे उससे विवाह के लिए मान गए। उसने पिता का आभार किया और मन दुखी न करने को कहा। विवाह की तैयारियां हो रही थी कि तभी शहरजाद ने अपनी छोटी बहन दुनियाजाद को बुलाया और उससे एक वचन लिया। शहरजाद ने कहा कि ‘बहन, मुझे वचन दो कि तुम ठीक वैसा ही करोगी जैसा मैं तुम्हें कहूंगी।’ दुनियाजाद अपनी बड़ी बहन की आज्ञा मान लेती है और उसे वचन दे देती है।

शहरजाद दुनियाजाद से कहती है ‘जब मैं ब्याह करके शहजादे के यहां जाऊंगी तो उनसे निवेदन करके तुम्हें भी वहां बुलाऊंगी। तुम मेरे बुलाने पर वहां आ जाना। मैं शहजादे से कहूंगी कि मरने से पहले तुम्हारे साथ वक्त बिताना चाहती हूं इसलिए तुम्हें बुलवाया है।’ दुनियाजाद अपनी बड़ी बहन की बात मान गई और कहा ‘दीदी आपने जैसा कहा मैं वैसा ही करुंगी।’ शाम को मंत्री विवाह के लिए शहरजाद को लेने आता है। धर्मानुसार शहजादे शहरयार और अपनी बेटी शहरजाद का विवाह कराता है और दुखी मन लिए लौट आता है।

इधर शहरयार अपनी नई बेगम शहरजाद के कमरे में गया। कक्ष में पहुंचते ही उसने कहा ‘चेहरे से नकाब हटाइए।’ शहरजाद ने बादशाह की आज्ञा का पालन किया और चेहरे से नकाब उतार दिया। शहरजाद का सुंदर रूप देख शहरयार उस पर मुग्ध हो गया और उसे निहारने लगा। इतने में शहरजाद की आंखों से आंसू गिरने लगे। ये देख शहरयार ने घबराकर पूछा ‘तुझे क्या हुआ?’ शहरजाद ने उत्तर दिया ‘शहजादे! मेरी एक बहन है जो मुझे प्राणों से प्रिय है मेरी इच्छा है कि वह मेरे साथ आज रात यहां रहे ताकि कल सुबह मैं अंतिम बार उससे गले मिल सकूं।’ शहजादे शहरयार ने उसकी बात मान ली और उसे बुलावा भेजा।

संदेशा पाकर पहले से तैयार बैठी दुनियाजाद अपनी बहन के पास आने के लिए निकल गई। वह महल में आई और अपनी बहन के कक्ष में घुस गई। बादशाह ने कहा ‘शहरजाद इसे बगल में लगे पलंग पर सुला दो।’ शहरजाद ने बादशाह की आज्ञा के मुताबिक बहन को पास के पलंग में सुलाया और खुद बादशाह के साथ शाही पलंग पर सो गई। हल्की रोशनी होते ही दुनियाजाद उठी और बड़ी बहन के पास आकर बोली ‘दीदी!  तुम्हारी चिंता में मैं रात भर सो नहीं पाई। मन बहुत घबरा रहा है। कोई कहानी सुनाओ ताकि जी बहल जाए।’ दुनियाजाद की बात सुनकर उसने बादशाह शहरयार की तरफ देखा और उनसे अनुमित मांगी। बादशाह शहरयार ने शहरजाद को कहानी सुनाने की अनुमति दे दी।

शहरजाद ने दुनियाजाद को कौन सी कहानी सुनाई? क्या वह अपनी योजना में कामयाब हुई? या अगले दिन शहरयार ने उसे भी मरवा दिया…इन सवालों के जवाब जानने के लिए पढ़े अगला अध्याय।

अलिफ लैला अमीना की कहानी - Alif Laila Amina's Story

Alif Laila - Story of Amina

जुबैदा की कहानी सुनने के बाद खलीफा ने अमीना को अपना किस्सा सुनाने को कहा। अमीना ने कहा, “आप जुबैदा की कहानी सुन चुके हैं। अब मैं आपको अपनी कहानी सुनाती हूं। मेरी मां मुझे लेकर अपने घर आ गई ताकि उसे विधवापन का अकेलापन न खले। फिर उसने मेरी शादी नगर के एक बड़े आदमी के बेटे से कर दी। दुर्भाग्य से एक साल बाद ही मेरे पति की मौत हो गई, लेकिन उसकी करीब 90 हजार रियाल की संपत्ति मुझे मिल गई। इतना सारा पैसा मेरे जीवन भर के गुजारे के लिए पर्याप्त था। पति की मौत के छह महीने बीत जाने पर मैंने 10 कीमती जोड़े बनवाएं और हर जोड़े की कीमत करीब 1-1 हजार रियाल थी। पति की मौत के एक साल पूरा हो जाने के बाद मैंने उन कपड़ों को पहनना शुरू किया।”

एक दिन की बात है, मेरे नौकर ने मुझे आकर बताया कि आपसे एक बुढ़िया मिलना चाहती है। अगर आप कहें, तो यहां ले आएं? मैंने आज्ञा दे दी। बुढ़िया आकर मुझसे कहा, ‘मैंने सुना है कि आप बहुत दयालु हैं। मुझे आपकी मदद चाहिए। एक युवती है, जिसके माता-पिता की मौत हो चुकी है। आज रात उसकी शादी है। हम दोनों ही इस शहर में किसी को नहीं जानते। उसका विवाह जिस लड़के से हो रहा है, वह बहुत ही धनी है और उसके रिश्तेदार भी। मेरी आपसे प्रार्थना है कि आप उस शादी में शामिल हों, इससे मेरी प्रतिष्ठा बच जाएगी। आपके होने से धनी लड़के वाले हमें गरीब नहीं समझेंगे।”

“अगर आप मेरी गरीबी को देखते हुए ऐसा करने से इनकार कर देंगी, तो मेरी इज्जत मिट्टी में मिल जाएगी। इस नगर में मेरा कोई अपना भी नहीं है, जिससे मैं सहायता मांग सकूं। वैसे भी गरीबों और अनाथों पर दया करने वाली आपके जैसी परोपकारी और कोई दूसरी महिला नहीं है।”

इतना कहकर बुढ़िया सिसकने लगी। उसे रोता देखकर मेरा हृदय भर आया और मैंने उसे ढांढ़स बंधाते हुए कहा, “तुम चिंता न करो, मैं शादी में जरूर आऊंगी। मुझे अपना पता दे दो, मैं खुद ही वहां पहुंच जाऊंगी। तुम बस विवाह की तैयारियां करो।”

मेरी बात सुनकर बुढ़िया काफी खुश हुई और उसने कहा, “आपको मेरा मकान खोजने में परेशान होगी, इसलिए में शाम को खुद आकर साथ ले जाएगी।”

मैंने शादी में जाने की तैयारी शुरू कर दी। मैंने सबसे कीमती जोड़ा पहना और महंगे-महंगे गहने पहने। मैंने अपनी कई दासियों को भी अच्छे-अच्छे कपड़े और गहने पहनाकर तैयार कर दिया। इसके बाद शाम को बुढ़िया घर आई और अपने साथ घर ले गई।

हम चलते-चलते एक बड़ी-सी गली में पहुंचे। वहां हम एक बहुत बड़े दरवाजे के सामने खड़े हो गए। दरवाजे के ऊपर पर लिखा था “इस घर में हमेशा खुशी का निवास रहता है।” बुढ़िया के ताली बजवाते ही दरवाजा खुल गया और वह मुझे अंदर ले गई।

वहां एक सुंदर महिला ने गला लगाकर मेरा स्वागत किया और बड़े ही सम्मान से एक आलीशान कमरे में बैठा दिया। फिर उस महिला ने कहा कि तुम्हें यहां किसी और की शादी में नहीं, बल्कि तुम्हारी ही शादी में बुलाया गया है।

यह सुनकर मेरे आश्चर्य का ठिकाना न रहा, लेकिन उस स्त्री ने मेरी प्रशंसा करते हुए मुझे कुछ और पूछने का मौका ही नहीं दिया।

थोड़ी देर बातें करने के बाद उसने शादी के रहस्य से पर्दा उठाते हुए कहा, “बीबी, दरअसल मेरा एक भाई है, जो बेहद खूबसूरत है। वह तुम्हारी खूबसूरती की बारे में काफी कुछ सुना है और तुमसे शादी करना चाहता है। अगर तुम उसके साथ शादी नहीं करोगी, तो उसे बहुत दुख होगा। वह युवक हर तरह से तुम्हारे योग्य है और तुम्हें हमेशा खुश रखेगा।”

उस स्त्री ने इसके बाद बहुत देर तक अपने भाई की तारीफ की और कहा कि अगर तुम्हारा हल्का-सा भी संकेत मिले, तो उसे तुम्हारे आने की सूचना दे दूं।

हालांकि, मैं पति की मौत के बाद फिर से शादी करने की इच्छुक नहीं थी, लेकिन उस आदमी इतनी तारीफ सुनने के बाद मैं इनकार नहीं कर पाई। उस स्त्री की बात सुनने के बाद मैं धीरे से मुस्कुरा कर चुप हो गई। मेरे मौन को उसने मेरी स्वीकृति समझ लिया और ताली बजाई।

उसके ऐसा करते ही पास के कमरे से एक युवक बहुत शानदार कपड़े पहनकर आया। उसके रूप को देखकर मुझे अपने भाग्य पर बहुत खुशी हुई। वह मेरे पास बैठकर बहुत ही सभ्यता से बातें करने लगा। इसके बाद उस स्त्री ने दूसरी बार ताली बजाई, तो दूसरे कमरे से काजी और चार अन्य पुरुष निकले। काजी ने शरीयत के अनुसार हमारी शादी करा दी, वे चारों पुरुष गवाह बन गए। विवाह के दौरान मैंने पतिव्रता होने का व्रत लिया।

विवाह के पश्चात मैं धनवान स्त्रियों की तरह नहीं, बल्कि रानी की तरह सुखपूर्वक पति के घर रहने लगी। कुछ दिनों बाद मैंने बड़े घर की स्त्रियों की तरह बाजार से रेशमी थान खरीदकर बेचने की इच्छा जताई, मेरे पति ने इसकी इजाजत दे दी। मैं बुढ़िया और दो दासियों को लेकर शहर के सबसे बड़े बाजार में गई। वहां बुढ़िया ने एक नौजवान व्यापारी के बारे में बताया, जिसे वह जानती थी। उसने कहा कि इस व्यापारी के पास कई मूल्यवान थान है। मैंने सोचा जब एक ही जगह सब सामान मिल जाए तो अच्छा है, इसलिए उसकी दुकान में चली गई।

बुढ़िया ने कहा कि इसके पास हर तरह का सामान है, तुम जो चाहो ले लो। फिर उस व्यापारी ने बुढ़िया से मेरी पसंद जानते हुए कई सारे थान दिए। मैंने उनमें से एक थान पसंद किया और बुढ़िया से उसके दाम पूछने को कहा। व्यापारी ने कहा, “यह थान बेशकीमती है, मैं इसे असंख्य अशर्फियां देने पर भी नहीं बेचूंगा, लेकिन अगर यह सुंदरी अपने गाल का चुंबन मुझे दे दो, तो यह थान उसे दे दूंगा।”

उसकी इस बात पर मैं नाराज हो गई और बुढ़िया से कहा कि यह व्यापारी दुष्ट है। इतनी गंदी बात करने की इसकी हिम्मत कैसे हुई, लेकिन बुढ़िया ने भी उस व्यापारी का ही पक्ष लिया और कहा, “सुंदरी, ऐसा करने में क्या परेशानी है। इसे चुपचाप एक चुंबन दे दो।”

“मैं इतनी मूर्ख थी और वह थान मुझे इतना पसंद आ गया था कि मैं इसके लिए तैयार हो गई।” बुढ़िया और दोनों दासियां मेरी आड़ करके सड़क की ओर खड़ी हो गईं। मैंने अपने मुखे से वस्त्र हटाते हुए अपना गाल उस व्यापारी की ओर कर दिया।

उस दुष्ट व्यापारी ने चुंबन लेने की जगह मेरे गाल पर जोर से काट दिया, जिससे मेरा गाल लहूलुहान हो गया और मैं तड़कपर बेहोश हो गई। इस दौरान मौका पाकर व्यापारी अपना माल समेटकर और दुकान बंद करके भाग गया। थोड़ी देर बाद होश आने पर मैंने अपना गाल लहुलूहान पाया। मेरे रोने की आवाज से वहां भीड़ इकट्ठा हो गई, लेकिन उन्होंने समझा कि मैं किसी बीमारी की वजह से बेहोश हुई हूं। थोड़ी देर बाद मुझे होश आने पर बुढ़िया और दासियों ने राहत की सांस ली। बुढ़िया ने मुझसे माफी मांगते हुए कहा कि मेरे कहने पर ही तुम इस दुष्ट व्यापारी की दुकान पर आई और मुसीबत में फंस गईं। तुम घर चलो, मैं तुम्हारे घाव पर ऐसी दवा लगाऊंगी कि यह तीन दिन में ठीक हो जाएगा।

मैं जैसे-तैसे घर पहुंची और कमजोरी के कारण फिर से बेहोश हो गई। बुढ़िया किसी तरह मुझे होश में लाई, फिर पलंग पर लेटा दिया। रात को जब पति आया और मुझसे पूछा कि लेटी क्यों हो, तो मैंने बहाना बनाया कि मुझे सिर दर्द हो रहा है। मुझे लगा कि वह मेरी बात मान लेगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उसने मेरे सिर पर हाथ फेरने के बाद मुंहे से कपड़ा हटा दिया और गाल पर घाव देखकर गुस्सा हो गया और पूछने लगा कि गाल पर चोट कैसे लगी।

वैसे तो मैं उसके कहने पर ही बाजार गई थी और मेरी कोई गलती भी नहीं थी, लेकिन सच कहने की मेरी हिम्मत नहीं हुई। मैंने झूठ बोला कि बाजार में एक लकड़हारा लकड़ी का गठ्ठर लेकर मेरे पास से गुजरा था। उसकी एक लकड़ी मेरे गाल में चुभ गई, जिससे मुझे चोट लग गई।

यह सुनकर मेरा पति गुस्सा में भर गया और कहा कि अगर यह बात सच है, तो मैं कल ही सारे लकड़हारों को फांसी पर चढ़वा दूंगा। मैं घबराई कि मेरे एक झूठ से सभी लकड़हारे बेकसूर ही मारे जाएंगे।

इसके बाद पति ने फिर से पूछा, तुम सच-सच बताओ कि तुम्हारे गाल पर घाव कैसे लगा, लेकिन मेरी सच बताने की हिम्मत नहीं हुई। मैंने फिर झूठ बोला कि बाजर में एक कुम्हार गधे पर बर्तन लेकर जा रहा था। उसके गधे ने मुझे धक्का मारा, जिस कारण मैं जमीन पर गिर गई और वहां गिरा एक कांच का टुकड़ा मेरे गाल में धंस गया। यह सुनकर मेरे पति ने कहा, अगर यह सच है, तो मैं कल ही मंत्री जफर से कहकर नगर के सभी कुम्हारों को यहां से बाहर निकलवा दूंगा। यह सुनकर मैं घबराई कि आखिर निर्दोष कुम्हारों को सजा क्यों मिले।

इस पर नाराज होते हुए मेरे पति ने कहा कि जब तक तुम सच नहीं बताओगी मेरा गुस्सा कम नहीं होगा। मैंने कहा कि चलते-चलते मुझे चक्कर आ गया और मैं गिर गई, जिससे मेरे गाल में चोट लग गई। यह सुनकर मेरा पति गुस्से से आग-बगुला हो गया और बोला, तुम झूठ पर झूठ बोल रही हो। इसके बाद उसने ताली बजाई और तीन गुलाम वहां आए। मेरे पति ने उन्हें तलवार से मेरे दो टुकड़े करके लाश को नदी में मछलियों को खाने के लिए फेंकने का आदेश दिया। गुलामों ने मुझसे कहा, अपने अंतिम समय में ऊपर वाले को याद कर लो। मैंने कहा थोड़े वक्त के लिए प्राणदान दे दो कुछ कहना है मुझे, लेकिन आंसुओं और हिचकियों के आगे मैं कुछ कह नहीं सकी। इस बीच मेरे पति का क्रोध बढ़ता गया, लेकिन मैं कुछ न कह सकी। मैंने अपने पति से कुछ और मोहलत मांगी, लेकिन उसने गुलामों को मुझे मारने का आदेश दिया।

गुलाम मुझे मारने ही वाले थे कि इतने में बुढ़िया वहां आ गई। उसने मेरे पति को बचपन में पाला था और उसे अपना दूध पिलाया था। वह उसके पैरों में गिर पड़ी और अपने दूध के बदले में मेरे लिए जीवनदान मांगा। मेरे पति ने उसके कहने पर मुझे मरवाया तो नहीं, लेकिन कहा कि दंड जरूर मिलेगा। उसके आदेश से गुलामों ने मुझे बहुत कोड़े मारे, जिससे मैं बेहोश हो गई और मेरे शरीर के कई हिस्सों से मांस उधड़ गया। मुझे एक महल के कमरे में बंद कर दिया, जहां मैं कई महीने तक पड़ी रही। इस दौरान बुढ़िया ने मेरा ख्याल रखा और मरहम-पट्टी की। उसकी सेवा से मैं स्वस्थ तो हो गई, लेकिन मेरे शरीर पर काले निशान रह गए, जिन्हें आपने देखा।

जब मैं चलने-फिरने योग्य हुई, तो सोचा कि पहले पति के मकान में जाकर रहूं, जहां मेरी संपत्ति थी, लेकिन उस गली में जाने पर मकान तो दूर उसका एक निशान तक नहीं मिला। मेरे दूसरे पति ने उस घर को खुदवाकर मिट्टी में मिला दिया था। मैं इसके खिलाफ बोल भी न सकी, क्योंकि मुझे डर था कि कहीं वह गुस्से में आकर मुझे मरवा न दे।

अपनी जान बच जाने पर मैं ऊपर वाले को धन्यवाद कहते हुए जुबैदा के पास गई और उसे अपनी पूरी कहानी कह सुनाई। उसने कहा कि मेरे पास काफी पैसा है, जिससे हम दोनों को परेशानी नहीं होगी। जुबैदा ने यह भी बताया कि कैसे उसकी सगी बहनों की जलन की वजह से उसका मंगेतर शहजादा समुद्र में डूब गया और फिर जिस परी की उसने मदद की थी उसने उससे छल करने वाली उसकी सगी बहनों को जानवर बना दिया।

फिर मैं जुबैदा के साथ रहने लगी। मेरी मां की मौत के बाद मेरी छोटी बहन साफी अकेली हो गई, जिसे जुबैदा ने यहां बुला लिया, इस तरह हम तीनों बहनें खुशी से साथ-साथ रहनी लगीं।

हम लोग मिलजुलकर घर का काम करते। कभी बाजार सौदा लाने मैं जाती, तो कभी साफी। कल मैं बाजार गई, तो जिस मजदूर के सिर पर सामान लदवाकर लाई, वह बहुत हंसमुख था और सभ्य भी था। इसलिए, हमने पूरे दिन उसे अपने साथ रहने दिया, जिससे हमारा मनोरंजन हो सके।

रात को तीन फकीरों ने हमसे रात भर के लिए आश्रय मांगी। हमने उन्हें स्वादिष्ठ भोजन कराया और शराब पिलाई। वे देर रात तक मनोरंजन करते रहे। इसके बाद मोसिल के तीन बड़े संभ्रांत दिखने वाले व्यापारियों ने भी रात भर की शरण मांगी, जो हमने दे दी।

अमीना ने कहा कि हालांकि हमारे सभी मेहमानों ने हमसे वादा किया था कि वो सबकुछ चुपचाप देखेंगे और किसी चीज के बारे में कुछ नहीं पूछेंगे, लेकिन उन्होंने अपना वादा नहीं निभाया और उन दोनों जानवारों और कोड़ों से मारे जाने की वजह से मेरे शरीर के निशानों के बारे में पूछने लगे। हमें इस पर बड़ा क्रोध आया, हम चाहते तो उनके प्राण ले सकते थे, लेकिन हमने ऐसा नहीं किया और उनकी कहानी सुनकर उन्हें जाने दिया।

दोनों स्त्रियों की कहानियां सुनकर खलीफ हारू रशीद को बहुत हैरानी हुई। उसने जुबैदा से पूछा कि क्या परी ने बताया था कि ये कब जानवर से इंसान बनेंगी। जुबैदा ने कहा कि मैं यह बताना भूल गई कि परी ने जाते मुझे अपने थोड़े-से बाल दिए थे और कहा था कि अगर तुम इनमें से एक भी बाल आग में डालोगी, तो मैं दुनिया में जहां भी रहूं तुम्हारे पास आ जाऊंगी।

खलीफा ने पूछा, वे बाल कहां हैं। जुबैदा ने कहा, मैं वे बाल हमेशा अपने पास रखती हूं। इतना कहकर उसने एक पुड़िया में से कुछ बाल निकाले और उन्हें खलीफा को दिखाया।

खलीफा ने भी उस परी को देखने की इच्छा जताई। इसके बाद जुबैदा ने एक-दो बाल नहीं, बल्कि पूरी पुड़िया ही आग में डाल दी और धुआं उठते ही कुछ पलों में सुंदर-सी परी सामने आ खड़ी हुई।

उस परी ने खलीफा से कहा, “आप धरती पर खुदा के प्रतिनिधि हैं, आप जो भी कहेंगे मैं उसका पालन करूंगी। जुबैदा ने मेरी जान बचाई थी, इसलिए मैं इसकी बड़ी आभारी हूं। मैंने इसके उपकारों के बदले में इसके साथ धोखा और नीचतापूर्ण बर्ताव करने वाली इसकी बहनों को जानवर बनाया था। अब मेरे लिए क्या आज्ञा है?”

खलीफा ने कहा, “ये दोनों अपने किए का काफी दंड भुगत चुकी हैं, इसलिए इन्हें फिर से इंसान बना दो। साथ ही अमीना को दुख देने वाले इंसान के बारे में बताओ और इसके शरीर पर बने काले निशान ठीक कर दो।”

परी ने कहा कि मैं सब ठीक कर दूंगी। परी ने हाथ में पानी लेकर कुछ मंत्र पढ़े और फिर दोनों जानवरों को इंसानी शरीर दे दिया। साथ ही अमीना के निशान ठीक कर दिए। उसका शरीर सोने जैसा दमकने लगा। इसके बाद परी ने खलीफा से कहा कि अमीना को दुख देने वाला कोई और नहीं, बल्कि तुम्हारो बेटा अमीन है। उसने अमीना की खूबसूरती पर मोहित होकर धोखे से उसके साथ शादी की थी।

यह कहकर परी गायब हो गई। खलीफा ने सारी बात जानने के बाद अपने बेटे को बुलवाया, लेकिन डर के कारण उसकी आने की हिम्मत नहीं हुई। इस पर खलीफा ने आदेश दिया कि अमीन इसे पत्नी के रूप में सम्मान सहित अपने साथ रखे। शहजादा अमीन ने खलीफा के आदेश का सम्मान करते हुए ऐसा ही किया। इसके बाद खलीफा ने जुबैदा से शादी कर ली और साफी और बाकी दो बहनों की फकीर बने तीनों राजकुमारों से शादी करवा दी। साथ ही उन्हें अपने राज्य में उच्च पद भी दिया।

अलिफ लैला गरीब मजदूर की कहानी - Alif Laila Story of a Poor Laborer

Alif Laila - Story of poor laborer

घर की मालकिन जुबैदा ने सहारा लेने के लिए आए सभी लोगों के बारे में थोड़ी-थोड़ी जानकारी हासिल करने के बाद ने मजदूर को अपनी कहानी सुनाने के लिए कहा। अपने पीछे एक लंबे-चौड़े आदमी को तलवार लिए खड़ा देखकर मजदूर डरी आवाज में अपनी कहानी सुनाने लगा। उसने कहा कि मैं इस घर में दूसरे लोगों से पहले आया था, लेकिन मेरा इरादा बिल्कुल भी गलत नहीं है। मैं बस हर रोज की तरह सुबह-सुबह काम की तलाश में बाजार के लिए घर से अपनी टोकरी लेकर निकला था।

बाजार पहुंचने के बाद अपना खर्च निकालने के लिए मैं इधर-उधर काम ढूंढने लगा। तभी वहां आपकी बहन अमीना मुझे दिखीं। जैसे ही मैंने उनकी तरफ देखा उन्होंने मुझे इशारे से बुलाया। मैं भी काम की उम्मीद में उनके पास चला गया। फिर अमीना ने मुझे कुछ सामान दिया और अपने साथ चलने के लिए कहा। वो मुझे सबसे पहले एक जूस बेचने वाले के पास लेकर गईं। उससे उन्होंने काफी देर तक बातें की और मैं बाहर खड़ा उनका इंतजार करता रहा।

कुछ देर बाद अमीना ने जूस बेचने वाले से काफी सारा जूस खरीदा और मुझे उसे उठाने को कहा। उस जूस को जैसे ही मैंने उठाया उन्होंने मुझे आगे चलने को कहा। फिर अमीना मुझे सब्जी बेचने वाले के पास ले गईं। उससे अमीना ने काफी देर तक सब्जियों का दाम ठीक लगाने को कहा और फिर वहां से खूब सारी सब्जियां खरीद लीं। उन सब्जियों को भी मैंने कंधे पर उठा लिया। उसके बाद अमीना मुझे वहां से फल बेचने वाले के पास ले गईं। उससे भी कई सारे फल खरीदे और मैंने उन्हें भी उठा लिया।

फिर सारा खरीदा हुआ सामान लेकर अमीना मुझे मांस बेचने वाले के पास लेकर गईं। उससे भी खरीदारी करके अमीना ने कहा कि ये सब कुछ तुम्हें मेरे घर लेकर चलना है। जैसा उन्होंने कहा मैंने भी ठीक वैसा ही किया और उनके पीछे-पीछे सारा सामान कुछ कंधे पर और कुछ सिर पर लादकर आपके घर आ गया।

आगे मजदूर ने रोते हुए कहा कि बस मेरी इतनी ही कहानी है कि मैं रोज सुबह घर से चार पैसे कमाने के लिए निकलता हूं और जो भी काम मिलता है उसे बिना किसी सवाल के कर लेता हूं। ठीक वैसा ही मैंने आज भी किया था। बस आज के दिन मुझे आपकी बहन ने काम दिया और उनका कहा सारा काम मैंने किया। इसके बदले में मुझे यहां कुछ देर रहने को कहा गया और सभी ने सम्मान व आदर दिया। मुझ गरीब को इससे ज्यादा क्या चाहिए।

आप लोगों का दिल इतना बड़ा है कि मुझे आपने भरपेट खाने को भी दिया, लेकिन मुझसे क्या गलती हुई मुझे समझ नहीं आ रहा है। आपने मेरे सिर को काटने का आदेश क्यों दिया है? अगर कोई गलती हुई है, तो मुझे माफ कर दीजिए। मैं आपका दिल नहीं दुखाना चाहता था, मेरे सिर के ऊपर से तलवार हटवा दीजिए।

मजदूर की बातें सुनकर जुबैदा बोली मुझे तुम्हारी बातों में सच्चाई नजर आ रही है। अब तुम यहां से चुपचाप चले जाओ और दोबारा लौटकर मेरे सामने मत आना। जुबैदा की यह बात सुनकर मजदूर के ऊपर तलवार लिए खड़ा व्यक्ति हट गया। यह सब देखकर मजदूर खुश हुआ, क्योंकि उसकी जान बच गई थी।

उसके बाद मजदूर जुबैदा से कहने लगा कि वो कुछ देर और वहां रुकना चाहता है, ताकि वो फकीरों की भी कहानी सुन सके। मजदूर को जुबैदा ने किनारे में चुपचाप खड़े होने का इशारा किया। उसके बाद जुबैदा ने ‘पहले फकीर’ को कहानी सुनाने को कहा। पहले फकीर की क्या कहानी है जानने के लिए अगली स्टोरी पढ़ें।

अलिफ लैला भद्र पुरुष और उसके तोते की कहानी - Alif Laila The Story of the Gentleman and His Parrot

Alif Laila - Story of Bhadra Purush and his Parrot

बादशाह सुलेमान के कहने पर वजीर ने उसे ‘भद्र पुरुष और उसके तोते की कहानी’ सुनाते हुए कहा कि बहुत समय पहले की बात है सुदूर गांव में एक भद्र पुरुष रहता था जिसकी पत्नी बहुत सुंदर थी। भद्र पुरुष अपनी पत्नी से बेहद प्रेम करता था और उसे अपनी आंखों के सामने से दूर नहीं होने देता था।

एक दिन भद्र पुरुष किसी काम से नगर से बाहर दूसरे शहर गया हुआ था। काम निपटाने के बाद बाजार घूमते हुए उसे एक अद्भुत तोता दिखाई दिया। तोते की यह विशेषता थी कि वह आम मनुष्य की तरह बोल सकता था। तोता अपनी आंखों के सामने घटित होने वाली हर घटना को मालिक के पूछने पर उसे सच-सच बता देता था। यह देखकर वह व्यक्ति बेहद प्रभावित हुआ और वह तोते को खरीद कर अपने साथ घर ले आया।

तोते को घर पर लाने के बाद भद्र पुरुष अक्सर उससे अकेले में बात करता रहता और दिन भर की सारी घटनाएं उससे पूछता। तोता भी अपने मालिक के सवालों का जवाब देते हुए उसे दिनभर की आंखों देखी सब कुछ सच-सच बता देता। कुछ दिनों बाद उस व्यक्ति को किसी जरूरी काम से विदेश जाना पड़ा। भद्र पुरुष ने अपने जाने से पहले तोते को पत्नी को सौंप दिया और उसकी देखभाल करने के लिए कह गया।

कई दिनों बाद जब भद्र पुरुष विदेश से घर लौटा तो उसने तोते से अकेले में पूछा कि उसकी गैर-मौजूदगी में घर में क्या-क्या घटित हुआ? तोते ने व्यक्ति की बात का जवाब देते हुए उसे पूरी घटना के बारे में बताया। उसने बताया कि कैसे उसकी पत्नी उसके न होने पर अपनी मनमानी करती थी और अपनी सभी मर्यादाओं को लांघ चुकी थी। तोते की बात सुन कर भद्र पुरुष गुस्से में आग बबूला हो गया और उसने अपनी पत्नी को खूब डांट फटकार लगाई। तोते की बताई हर बात सच थी इसलिए उसकी पत्नी भद्र पुरुष की डांट को चुपचाप सुनती रही।

उसी शाम जब किसी काम से भद्र पुरुष घर से बाहर गया हुआ था तो उसकी पत्नी ने घर की सभी सेविकाओं को बारी-बारी से अपने पास बुलाया और सबको खूब डांट लगाई। भद्र पुरुष की पत्नी ने सारी सेविकाओं से पूछा कि किसने उसके पति को यह बातें बताई। सभी सेविकाओं ने इस बात से इनकार कर दिया और अपनी बात को सच बताने के लिए कसमें खाने लगीं। इसके बाद भद्र पुरुष के घर आने के बाद तोते ने व्यक्ति की पत्नी द्वारा सेविकाओं से किए गए व्यवहार की पूरी बात उसे बता दी जिस पर उसने दोबारा अपनी पत्नी को खूब फटकार लगाई।

घटना के बाद अकसर भद्र पुरुष तोते से अकेले में बात किया करता था। अब तक उस व्यक्ति की पत्नी को भी विश्वास हो गया था कि तोता ही घर की होने वाली हरेक घटना उसके पति को बताता है। इसके बाद से वह तोते से चिढ़ने लगी और पति के सामने उसे झूठा साबित करने के लिए योजना बनाने लगी।

कुछ समय बाद भद्र पुरुष किसी काम से एक दिन के लिए नगर से बाहर गया हुआ था। उस रात व्यक्ति की पत्नी ने मौका पाकर अपनी सेविकाओं के साथ मिलकर तोते को फसाने की योजना बनाई। महिला की आज्ञा पर अंधेरे में घर की एक सेविका रात भर उसके पिंजरे के नीचे चक्की पीसती रही जबकि दूसरी सेविका तोते पर बारिश की तरह पानी की बूंदे डालती रही। वहीं, तीसरी सेविका ने पिंजरे की पिछली तरफ दीपक जला दिया और खुद दर्पण लेकर तोते के सामने खड़ी हो गई। दर्पण पर पड़ने वाला दीपक का प्रकाश रह-रहकर तोते की आंखों पर पड़ रहा था। इससे तोते को बिजली चमकने का एहसास हो रहा था। सुबह होते ही सेविकाओं ने तोते के पिंजरे को कपड़े से ढक दिया और वहां से चली गईं।

अगले दिन जब भद्र पुरुष घर वापस आया तो उसने तोते को अकेले में ले जाकर पूरी रात का हाल पूछा। भद्र पुरुष के सवाल का तोते ने जवाब दिया कि रात भर बादल गरजते रहे, बारिश होती रही और बिजली चमकती रही। यह सुनकर भद्र पुरुष को लगा कि तोता तो झूठ बोल रहा है क्योंकि रात को आसमान साफ था और बारिश एक बूंद तक कहीं नहीं पड़ी। भद्र पुरुष ने सोचा कि तोता जरूर झूठ बोल रहा है और पक्का वह पहले भी उसकी पत्नी के बारे में झूठ बोल रहा होगा। तोते को झूठा समझ कर गुस्से में व्यक्ति ने तोते को पिंजरे से बाहर निकाला और उसे जोर से जमीन पर पटक कर मार डाला।

घटना के बाद भद्र पुरुष और उसकी पत्नी दोबारा खुशी-खुशी रहने लगे और वह अपनी पत्नी के ऊपर दोबारा विश्वास करने लगा। वहीं, उसकी पत्नी भी तोते के मरने के बाद निश्चित हो गई कि अब उसके पति को उसकी करतूतों के बारे में बताने वाला कोई नहीं है और अब उसे कुछ पता नहीं चल पाएगा। हालांकि, उसकी पत्नी का यह फरेब अधिक दिनों तक नहीं चल पाया। उसके कारनामों के बारे में उसके पड़ोसी व गांव के अन्य लोग व्यक्ति को बताने लगे जो कि तोते की कही बातों से मिलती-जुलती थी। इसके बाद भद्र पुरुष को अपनी गलती का एहसास हुआ और वह पछताने लगा।

यह कहानी सुनने के बाद मंत्री ने गरीक बादशाह से कहा, “तोते का निर्दोष मरना बड़ी बात नहीं है और न ही उस स्त्री का चरित्रहीन होना लेकिन जो बात मैं आपको समझाना चाहता हूं वह ध्यान देने योग्य है। आपके कीमती जीवन के लिए अगर किसी निरपराधी को भी मारना पड़े तो यह कोई बड़ी बात नहीं है।” मंत्री ने कहा कि सभी लोग हकीम को शत्रु का भेदी कहते हैं और मुझे उसके अच्छे व बुरे होने से कोई मतलब नहीं है बस महाराज आपकी आयु लंबी होनी चाहिए और आपको कोई नुकसान नहीं होना चाहिए। मंत्री ने आगे कहा, “अगर आपको लगता है कि मेरी बातें झूठी हैं तो आप मुझे भी वैसी ही सजा दे सकते हैं जैसे कि एक राजा ने अमात्य को दिया था।” बादशाह के पूछने पर मंत्री ने उसे ‘अमात्य की कहानी’ सुनाना शुरू किया।

अलिफ लैला सिंदबाद जहाजी की चौथी समुद्री यात्रा की कहानी - Alif Laila Story of Sindbad's fourth voyage

अलिफ लैला - सिंदबाद जहाजी की चौथी समुद्री यात्रा की कहानी

अब तक आपने पढ़ा कि सिंदबाद कैसे अपने जहाज से भटक कर एक नरभक्षी दानव और इंसान को जीवित निगलने वाले सांप के चंगुल में फंस जाता है लेकिन सिंदबाद का सब्र, समझदारी और उसका ऊपर वाले पर विश्वास उसे मुश्किल समय से निकाल कर उसके खोए हुए लोगों से मिला देता है। अब आगे सिंदबाद की चौथी जहाजी यात्रा में पढ़िए एक ऐसा वाकया जो सिंदबाद को मौत के मुंह में ले जाता है। क्या सिंदबाद की ये आखिरी यात्रा होगी? क्या सिंदबाद का यही अंत है? जानने के लिए स्क्रोल कीजिए…

सिंदबाद ने कहा, अपने लोगों के बीच आकर मैं पुराने सभी दुःख और तकलीफ भूल गया और फिर कुछ दिनों के आराम के बाद मैंने सोचा कि अब आगे एक और नई यात्रा की तैयारी की जाए। मैंने इसकी तैयारी की और कई ऐसी वस्तुएं खरीदी जिनकी बाहरी देशों में काफी मांग है। मैंने अपनी यात्रा की शुरुआत फारस से की। मैंने वहां के कई नगरों में अपना माल बेचा, खूब व्यापार किया। इसके बाद मैं एक बंदरगाह पहुंचा, यहां भी मैंने अपना माल बेचा और अच्छा धन कमाया।

इसके बाद मैंने आगे कूच किया लेकिन तभी बीच यात्रा में हमारा जहाज तूफ़ान के बवंडर में फंस गया और जहाज तेज पानी, हवा और ऊंची-ऊंची चट्टानों से टकरा कर तिनके जैसा बिखर गया। ये हादसा इतना भयावह था कि मेरे ज्यादातर साथी डूब कर मर गए। अब बस कुछ व्यापारी और मैं ही बचा था। हम लकड़ी के तख्तों की मदद से किसी तरह किनारे तक पहुंचे। मैंने देखा कि हम एक द्वीप पर थे। हमने यहां घूम-घूम कर फल आदि खा कर अपनी भूख मिटाई।

हम दिन भर यहां-वहां भटकते रहे और अपने भाग्य को कोसते रहे लेकिन इससे कुछ नहीं होना था। यही सब सोचते हुए मैं और मेरे साथी सो गए। अगले दिन हमने फिर फल आदि खाए और अपना पेट भरा। इसके बाद हमें हमारे सामने से काले रंग के आदमियों का एक झुंड आता दिखा, जिसने हम सभी को पल भर में घेर कर कैद कर लिया। इन काले लोगों ने हमें रस्सियों से जकड़ लिया और हमें घसीटते हुए अपने कबीले में ले गए।

वहां उन लोगों ने हमारे सामने कुछ अजीब खाने को दिया। मेरे साथी भूखे थे इसलिए उन्होंने जल्दी-जल्दी खाना शुरू कर दिया। वो सभी नशे में झूमने लगे थे। मैंने सभी को देखा तो मैं समझ गया कि ये बहकाने के लिए है, इसलिए मैंने वो बहुत कम खाया और उन काले आदमियों की हरकतों को देखने लगा। इसके बाद उन लोगों ने हमें नारियल तेल में पका हुआ चावल खाने को दिया था। ये चावल हम लोगों को मोटा करने के लिए खिलाए जा रहे थे।

मुझे ये समझने में बिल्कुल भी देर नहीं लगी कि ये जंगली लोग हमें मोटा करके हमारे कबाब बना कर खाने का बंदोबस्त कर रहे हैं। मेरे साथियों ने तो खूब खाया लेकिन मैंने बहुत कम खाया। अब रोज ये कबीले वाले काले लोग हम सभी को ये चावल खाने को देते और मेरे साथी पेट भर कर खाते और सो जाते। मैं कम खाना खाता था और चिंता के कारण बिल्कुल सूख गया, मेरी हड्डियां भी अब नजर आने लगी थीं।

मैं पतला-दुबला था इसलिए उन लोगों के लिए शायद अभी काम का नहीं था इसलिए मैं दिनभर यहां-वहां घूमता रहता था। इसी बीच एक दिन मुझे गांव से भागने का मौका मिल गया और मैं भाग निकला। मुझे खोजने के लिए लोग मेरे पीछे भी आए, लेकिन मैं उनकी पहुंच से काफी दूर चला गया था। बस दिनभर भागता रहता था और रात में किसी जगह छिपकर सो जाता था। कभी रास्ते में कुछ खाने को मिल जाता, तो खा लेता था। इसी तरह करीब सात दिन गुजर गए।

आठवें दिन मुझे समुद्र का किनारा मिला, वहां मैंने सफेद चमड़ी के लोगों को देखा जो काली मिर्च की खेती से मिर्च इकठ्ठा कर रहे थे। मुझे उन्हें देखकर बेहद प्रसन्नता हुई और मैं भाग कर उनके पास पहुंचा। वो लोग मुझे किसी अजूबे की तरह देख रहे थे, उन्होंने मुझसे अपनी भाषा में मेरे बारे में पूछा। मैंने उन्हें सभी कुछ विस्तार से बता दिया। उन लोगों को मेरी बातों पर बेहद आश्चर्य हुआ। उन्होंने कहा कि मैं नरभक्षी लोगों के बीच से बच कर निकल आया हूं ये बड़ी ही हैरानी वाली बात है।

वो लोग मुझे अपने जहाज और अपने बादशाह से मिलाने ले गए। उन लोगों ने मेरा परिचय यह कह कर करवाया कि मैं नरभक्षियों से बच-बचाकर किस तरह आया हूं। मैंने अपनी आप-बीती जब बादशाह को सुनाई तो उन्होंने भी बड़ा ही आश्चर्य और हैरानी जताई। इसके बाद बादशाह ने दयालुता दिखाते हुए मुझे वस्त्र और अन्य सुविधाएं दीं। बादशाह बड़े द्वीप का मालिक था और उसके पास बहुत सारा धन-धान्य था। मुझे उम्मीद हो चली थी कि मैं यहां से अपने देश लौट पाऊंगा।

बादशाह मुझ पर बड़ा ही मेहरबान हुआ और मुझे अपने दरबार में दरबारी बना लिया। फिर मुझे वो सम्मान दिया जैसे कि मैं उन्हीं के देश का निवासी हूं। अब मैं लोगों की मदद करने लगा, उनके छोटे-बड़े काम आने लगा। लोगों ने भी मेरा मान किया। एक दिन मैंने देखा कि लोग बिना जीन-लगाम के घोड़ों की सवारी करते हैं। मैंने इस बारे में लोगों से पूछा तो मुझे हैरानी हुई कि उन लोगों को पता ही नहीं था कि जीन-लगाम होता क्या है। उन लोगों ने हैरानी जताई और मुझे कहा कि मैं उन्हें बना के दिखाऊं।

बस, फिर क्या था मैंने जीन-लगाम बनाने की तैयारी शुरू कर दी। मैंने एक नमूना बनाया और फिर उसे लकड़ी के कारीगर से बनवाया, उसके बाद उसपर चमड़ा मढ़वाया और उसे पूरी तरह से तैयार कराया। इसके साथ ही लोहार से लगाम और लोहे के रकाबे भी बनवाए। इसके बाद पूरी तैयारी कर घोड़े को सजाया और बादशाह के समाने ले गया।

इसके बाद तो जैसे बादशाह के दिल में मैंने गहरी जगह बना ली थी। वो बहुत खुश हुआ, उसके लिए वो सब कुछ नया था और उसे देखकर वो काफी उत्साहित हो गया। उसने मुझे बहुत सराहा। फिर मैंने ये जीन-लगाम राज परिवार के सभी सदस्यों व मंत्रियों को दी, जिससे मुझे अच्छे-खासे पैसे मिले और कई बेशकीमती चीजें मिलीं। अब सभी मेरा बहुत सम्मान करने लगे थे।

फिर एक दिन बादशाह ने मुझे बुलाया और कहा कि वो मुझसे काफी खुश हैं और चाहते हैं कि मैं उनके ही देश में स्थाई रूप से बस जाऊं और अपने देश लौटने के बारे में सोचना छोड़ दूं। उन्होंने मेरा विवाह एक सुंदर कन्या से कराने की बात भी कही, जिसे मैंने हृदय से स्वीकार कर लिया। बादशाह ने मेरा विवाह एक अत्यंत रूपवती, गुनवती नव-यौवना के साथ कराया। जिसका साथ पाकर मैं अपना बगदाद में बसा परिवार भूल गया।

फिर कुछ दिनों बाद मेरे पड़ोसी की बेगम लंबी बीमारी के बाद खुदा को प्यारी हो गईं। मैं मातम के बीच उसके घर उसे हौसला देने गया। मैंने उसे देखा वो जोर-जोर से रोया जा रहा था। मैंने उससे कहा, सब्र रखो, ऊपर वाले ने चाहा तो तुम फिर से दूसरा निकाह करना और खुशी से रहना लेकिन मेरी बातें सुनकर वो और रोने लगा उसने कहा, तुम कुछ जानते नहीं हो इसलिए मुझे तसल्ली देने में लगे हो, तुमको नहीं पता मैं सिर्फ कुछ ही घंटों का मेहमान हूं।

मैं उसकी बातों को सुनकर परेशान हो गया तब उसने कहा, हमारे यहां एक रस्म है कि मरने वाले पति के साथ उसकी पत्नी और मरने वाली पत्नी के साथ उसका पति भी साथ में मरते हैं। इसलिए अब मैं भी अपनी पत्नी के साथ ही मारने के लिए ले जाया जाऊंगा। मैं इससे नहीं बच सकता। ये यहां का रिवाज है और सभी इसे मानते हैं। कोई इसके विरुद्ध नहीं जाता फिर वो बादशाह ही क्यों न हो।

उसकी बात सुनकर तो मेरे होश ही उड़ गए और मैं उसी समय से अपने विवाह और पत्नी को लेकर चिंता करने लगा। तभी मैंने देखा कि उसकी मृत पत्नी को नहला-धुला कर उसे निकाह के जोड़े में सजा कर अर्थी पर रखा गया है और उसके पति को मातम के वस्त्र पहना कर ले जाया जा रहा है। उसका पति रोता, अपनी किस्मत को कोसता हुआ पीछे-पीछे चला जा रहा है।

फिर सभी लोग एक बड़े पहाड़ पर आकर रुक गए, उन लोगों ने एक बड़ी चट्टान हटाई और उसके नीचे बने बड़े, गहरे और अंधेरे गड्ढे में रस्सी से मृत पत्नी की अर्थी को गड्ढे में उतार दिया और उसके बाद उस रोते-बिलखते पति को भी कुछ रोटी और पानी के साथ गड्ढे में उतार कर उसपर चट्टान रखकर गड्ढे का मुंह बंद कर दिया। फिर सभी ने पति-पत्नी के लिए मातम किया, शोक मनाया और फिर सभी वापस लौट आए।

ये सब देखकर मेरे होश उड़ गए थे। मैंने सोचा ये कैसी बेकार की रस्म है जिसका कोई विरोध नहीं करता। काश मैं अपने ही देश में होता। मैं बहुत घबरा गया था और मैंने बादशाह से इस बारे में बात कि लेकिन बादशाह ने भी मेरी बात नहीं सुनी। बल्कि उन्होंने कहा ये सभी पर लागू है, मुझपर भी और इसे देश-विदेश सभी जगह माना जाता है। मैं बहुत घबरा गया था मैंने अब अपनी पत्नी का ज्यादा ख्याल रखना शुरू कर दिया है। लेकिन भाग्य के लिखे को कौन रोक सकता है।

एक दिन मेरी भी बेगम बीमार हुईं और ऐसी लाइलाज बीमारी उनके गले को पड़ी कि उनकी जान लेके छुटी। अब मेरा भी हाल वही था जो मेरे पड़ोसी का था। मैं रोता रहा और सभी से दया करने को कहता रहा। मैंने बादशाह से अपने अच्छे कामों के बदले दया करने की गुहार लगाई लेकिन मेरी एक नहीं सुनी गई। मुझे भी मेरी बेगम के पीछे-पीछे कुछ रोटी और पानी के साथ उस बड़े से पहाड़ के गहरे, अंधेरे गड्ढे में फेंक दिया गया।

ये गड्डा बहुत ज्यादा गहरा था और इसमें जितना ज्यादा अंधेरा था उतनी ज्यादा यहां बदबू भी थी। यहां लाशें सड़ी हुईं थीं, खौफनाक एहसास था। सड़ी-गली लाशों की बदबू इतनी तेज थी कि मेरा सर फट रहा था। मैं अपनी अर्थी को लेकर भागा लेकिन किधर जाना था ये नहीं पता था। वहां हर तरफ लाशें थीं और अंधेरे के साथ फैली बदबू थी।

मैंने इस मंजर को देख खुद को खूब कोसा, अपने परिवार को याद किया। खुदा के इस फैसले पर तोहमते लगाई और घंटों रोता-चिल्लाता रहा। मैं यही सोच रहा था कि क्या जरूरत थी मुझे एक और यात्रा करने की। मेरे सामने कोई रास्ता नहीं था मैं बस खुद को कोस रहा था। फिर घंटों बीते और भूख लगने लगी मैंने भूख को बढ़ता देख सब छोड़कर रोटी खाना सही समझा और वही किया।

कुछ दिनों तक ऐसा चला जब तक रोटियां बची थीं फिर सब खत्म होने जैसा लगा। मैं भूखा प्यासा इस गड्ढे में मरने की नौबत तक आ गई थी कि तभी ऊपर चट्टान के खुलने से उजाला हुआ। लोगों ने इस बार किसी मरे हुए पति के साथ उसकी विधवा को नीचे गड्ढे में उतार दिया था।

जब लोगों ने चट्टान को रख दिया और फिर से अंधेरा हुआ तब मैंने तपाक से एक हड्डी उठा कर उस विधवा के सर पर दे मारी और फिर लगातार उसे मारते हुए उसे मार डाला। मैंने उसकी रोटी और पानी लिया और कुछ दिनों तक ऐसे ही जीवित रहा। इसी तरह आगे भी जब कोई आता तब मैं उसे मार कर उसकी रोटी और पानी ले लेता और जीवित रहता। फिर एक बार महामारी ने उस द्वीप को अपने कब्जे में लिया और रोज ही कुछ लाशें गड्ढे में आने लगीं। मैंने सभी को मारकर उनकी रोटियां छीनी और जीवित रहा।

लेकिन फिर कुछ दिनों के बाद एक दिन मुझे किसी की सांसो की आवाज़ सुनाई दी। अंधेरे में कुछ दिखता तो था नहीं इसलिय मैंने सिर्फ आवाज़ पर ध्यान दिया और उसकी तरफ चल रहा था कि तभी मुझे पांवों की आवाज़ भी सुनाई दी लगा जैसे कोई भाग रहा है। मैंने ध्यान देकर सुना और बस पीछे चलता गया। फिर जैसे मुझे एक तेज चमकता तारा नजर आया। मैंने आगे बढ़कर देखा तो मेरी ख़ुशी हिलोरे मारने लगी, मुझे उम्मीद मिल गई थी।

ये एक बाहर जाने की जगह थी जो शायद किसी जानवर के आने-जाने से बन गई थी। ये छेद पहाड़ की दूसरी तरफ ढाल की तरफ था, जहां लोगों का ध्यान नहीं जाता था। इस पहाड़ के गड्ढे में लाशों को खाने के लिए यहां कोई जानवर आता जाता रहा होगा इसलिए यह इतना बड़ा हो गया था कि मैं इसमें से निकल सकता था। मैंने ऊपर वाले का शुक्र मनाया और बाहर बदबू से निकल कर सोचना शुरू किया। लंबे समय बाद आसमान देखकर और हवा में आकर जैसे मैं फिर से जीवित हो गया था। मैंने सोच लिया था कि मुझे क्या करना है।

फिर, मैं एक बार फिर अंदर गड्ढे में गया और सभी लाशों को टोल-मटोल कर उन पर मौजूद गहने, आभूषण और जेवरात ले आया। वहां पड़ी लाशों से कफन लिया और सब कुछ बांध कर रख लिया। अब मैं बाहर निकल आया और समुद्र की तरफ चलते हुए कुछ दिन फल आदि खा कर बिताए। इस तरह तीन दिन गुजर गए थे।

चौथे दिन की शुरुआत थी कि तभी मुझे सामने से आता एक जहाज दिखाई दिया। मैंने हवा में हाथ हिलाते हुए खूब चिल्लाते हुए उसे बुलाया। मेरी बहुत कोशिशों के बाद मेरी आवाज़ जहाज के कप्तान तक पहुंची उसने रुक कर मेरे लिए नाव भेजी। नाविक ने मुझे नाव में बैठाया और मुझसे मेरे हाल के बारे में पूछा। मैं सकपका गया सोचा सच कहूं या नहीं। फिर मैंने अपने जहाज के डूबने और साथियों से बिछड़ जाने की कहानी उन्हें सुना दी। नाविक मुझे जहाज तक ले आए। अब जब कप्तान ने मुझसे मेरा हाल पूछा तब मैंने फिर वही कहानी उसे सुना दी।

मैंने उसकी कृपा के बदले उसे कुछ रत्न देने को कहा लेकिन उसने इनकार कर दिया और फिर हमने कई द्वीप पार किए। हमने सरान से नील द्वीप का सफर किया। फिर वहां से कली द्वीप पहुंचे जहां कई बेशकीमती वस्तुएं बाजारों में मिलती हैं। वहां हिंदुस्तान की भी कई वस्तुएं मिलती हैं। यहां हर द्वीप पर हमने सामान खरीदा-बेचा और व्यापार करते हुए हम बसरा आ गए जहां से मैं बगदाद आ गया।

मुझे इन सभी जगहों से व्यापार करते हुए असीमित धन मिला जिसको मैंने अच्छे कामों में लगाया। मैंने कई मस्जिदें बनवाई, दान दिया और फिर अपनी जिंदगी मजे से जीने लगा।

इस तरह सिंदबाद ने अपनी चौथी जहाजी यात्रा को भी समाप्त किया और फिर हिंदबाद को चार सौ दीनारें देते हुए अगले रोज फिर आने को कहा। अगले दिन सब एक बार फिर जमा हुए और भोजन के बाद सिंदबाद ने एक बार फिर अपनी हैरतअंगेज पांचवी यात्रा का वर्णन करना शुरू किया, तो क्या होगा सिंदबाद की अगली यात्रा में, कितने रहस्यमयी, रोमाचंक सफर से गुजरेगा सिंदबाद, क्या सिंदबाद हर बार बच कर निकल जाएगा या अगली यात्रा उसकी अंतिम यात्रा होगी। जानने के लिए पढ़ते रहिए।

अलिफ लैला स्त्री और उसके हत्यारे की कहानी - Alif Laila The Story of a Woman and Her Murderer

Alif Laila stree aur hathyara woman and his killer story

खलीफा हारूं रशीद अपने राज्य के लोगों का सुख-दुख जानने के लिए अक्सर भेष बदलकर बगदाद की सड़कों पर घूमा करते थे।

एक दिन उसने अपने मंत्री जाफर को बुलाया और कहा कि मैं आज रात फिर से भेष बदल कर शहर में चक्कर लगाऊंगा। अगर उस दौरान कोई भी पहरेदार सोता मिला, तो उसे दंड दिया जाएगा, जबकि काम कर रहे मेहनती पहरेदारों को इनाम दूंगा।

मंत्री जाफर तय समय पर रात को खलीफा के पास पहुंचा। उसके साथ जासूसों का सरदार मसरूर भी था। इसके बाद तीनों आम नागरिकों का रूप बनाकर बगदाद शहर में घूमने लगे।

एक गली में उन लोगों ने एक आदमी को देखा। उसका कद लंबा और सफेद दाढ़ी थी। उसके पास एक जाल और नारियल के पत्तों से बना टोकरा था। खलीफा को उस पर दया आ गई और मंत्री को उसके करीब भेजा। मंत्री ने उससे पूछा कि तुम कौन हो और कहां जा रहे हो?

उसने कहा, “मैं गरीब मछुआरा हूं। आज मछली पकड़ने गया था, लेकिन काफी कोशिश करने के बाद भी शाम तक कोई मछली जाल में नहीं फंसी। अब मुझे मजबूरन खाली हाथ घर जाना पड़ रहा है। घर में मेरी बीवी और बच्चे इंतजार कर रहे हैं। मुझे समझ नहीं आ रहा कि आज उनका पेट कैसे भरूंगा।”

मछुआरे की बात सुनकर खलीफा को उस पर दया आ गई और उन्होंने कहा, “तुम एक बार फिर नदी पर चलो और जाल फेंको। तुम्हारे जाल में कुछ फंसे या न फंसे, लेकिन मैं तुम्हें 400 सिक्के दूंगा और तुम्हारे जाल में जो कुछ आएगा, उसे मैं ले लूंगा।” मछुआरा खुद को भाग्यशाली मानता हुआ फिर से नदी के किनारे पहुंचा और ऊपर वाले को याद करके जाल फेंक दिया। जब उसे लगा कि जाल में कुछ फंस गया है और उसने उसे खींच लिया। बाहर निकालने पर पता चला कि उसमें एक भारी संदूक फंसा हुआ है। अपने वादे के मुताबिक, खलीफा ने मछुआरे को 400 सिक्के दे दिए।

खलीफा को उस संदूक को देखकर बेहद हैरानी हुआ कि आखिर इसमें क्या है। उसके कहने पर जाफर और मसरूर ने संदूक को महल में रखवा दिया। वहां लेकर जब संदुक को खोला गया, तो उसमें नारियल की चटाई मिली, जिसमें किसी चीज को डालकर सिल दिया गया था। खलीफा यह देखकर और बेचैन हो गया और सिलाई काटी गई, तो उसके अंदर से एक सुंदर स्त्री की लाश मिली, जिसे टुकड़े-टुकड़े करके चटाई के अंदर सिली दिया गया था।

यह देखकर खलीफा को बहुत गुस्सा आया और उसने मंत्री पर नाराजगी जताते हुए कहा, “तुम्हारे रहते शहर में ये क्या हो रहा है। मेरे राज में किसी स्त्री की इस तरह से हत्या हो जाती है और किसी को पता भी नहीं चलता। ये मुझे बिल्कुल भी बर्दाश्त नहीं है। अब तुम या तो उस हत्यारे का पता लगाओ या फिर तुम और तुम्हारे 40 रिश्तेदारों को फांसी पर लटकवा दूंगा।”

खलीफा की बात सुनकर मंत्री सन्न रह गया। उसने कहा कि मुझे कुछ तो समय दीजिए, जिस पर खलीफा ने उसे हत्यारे को खोजने के लिए तीन दिन की मोहलत दी।

मंत्री जाफर परेशान होकर अपने भवन लौटा और सोचने लगा कि भला तीन दिन में हत्यारे का पता कैसे चलेगा। अगर लगा भी लिया, तो उसके हत्यारे होने का सबूत कहां से लाऊंगा। फिर उसने सोचा कि अगर पहले से ही जेल में बंद किसी अपराधी पर ही हत्या का इल्जाम लगा दूं, तो कैसा रहेगा? फिर दूसरे ही पल उसने सोचा कि खुद को बचाने के लिए किसी और को मौत के मुंह में धकेलना सही नहीं होगा। ऊपर वाला भी उसे माफ नहीं करेगा।

मंत्री ने सभी सिपाहियों को तीन दिन के अंदर महिला के हत्यारे को खोजने का आदेश दिया। वो सभी तीन दिन तक घर-घर जाकर उस हत्यारे का पता लगाते रहे, लेकिन उसका कहीं पता नहीं चला। तीन दिन बाद खलीफा के आदेश पर जाफर और उसके 40 परिवार वालों को खलीफा के सामने पकड़कर लाया गया। खलीफा अब भी गुस्से में था, इसलिए उसने उन सभी को फांसी देने का आदेश दिया।

फिर मंत्री और उसके परिवार वालों की गर्दनों में फांसी का फंदा डाल दिया गया। यह देखने के लिए पूरे शहर की भीड़ वहां इकट्ठा हो गई। सभी मंत्री के अच्छे व्यवहार और न्यायप्रियता के कारण लोग उससे बहुत प्यार करते थे। कई लोग यह नजारा देखकर रोने लगे, लेकिन किसी में इतना साहस नहीं था कि वो खलीफा के सामने मंत्री के मृत्यु दंड का विरोध कर सके।

जल्लाद सभी को फांसी पर लटकाने ही लगा था कि एक सुंदर युवक भीड़ से निकलकर आया और बोला, “मंत्री और उसके परिजनों को छोड़ दिया जाए, क्योंकि स्त्री का हत्यारा मैं हूं।” यह सुनने के बाद मंत्री अपनी जान बचने से तो खुश था, लेकिन उस युवक की तय मौत के बारे में सोचकर बहुत दुखी हुआ। अभी मंत्री यह सब सोच ही रहा था कि भीड़ से एक बूढ़ा आदमी आया और बोला, “यह युवक झूठ बोल रहा है। स्त्री को मैंने मारा है, इसलिए दंड मुझे दिया जाए।”

उस बूढ़े आदमी ने युवक से कहा कि बेटा तुम क्यों फांसी चढ़ना चाहते हो। मैंने बहुत दुनिया देख ली है, इसलिए मुझे फांसी पर चढ़ जाने दो, लेकिन वह युवक इस बात पर कायम रहा कि स्त्री का हत्यारा वो ही है।

सैनिकों ने तुरंत सारा वाक्या खलीफा को सुनाया। इसके बाद खलीफा ने मंत्री और उसके परिवार को छोड़ने का आदेश दिया और कहा कि मंत्री को सम्मान के साथ उसके पास लाया जाए और कहा कि अगर बुजुर्ग और युवक दोनों ही खुद को हत्यारा बता रहे हैं, तो दोनों को फांसी पर चढ़ा दो, लेकिन मंत्री ने कहा कि उनमें से एक झूठ बोल रहा है, इसलिए बिना सोचे किसी को सजा देना गलत होगा।

उन दोनों को खलीफा के सामने लाया गया। युवक ने खुदा की सौगंध खाकर कहा, “मैंने ही चार दिन पहले उस स्त्री की हत्या की थी और उसके शव को टुकड़े-टुकड़े करके संदूक में बंद करके नदी में डाल दिया था। अगर मैं झूठ बोल रहा हूं, तो खुदा मुझे दंड दे।” यह सुनकर बूढ़ा चुप रह गया। युवक की बात सुनकर खलीफा को यकीन हो गया कि वही हत्यारा है। खलीफा ने कहा, “क्या उस स्त्री को मारते समय मेरा या खुदा का डर नहीं लगा और अब क्यों अपना अपराध स्वीकार कर रहे हो?” युवक बोला, “अगर आप आदेश दें, तो मैं सारी कहानी सुनाऊं। मैं चाहता हूं कि इस कहानी को लिखा जाए, ताकि सबको इससे सीख मिले।” खलीफा ने कहा, “ठीक है, ऐसा ही होगा।”

युवक ने क्या कहानी सुनाई जानने के लिए पढ़ें अगली स्टोरी।

अलिफ लैला दूसरे फकीर की कहानी - Alif Laila The Story of Another Fakir

Alif Laila second Fakeer story

पहले फकीर की कहानी सुनकर सब लोग हैरान थे। तभी जुबैदा ने दूसरे फकीर को अपना किस्सा सुनाने को कहा। दूसरे फकीर सुकेब ने बताया कि मैं भी एक बादशाह का बेटा हूं। बचपन से ही मैं पढ़ने में अच्छा था, इसलिए कई शिक्षक मुझे घर में ही पढ़ाने आते थे। बहुत कम उम्र में मैंने सारे धर्म की किताबों में जो भी लिखा था उसे याद कर लिया था। मेरे दिमाग और ज्ञान की वजह से मुझे सभी पसंद करते थे। गणित, इतिहास जैसे सभी विषयों पर मेरी अच्छी पकड़ थी।

मेरी तारीफ सुनकर एक दिन हिंदुस्तान के बादशाह ने मुझे मिलने के लिए बुलाया। पिता के राजमहल में बादशाह ने खूब सारे मोती और बेशकीमती चीजें भेजकर मेरे लिए बुलावा भिजवाया था। यह सब देखकर मेरे पिता खुश थे, उन्हें लगा कि हिंदुस्तान के बादशाह से मेलजोल बढ़ाना जरूरी है, क्योंकि आगे चलकर अपना राजमहल मुझे ही चलाना है। इसी सोच के साथ पिता जी ने मुझे बादशाह के महल भेज दिया।

कुछ सेवक के साथ बादशाह के लिए भेट और रास्ते के लिए खाने-पीने की चीजें लेकर मैं हिंदुस्तान के बादशाह से मिलने के लिए रवाना हो गया। तीन दिनों की यात्रा के बाद किसी जंगल के पास करीब 10 से 20 लुटेरों ने गहने से लदे मेरे घोड़े रोककर सारा सामान छीन लिया। यह सब देखकर मैंने उनसे कहा कि मैं हिंदुस्तान का बादशाह का का रिश्तेदार हूं, लेकिन वो डरे नहीं और सब लोगों पर हमला करने लगे। बहुत देर तक उनसे लड़ने के बाद मैं किसी तरह से उनसे बचकर घोड़े पर बैठकर निकल गया।

कुछ दूर जाते ही घोड़ा घायल होने की वजह से मर गया और मैं भी चोट लगने के कारण चल नहीं पाया। प्यास और भूख के मारे मेरी हालत खराब थी और यह डर भी लग रहा था कि कहीं गुंडे फिर मुझे न पकड़ ले। तभी मैंने अपने कपड़े को फाड़कर अपने घाव पर पट्टी बांधी और कुछ दूर चला। तभी एक गुफा दिखाई दी। शाम हो चुकी थी, इसलिए मैं उसी गुफा में चला गया और वहां रात बिताई। आसपास पेड़ थे, तो मैंने फल खाकर अपनी भूख भी मिटा ली।

अब सुबह होते ही कुछ फलों को लेकर मैं दोबारा आगे चलने लगा। चलते-चलते एक नदी मिली, जहां मैंने पानी पिया। पास ही एक राज्य दिखा, तो मैं काम की तलाश में उधर चला गया। मैं कुछ दिन वहां रुका और आसपास घूमने लगा। मेरे पांव फटे हुए थे, बाल व दाढ़ी बढ़ गई थी और कपड़े गंदे होने के साथ ही फट गए थे। सबने मुझे फकीर समझकर कुछ खाने को दे दिया।

एक-दो दिन बाद मैं एक सरकारी क्लर्क के पास गया और कहा कि मैं आपके हिसाब-किताब के काम में मदद कर सकता हूं। जब सरकारी क्लर्क ने मुझसे मेरे बारे में पूछा, तो मैंने सब कुछ बताया दिया। यह सुनकर वह बहुत डर गया और उसने कहा कि भले ही तुमने मुझे सच बता दिया हो, लेकिन इसके बारे में किसी और को बिल्कुल मत बताना। तुम बादशाह के पास नहीं पहुंचे थे, इसलिए अब वो तुम्हारा और तुम्हारे पिता का दुश्मन बन गया है। इस राज्य में सभी लोग बादशाह को खूब मानते हैं और उनके लिए कुछ भी कर सकते हैं। अगर किसी को पता चला कि तुम सुकेब हो, जिसे बादशाह ने बुलाया था और तुम वहां गए नहीं, तो वो तुम्हें छोड़ेंगे नहीं।

मैंने उस व्यक्ति का धन्यवाद करते हुए कहा कि मैं अपने बारे में अब किसी को भी नहीं बताऊंगा। मुझे भूखा और थका हुआ देखकर उसने कुछ खाने को दिया और कुछ देर आराम करने के लिए जगह दी। अच्छे से आराम करने
के बाद उसने मुझसे पूछा कि मुझे क्या-क्या काम आता है। तब मैंने उसे अपने सारे कौशल और विद्या के बारे में बता दिया।

यह सब सुनकर उसने कहा कि ऐसी विद्या और कौशल का मुझे कोई काम नहीं है। हां, तुम दिखने में हट्टे-कट्टे लगते हो, तो तुम जंगल में जाकर लकड़ियां ला सकते हो, जिसका बाजार में अच्छा दाम मिलेगा। मुझे लकड़ी काटने का काम नहीं आता था, लेकिन जिंदा रहने के लिए कुछ काम करना जरूरी था। मैं काम के लिए तैयार हो गया। उसने मुझे कुल्हाड़ी व रस्सी देकर जंगल जाने को कहा और कुछ लकड़हारों से मुलाकात करवा दी।

मैं रोज लकड़हारों के साथ जंगल लकड़ियां काटने के लिए जाता और उसे लाकर शहर में बेच देता था। हर बार लकड़ी बेचने पर मुझे स्वर्ण मुद्रा मिलती थी। कुछ समय बाद मेरे पास बहुत सारे सोने के सिक्के हो गए। उसके बाद मैंने उस सरकारी क्लर्क के पास जाकर सही राह दिखाने के लिए सोने के सिक्के दे दिए। फिर इसी तरह से लकड़ी काटते-काटते एक साल से ज्यादा समय हो गया।

एक दिन मैं लकड़ी काटने के लिए जंगल गया और वहां मुझे एक अच्छा पेड़ दिखा। तभी उससे आगे एक और घना जंगल दिखा, तो मैं उधर बढ़ गया। वहां जाकर मैंने लकड़ी काटनी शुरू की। तब मुझे एक लोहे का कड़ा दिखा। मैंने मिट्टी हटाकर देखा, तो वो लोहे के दरवाजे से लगा हुआ था। मैंने उसे ऊपर की ओर उठाया, तो वहां मुझे सीढ़ी दिखी। मैं वहां अपनी रस्सी और कुल्हाड़ी लेकर उतर गया। उस जगह में एक बड़ा सा मकान था, जिसके खंभे सोने के बने हुए थे। वहां एक सुंदर सी लड़की बैठी हुई थी।

मुझे देखते ही उस लड़की ने पूछा कि तुम इंसान हो या जिन्न? मैंने बताया कि मैं इंसान हूं। यह सुनते ही उसने कहा कि तुम्हारी जान यहां खतरे में आ जाएगी, जल्दी से चले जाओ। उसकी आवाज सुनकर जैसे मुझपर जादू चल गया। मैं कुछ देर चुपचाप वही खड़ा रहा। उसके बाद मैंने उस लड़की से कहा कि तुम इस जगह पर बिल्कुल भी खुश नहीं लग रही हो, क्या बात है। मेरी बात सुनकर उसने कहा कि यह जादुई जगह है और यहां सारी सुख-सुविधा है, लेकिन मुझे ये जगह बिल्कुल अच्छी नहीं लगती।

फिर मैंने उससे पूछा कि वो यहां कैसे पहुंची? उसने बताया कि वो आबनूस द्वीपों के बादशाह अबू तैमूरस की बेटी है। मेरे पिता ने मेरी शादी एक राजकुमार से कराई थी। जब मैं उसके साथ शादी के बाद घर जा रही थी, तभी एक जिन्न मुझे रास्ते से उठाकर यहां लेकर आ गया। वो हर दस दिन में यहां आता है और मुझे उसकी सेवा करनी होती है।

इतना सब बताने के बाद उसने मुझे अच्छा खाना खिलाया और आराम करने को कहा। कुछ देर बाद मैंने उस लड़की से कहा कि अगर वो खुश नहीं है, तो उसे मेरे साथ बाहर चलना चाहिए। तब उस युवती ने कहा कि देखो,मैं यहां से बाहर गई, तो जिन्न मुझे मार डालेगा। अगर तुम चाहो, तो यहां जिन्न के जाने बाद आ सकते हो। वो हर दस दिन में यहां आता है, तुम बाकी के नौ दिन इस गुफा में आ सकते हो। यह सुनकर मैं खुश हो गया और नहाने के लिए बाथरूम में चला गया। फिर लड़की ने मुझे शाही कपड़े पहनने के लिए दिए। मैंने उसके साथ पूरा एक दिन बिताया।

इस बीच मुझे उस लड़की से लगाव हो गया, जिस वजह से मैं उससे गुफा के बाहर चलने की जिद करता रहा। उसने दोबारा मना करते हुए बताया कि वो जिन्न बहुत ताकतवर है और यहां उसने एक लैंप रखा है, जिसे छूने पर वह जिन्न आ जाता है। लड़की बात पूरी सुने बिना ही मैंने गुस्से में वो लैंप छू दिया और मैं जिन्न को मारने की योजना बनाने लगा।

उसे छूते ही भूकंप आने लगा और वहां अंधेरा छा गया। उस युवती ने मुझे समझाकर वहां से बाहर जाने को कहा। इधर, मैं डरकर बाहर उसी सीढ़ी में पहुंच गया, जहां से अंदर आया था। उधर, वह जिन्न अंदर पहुंच गया। उसने लड़की से पूछा कि उसने लैंप छूकर उसे क्यों बुलाया। तभी जिन्न ने वहां मेरी कुल्हाड़ी और रस्सी देख ली, जिसे मैं हड़बड़ाहट में अंदर ही छोड़ आया था।

तभी मैं डरकर वहां से भागा और उसी क्लर्क के पास पहुंच गया, जिन्होंने मुझे लकड़ी काटने का काम दिया था। वह मुझे देखकर खुश हो गया और पूछा कि मैं पूरा एक दिन कहा था। मैं डरा हुआ था, इसलिए मैंने उन्हें कुछ नहीं बताया। मैं नहाया और खाना खाकर सो गया।

कुछ देर बाद एक व्यक्ति उस क्लर्क के घर मेरी कुल्हाड़ी और रस्सी लेकर पहुंचा। मैं समझ गया कि यह वही जिन्न है, लेकिन सच जानने के लिए अपना रूप बदलकर आया है। डर के मारे कुछ ही देर में मैं बेहोश हो गया और वो मुझे बेहोशी की हालत में ही उठाकर अपने साथ लेकर एक पहाड़ में चला गया। तभी मुझे होश आया और मैं खुद को इतनी ऊंचाई में देखकर डर गया। तभी उस जिन्न ने एक पैर मारा और मैं उसी घर में पहुंच गया जहां वह युवती थी।

मैंने वहां देखा कि वो लड़की जमीन पर गिरी हुई और दर्द के मारे रो रही थी। तब जिन्न ने मुझे कहा कि तू यही आया था न अब मैं तुझे मार डालूंगा। इतना सुनते ही उस लड़की ने कहा कि नहीं मैं इन्हें नहीं जानती हूं जिन्न, तुम इसे क्यों मार रहे हो। मैंने इसे पहली बार यहां देखा है। यह सुनकर जिन्न को और गुस्सा आया और उसने लड़की के हाथ में मेरी कुल्हाड़ी देकर कहा कि तू इसे नहीं जानती है, इसलिए अब तू ही इसे जान से मारेगी।

लड़की ने मुझे मारने से मना कर दिया, जिससे जिन्न का शक यकीन में बदल गया। जिन्न ने कहा कि जब तू इसे जानती ही नहीं है, तो इसे मार क्यों नहीं देती। उसके बाद जिन्न ने मुझे कहा कि अगर तू इस लड़की को नहीं पहचानता है, तो कुल्हाड़ी उठाकर इसे मार दे। मैं परेशान हो गया और तभी युवती ने मेरी तरफ इशारा करके कहा कि मुझे मारकर अपनी जान बचा लो। वैसे भी यह जिन्न मुझे मार ही डालेगा।

लड़की का इशारा मिलने के बाद भी मैं उसे मार नहीं पाया। मेरे मन में हुआ कि मेरी वजह से ही यह इतनी परेशानी में घिर गई है और मैं ही इसे मार दू, यह तो पाप होगा। उसके बाद मैंने जिन्न से कहा कि मैं किसी भी स्त्री पर हाथ नहीं उठाता हूं। तुम मुझे किसी को जान से मारने के लिए कह रहे हो, यह मैं बिल्कुल नहीं करूंगा। तुमने इसका वैसे ही बुरा हाल कर रखा है और यह तुम्हारी स्त्री है, तो इसके साथ जो भी करना है तुम करो। मुझे इन सब से दूर ही रखो।

जिन्न गुस्से में बोला कि तुम दोनों को पता नहीं है कि मैं कितना शक्तिशाली हूं। ऐसा कहते ही उसने लड़की के दोनों हाथ काट दिए। वो लड़की जमीन में गिर गई और मैं भी बेहोश हो गया। जब मुझे होश आया, तो जिन्न ने कहा कि इस लड़की को मैंने धोखे की सजा दे दी है, लेकिन मुझे यह नहीं पता कि यहां तुम ही आए थे या कोई दूसरा। इसी वजह से मैं तुम्हें जान से नहीं मारूंगा, लेकिन तुम्हें इंसान भी रहने नहीं दूंगा। जादू से अभी जानवर बना दूंगा। बताओ, तुम्हें कौन सा जानवर बनना पसंद है।

तब मैंने उनसे कहा कि मुझपर दिया करो और जानवर न बनाएं। यह सुनकर जिन्न ने बताया कि यह उसकी दुनिया का नियम है, इसलिए वो मुझे जानवर जरूर बनाएगा।

यह बात सुनकर मैंने कहा, “जिन्नों के सरताज मुझ पर कृपा करो। ठीक उसी तरह जैसे एक भले आदमी ने अपने साथ बुरा करने वाले पर उपकार किया था, उसकी जैसी दया दिखाकर मुझे छोड़ दो।” मेरी बात सुनने के बाद जिन्न ने पूछा कि कौन है भला आदमी और उसकी कहानी क्या है?

दूसरे फकीर सुबेर ने जिन्न को भले आदमी की कहानी सुनना शुरू किया। आप इस कहानी को जानने के लिए हमारी दूसरी स्टोरी पढ़ें।

अलिफ लैला अमात्य की कहानी - Alif Laila Story of Amatya

Alif Laila Amatya Vajeer story

बादशाह ग्रीक के कहने पर मंत्री ने उसे ‘अमात्य की कहानी’ सुनाने हुए कहा कि प्राचीन समय में एक राजा था जिसका इकलौता बेटा था। राजकुमार को शिकार पर जाने का बहुत शौक था और राजा भी उसकी हर इच्छा पूरी करने से कभी पीछे नहीं हटता। एक बार राजकुमार ने घने जंगल में शिकार पर जाने की इच्छा जताई, तो राजा ने जंगल के सभी रास्तों की जानकारी रखने वाले अमात्य को बुलवाया और उसे आखेट के दौरान हर पल राजकुमार के साथ रहने का आदेश दिया।

राजा से आज्ञा लेकर अमात्य और कुछ सैनिकों को साथ लेकर राजकुमार घोड़े पर सवार होकर शिकार करने जंगल पहुंचा। कुछ देर तक शिकार को ढूंढने के बाद राजकुमार को सामने एक बारहसिंगा दिखाई दिया और वह उसका शिकार करने के लिए घोड़े से उसका पीछा करने लगा। अमात्य को लगा कि राजकुमार बारहसिंगे का शिकार कर लेगा, इसलिए वह उसके पीछे नहीं गया, लेकिन राजकुमार बारहसिंगा का पीछा करते हुए बहुत दूर तक निकल गया और रास्ता भटक गया। राजकुमार ने वापस अमात्य और सिपाहियों के पास लौटने की कोशिश की, लेकिन तब तक बेहद देर हो चुकी थी और वह उस घने जंगल में गुम हो गया था।

जंगल में अकेले यहां-वहां भटकते हुए राजकुमार ने देखा कि एक सुंदर महिला एक जगह पर अकेली बैठी रो रही थी। महिला को घने जंगल में देखकर राजकुमार को पहले तो अचंभा हुआ, फिर वह उसके पास पहुंचा और उससे पूछा कि वह जंगल में अकेली क्या कर रही है और उसके रोने का क्या कारण है? महिला ने राजकुमार को रोते हुए बताया कि वह अपने घोड़े पर सवार होकर घर जा रही थी, लेकिन रास्ते में उसे नींद आ गई और वह घोड़े से नीचे गिर गई और घोड़ा भी वहां से भाग गया। महिला ने कहा कि काफी देर से वह जंगल में भटक रही है, लेकिन उसे अब तक यहां से बाहर निकलने का रास्ता नहीं मिला।

राजकुमार को महिला की स्थिति पर दया आ गई। राजकुमार के पूछने पर महिला ने बताया कि उसे अपनी राजधानी का रास्ता पता है। महिला के कहने पर राजकुमार उसे अपने घोड़े पर बैठाकर उसके बताए रास्ते पर उसकी राजधानी की ओर चल पड़ा। कुछ दूर तक जाने के बाद दोनों एक गुफा के पास पहुंचे। वहां पहुंचते ही महिला ने जोर से आवाज लगाई, “बच्चों जल्दी बाहर आ जाओ, मैं तुम्हारे खाने के लिए एक तंदुरुस्त और मांसल आदमी लेकर आई हूं।” गुफा के भीतर से बच्चों ने उत्तर दिया, “मां, उसे जल्दी से हमारे पास लेकर आओ, हमें बहुत भूख लगी है।”

महिला और उसके बच्चों की बातें सुनकर राजकुमार बहुत डर गया। राजकुमार को यह समझने में क्षण भर का भी समय नहीं लगा कि वह स्त्री जरूर नरभक्षी वनवासियों की प्रजाति से है, जो इंसानों को खाते हैं। अपनी जान पर आई आफत से भयभीत होकर राजकुमार ने ईश्वर को याद करते हुए प्रार्थना की, “हे प्रभु, तू अगर सर्वशक्तिमान है, तो मुझे इस मौत के मुंह से बचा ले और मुझे इस घने जंगल से निकलने का रास्ता दिखा।” राजकुमार के इतना कहते ही वह महिला कहीं गायब हो गई और उसके बच्चों की भी कोई आवाज नहीं सुनाई दी।

नरभक्षी महिला से बचकर राजकुमार जंगल से बाहर निकलने का रास्ता ढूंढने लगा और खुशकिस्मती से उसे मार्ग मिल भी गया। राजकुमार जंगल से निकलकर सीधे महल पहुंचा और अपने पिता को घटना की पूरी जानकारी दी। राजकुमार की बातें सुनकर राजा को अमात्य पर बहुत गुस्सा आया और उसने अपने सेवकों को सीधा अमात्य को मौत के घाट उतारने का फरमान सुनाया।

बादशाह ग्रीक को ‘अमात्य की कहानी’ सुनाने के बाद मंत्री ने कहा कि उसने गुप्त सूत्रों के जरिए पता लगा है कि हकीम दूबां आपके दुश्मनों का गुप्तचर है और वह मौका पाकर आपको मारने की फिराक में है। मंत्री ने बाहशाह के मन में हकीम दूबां के प्रति संशय पैदा कर दिया। बादशाह ने मंत्री से कहा, “हो सकता है कि तुम ठीक बोल रहे हो और हकीम मुझे अभी निरोग करने के बाद मुझे धीरे-धीरे कष्ट देकर दर्दनाक मौत दे।”

मंत्री ने बादशाह के मन को भांप लिया और उसने सोचा कि इससे पहले कि बादशाह अपना इरादा बदल दे उसे हकीम दूबां को लेकर अपनी योजना आगे बढ़ानी चाहिए। मंत्री ने कहा, “यह हकीम कभी भी आपकी जान के लिए खतरा बन सकता है, इसलिए बादशाह आप उसे मारने का जल्द से जल्द फरमान सुनाएं।” मंत्री की बाद सुनकर बादशाह ने कहा कि ठीक है मैं अभी उसे बुलावा भेजता हूं।

मौत का फरमान सुनने के बाद जब हकीम को यकीन हो गया कि अब बादशाह उसकी एक नहीं सुनेगा, तो उसे पछतावा होने लगा कि उसने क्यों बादशाह का इलाज कर उसे कुष्ठ रोग से मुक्त किया होगा। हकीम ने बादशाह से कहा, “आप किसी की कही बातों में आकर मुझ निर्दोष को मार रहे हैं, लेकिन याद रखिए इस हत्या का बदले ईश्वर आपको सबक जरूर सिखाएगा।”

हकीम को मारने के लिए जैसे ही जल्लाद ने उसकी आंखों पर पट्टी बांधी, तो हकीम ने बादशाह से कहा कि मेरे प्राण लेने से पहले मुझे इतना समय दीजिए कि मैं घर जाकर अपनी वसीयत लिख लूं और अपनी चिकित्सकीय उपचार से संबंधित किताबें किसी ऐसे व्यक्ति को सौंप सकूं, जो उसका हकदार हो। साथ ही मेरे पास ऐसी किताब है, जिसे आप अपने पुस्तकालय में रख सकते हैं। हकीम ने कहा, “उस किताब में कई औषधियां व जड़ी-बूटियां हैं और कई बीमारियों का उपचार लिखा है। साथ ही उस पुस्तक के छठे पन्ने के बाएं ओर के पेज की तीसरी पंक्ति में कुछ ऐसा लिखा है, जिसे पढ़कर तुम्हारे हर सवालों का जवाब मेरा कटा सिर देगा।”

हकीम की बात सुनकर बादशाह को हैरानी हुई और उसने सैनिकों को आदेश दिया कि वे कड़े पहरे में हकीम को उसके घर लेकर जाएं और जब वह अपना काम निपटा ले, तो वह किताब लेकर हकीम को वापस ले आएं। हकीम ने रातभर अपना काम किया और दूसरे दिन रेशमी कपड़े में लिपटी एक मोटी-सी किताब लेकर सैनिकों के साथ वापस महल लौट आया।

हकीम ने मृत्यु दंड से पहले बादशाह से कहा, “मुझे मारने के बाद एक सोने की थाल प किताब पर लिपटे कपड़े को बिछा कर मेरे कटे हुए सिर को उसके ऊपर रख दें जिससे खून बहना बंद हो जाएगा और मेरे कहे अनुसार वो पंक्तियां पढ़ने पर मेरा कटा सिर हर सवाल का जवाब देगा।” इसके बाद बादशाह ने जल्लाद को हुक्म दिया कि वह उसका सिर कलम कर दे।

जल्लाद ने आदेश मिलते ही हकीम दूबां का सिर कलम कर दिया और हकीम के कहे अनुसार उसका कटा सिर थाल में कपड़े के ऊपर रखवा दिया। थाल में कटा सिर रखते ही सच में खून बहना बंद हो गया और कुछ देर बाद हकीम के कटे सिर ने आंखें खोल दी। हकीम के सिर ने बादशाह को कहा, “वह किताब के छठे पन्ने को खोले और बाएं पेज की तीसरी पंक्ति को पढ़े।” बादशाह ने किताब के पन्नों को पलटना शुरू किया, लेकिन पुस्तक के पन्ने आपस में चिपके होने के कारण बादशाह बार-बार उंगलियों पर थूक लगाकर पन्नों को अलग करना पड़ा।

बादशाह जब हकीम के कहे अनुसार उस पन्ने पर पहुंचा, तो वह लाइन खाली थी। इसे देखकर बादशाह गुस्से से झन्ना उठा। बादशाह की ऐसी स्थिति देखकर हकीम ने उसे बताया कि उसने हर एक पन्ने पर जहर लगाया हुआ था और उंगली पर लगे थूक से वह बादशाह के शरीर में प्रवेश कर चुका है। कुछ देर बाद ही बादशाह पर जहर का असर होने लगा और वह लड़खड़ा कर जमीन पर गिर गया और कुछ देर बाद प्राण त्याग दिए। इस तरह से बादशाह ग्रीक को उसकी करनी का फल मिल गया।

मछुवारे ने गागर में कैद राक्षस को “ग्रीक बादशाह और हकीम दूबां’ की कहानी सुनाने के बाद उससे कहा कि अगर बादशाह ग्रीक हकीम दूबां को नहीं मरवाता, तो उसे भी ऐसी मौत न मिलती। इसी प्रकार अगर तू इतने वर्षों तक गागर में कैद होकर बाहर निकलने के बाद भी मुझे मारने की इच्छा जाहिर नहीं करता, तो तुझे दोबारा इस गागर में कैद न होना पड़ता।”

मछुवारे की बात सुनकर राक्षस ने कहा, “हे भले इंसान, मैं गलत था और मुझे इस बात का एहसास हो गया है। मैं अब बाहर निकल कर तुझे मारने का प्रयास तो दूर विचार तक मन में नहीं लाऊंगा।” राक्षस ने कहा कि अगर मैं बुरा हूं, तो तुझे भलाई करनी चाहिए। तुझे भी मेरे साथ कुछ ऐसी ही भलाई करनी चाहिए जैसी इम्मा ने अतीका के साथ की थी।”

राक्षस की बात सुनकर मछुवारे ने कहा, “मैंने तो ऐसी किसी कहानी के बारे में नहीं सुना, क्या तुम मुझे ये कहानी सुनाओगे?” राक्षस ने कहा, “हां जरूर, लेकिन कहानी सुनने के लिए तुझे पहले मुझे आजाद करना होगा और अगर तुने मुझे गागर से निकाल दिया, तो मैं तुझे और भी बहुत सारी कहानियां सुनाऊंगा और धनी होने का उपाय भी बताऊंगा।” इस बार मछुवारे के मन में भी लालच आ गया और उसने राक्षस को अपनी बात से न पलटने की कसम दिलवाकर गागर का ढक्कन खोल दिया।

गागर का ढक्कन खुलते ही राक्षस धुएं के रूप में बाहर निकल गया और विशाल रूप लेकर सबसे पहले गागर को नदी में गिरा दिया। यह देखकर मछुवारा डर गया और उसे अपना वादा निभाने की दुहाई देने लगा। मछुवारे को डरा हुआ देख राक्षस ने कहा, “डर मत, मैं तुझे नहीं मारूंगा और मैं अपना वादा भी निभाऊंगा। अब तू बस अपना सामान समेट और मेरे पीछे आ जा।”

राक्षस के कहने पर मछुवारा आपना सामान लेकर उसके पीछे-पीछे चल पड़ा। दोनों एक पहाड़ की चोटी पर चढ़कर एक महल में पहुंचे, जिसके साथ ही चार ऊंचे चट्टानों से घिरा एक तालाब था। तालाब के पास राक्षस ने मछुवारे से तालाब में अपना जाल डालकर मछलियां पकड़ने के लिए कहा। पहली बार में जाल फेंकते ही मछुवारे के जाल में 4 मछलियां फंस गई। चारों मछलियों का रंग अलग-अलग था उनमें से एक लाल, दूसरी सफेद, तीसरी पीली और एक काली मछली थी।

राक्षस ने मछुवारे से कहा, “ये मछलियां बहुत बेशकीमती हैं। तू इन्हें यहां के बादशाह के पास लेकर जा। इन मछलियों के बदले बादशाह तुझे बहुत सारा धन देगा, जिससे तू अपनी इच्छाएं व जरूरतों को पूरा कर सकता है।” राक्षस ने कहा, “बस तुझे इतना ध्यान रखना है कि तालाब में जाल एक दिन में केवल एक बार ही डालना।” इतना कहते ही राक्षस दोबार धुएं में तब्दील हो गया और जमीन में समा गया।

राक्षस के कहे अनुसार मछुवारा उन 4 मछलियों को लेकर बादशाह के दरबार में पहुंचा। बादशाह मछलियों को देखकर बहुत खुश हुआ और अपने मंत्री से कहकर उसने तुरंत अपने बावर्चियों को इससे स्वादिष्ट पकवान बनाने का आदेश दिया। बादशाह ने प्रसन्न होकर मछुवारे को थैली भर कर सोने की मोहरें इनाम में दीं, जिसे पाकर वह खुशी-खुशी दरबार से लौट आया।

बादशाह के आदेश अनुसार मंत्री उन चारों मछलियों को लेकर महल के सबसे गुणी महिला बावर्ची के पास पहुंचा। बावर्चिन ने मछलियों का पकवान बनाने के लिए जैसे ही उन्हें काटकर गर्म तेल में भुनने की प्रक्रिया शुरू की, लेकिन तभी अचानक से रसोई की दीवार फट गई और उसके अंदर से सोने-चांदी के जेवरातों से सुसज्जित हाथ में बेहद कीमती छड़ी पकड़े एक सुंदर महिला बाहर निकली।

उस महिला को देखकर महिला बावर्ची हैरान हो गई और एक टक उसे देखती रही। उस सुंदर महिला ने छड़ी से एक मछली को छुआ और कहा, “हे मछली, क्या तुम्हें अपनी प्रतिज्ञा याद है और क्या तुम अब भी उस पर कायम हो?” महिला के ऐसा कहते ही मछलियां जीवित हो उठीं और एक स्वर में बोलने लगीं, “हमें अपनी प्रतिज्ञा याद है, अगर तुम हमारा कर्ज उतारोगी, तो हम भी तुम्हारा कर्ज उतारेंगे।” यह सुनते ही महिला ने कड़ाही को पलट दिया और मछलियां आग में जलकर राख हो गईं। इसके बाद वह महिला दोबारा दीवार में समा गई।

यह सब देखकर महिला बावर्ची अचंभित होकर होश खो बैठी और कुछ देर बात होश आने पर उसे ध्यान आया कि बादशाह मछलियों का सेवन करने के लिए इंतजार कर रहे हैं। बावर्चिन को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे और परेशान होकर माथा पकड़े रसोईघर के एक कोने में बैठ गई। जब कुछ देर बाद मंत्री मछलियों का पकवान लेने पहुंचा, तो बावर्चिन ने उसे पूरी आप बीती सुनाई। मंत्री को बावर्चिन की बात पर विश्वास नहीं हुआ, लेकिन बावर्चिन का हाल देखकर उसने उसकी शिकायत करना भी उचित नहीं समझा। इसके बाद मंत्री ने बहाना बनाते हुए बादशाह से कहा कि वह मछलियां खराब हो गई थीं और उसने मछुवारे को बुलाकर दोबारा वैसी ही मछलियां पकड़ कर लाने का आदेश दिया।

दूसरे दिन मछुवारा दोबारा तालाब से वैसी ही 4 मछलियां पकड़कर लाया और महल से अपना इनाम लेकर लौट गया। इस बार मंत्री ने बावर्चिन से अपने सामने मछलियों का पकवान बनाने के लिए कहा, लेकिन इस बार भी ठीक वैसे ही दीवार से सुंदर महिला निकली और मछलियों को उनकी प्रतिज्ञा याद दिलाकर कढ़ाई को आग में पलट कर चली गई। अपने आंखों के सामने सब कुछ होता देख मंत्री भी हक्का बक्का रह गया। इस बार उसने यह पूरी बात बादशाह को बता दी।

मंत्री से पूरी बात सुनने के बाद बादशाह को भी विश्वास नहीं हुआ, इसलिए उसने एक बार फिर मछुवारे को बुलवाया और अधिक सोने की मोहरें देकर दोबारा मछलियां पकड़ कर लाने को कहा। इस बार मछुवारे ने बादशाह से कहा कि वह आज ही के दिन मछलियां नहीं ला सकता, क्योंकि वह दिन में सिर्फ एक बार ही वैसी मछलियां पकड़ सकता है। पहले तो बादशाह ने ऐतराज जताया, लेकिन बाद में वह मछुवारे की बात से सहमत हो गया।

अगले दिन जब मछुवारा तीसरी बार पहले जैसी ही 4 मछलियों को पकड़ कर लाया, तो इस बार बादशाह खुद रसोई घर में पहुंचा और बावर्चिन को अपने सामने मछलियां पकाने का आदेश दिया। इस बार जब बावर्चिन मछलियों को पकाने लगी, तो फिर दीवार फटी, लेकिन इस बार महिला नहीं, बल्कि एक बलवान पुरुष निकला। बलवान ने भी महिला की भांति मछलियों से वही सवाल पूछा और फिर कढ़ाई पलटकर मछलियों को आग में गिरा दिया और खुद दीवार में गुम हो गया।

अपनी आंखों से सबकुछ देखने के बाद बादशाह ने फिर से मछुवारे को बुलाया और उससे मछलियों का रहस्य पूछा। पहले तो मछुवारा बादशाह के सवालों को टालने की कोशिश करने लगा, लेकिन जब बादशाह ने जोर देकर पूछा, तो उसने महल के पास तालाब की पूरी बात बादशाह को बता दी। बादशाह ने मछुवारे को उसे तालाब के पास ले जाने के लिए कहा और मछुवारे ने भी उसे वहां ले जाने की हामी भर दी।

मछलियों का रहस्य जानने की उत्सुकता से बादशाह अगले ही दिन मछुवारे के साथ अपने दरबार के कुछ मंत्रियों और सैनिकों को लेकर पहाड़ की ओर निकल पड़ा। चार ऊंचे चट्टानों से घिरे तालाब के पास पहुंचते ही बादशाह ने देखा कि तालाब में उसी प्रकार की अनेक मछलियां थीं, जिसे मछुवारा दरबार में लेकर आया था। बादशाह को आश्चर्य हुआ कि नगर से अधिक दूरी पर न होने के बावजूद आज तक किसी ने इस तालाब और महल को कैसे नहीं देखा।

बादशाह ने फैसला लिया कि वह तालाब और इन मछलियों का रहस्य जाने बिना वहां से नहीं जाएगा। इसलिए, उसने अपने साथ आए मंत्रियों व सैनिकों को वहीं आसपास डेरा डालने का आदेश दिया। रात होने पर भी जब बादशाह तालाब के रहस्य के बारे में कुछ जान नहीं पाया, तो उसने अपने एक विश्वासपात्र मंत्री को बुलवाया और उससे कहा कि वह अकेले ही रहस्य को उजागर करना चाहता है और अगली सुबह वह सभी दरबारियों व सैनिकों को वापस महल भेज दे।

मंत्री को आदेश देकर बादशाह ने अपने राजवस्त्र उतार कर एक आम सैनिक के कपड़े पहन लिए और हाथ में तलवार लेकर तालाब के पास पहाड़ पर चढ़ना शुरू कर दिया। पहाड़ चढ़ते-चढ़ते ही सुबह होने लगी और राजा को दूर जंगल में एक भवन दिखाई दिया। राजा को लगा कि वहां रहने वालों को जरूर तालाब का रहस्य पता होगा और इसी आस में वह भवन की ओर चल पड़ा।

कुछ देर बाद ही बादशाह जंगल के बीच काले पत्थरों से बने भवन के पास पहुंचा। बादशाह ने देखा कि भवन का मुख्य द्वार खुला हुआ था। फिर भी बादशाह ने शिष्टाचार के नाते दरवाजा खटखटाया और किसी के बाहर आने का इंतजार करने लगा। जब काफी देर तक कोई बाहर नहीं निकला, तो बादशाह को क्रोध आ गया और उसने सीधा भवन के अंदर प्रवेश करना ही बेहतर समझा। बादशाह ने देखा कि अंदर से भवन सोने, चांदी व हीरों से सजा हुआ है और फल व फूलों के बड़े-बड़े बाग व सजावटी फव्वारे भवन की शोभा बढ़ा रहे हैं, लेकिन वहां कोई मौजूद नहीं है। काफी देर तक भवन में घूमने के बाद बादशाह थक कर एक पेड़ के नीचे आराम करने लगा।

बादशाह ने आराम करने के लिए आंखें बंद ही की थी कि उसे किसी के दर्द में कराहने की आवाज सुनाई दी। ध्यान से सुनने पर बादशाह ने पाया कि आवाज भवन के एक कमरे से आ रही थी और लग रहा था जैसे कोई शख्स दर्द में रो रहा है। बादशाह आवाज को सुनते हुए उस कमरे में पहुंचा जहां से विलाप की आवाज आ रही थी। बादशाह जैसे ही कमरे के अंदर पहुंचा उसने देखा कि सिंहासन पर राजवस्त्र पहने एक नौजवान युवक बैठा हुआ है दर्द में रोए जा रहा है।

बादशाह ने युवक को सलाम किया, तो जवाब में उसने भी बादशाह का अभिवादन करते हुए स्वागत में खड़े न हो पाने के लिए खेद जताया। बादशाह ने युवक से उसके दर्द में कराहने का कारण जानना चाहा और पूछा कि क्या वह उसकी कोई मदद कर सकते हैं? बादशाह की बात सुनकर नौजवान और जोरों से रोने लगा और रोते हुए उसने अपनी गोद व टांगों को ढकने वाले कपड़े को उठाया। जिसे देखकर बादशाह अचंभित रह गया।

बादशाह ने देखा कि नौजवान का कमर से ऊपर का शरीर इंसानों का है जबकि उसकी कमर से नीचे का भाग काले पत्थर का बना है। अपने को कुछ संभालते हुए बादशाह ने युवक से पूछा कि उसका यह हाल कैसे हुआ और क्या इसका संबंध उस रहस्यमयी तालाब की रंग बिरंगी मछलियों से है? बादशाह के सवाल को सुनकर नौजवान ने कहा कि वैसे तो जब भी मैं अपनी दशा के बारे में किसी को भी बताता हूं, तो मेरी हालत और भी बदतर हो जाती है, लेकिन अगर तुम जानना ही चाहते हो, तो मैं तुम्हें यह बता सकता हूं। अगले भाग में पढ़ें, युवक की कहानी।