08 March 2022

चोर की दाढ़ी में तिनका - A speck in the beard of a thief

बच्चों, अकबर और बीरबल के कई कहानियां प्रसिद्ध हैं। यह कहानियों सभी के दिल में अपनी छाप छोड़ने के साथ-साथ अच्छी शिक्षा देना का भी काम करती हैं। उन्हीं में से एक है, चोर की दाढ़ी में तिनका।

एक बार की बात है, बादशाह अकबर की सबसे प्यारी अंगूठी अचानक गुम हो गई थी। बहुत ढूंढने पर भी वह नहीं मिली। इस कारण बादशाह अकबर चिंतित हो जाते हैं और इस बात का जिक्र बीरबल से करते हैं। इस पर बीरबल, महाराजा अकबर से पूछते हैं, ‘महाराज, आपने अंगूठी कब उतारी थी और उसे कहां रखा था।’ बादशाह अकबर कहते हैं, ‘मैंने नहाने से पहले अपनी अंगूठी को अलमारी में रखा था और जब वापस आया, तो अंगूठी अलमारी में नहीं थी।’

फिर बीरबल, अकबर से कहते हैं, ‘तब तो अंगूठी गुम नहीं चोरी हुई है और यह सब महल में साफ-सफाई करने वाले किसी कर्मचारी ने ही किया होगा।’ यह सुनकर बादशाह ने सभी सेवकों को हाजिर होने को कहा। उनके कमरे में साफ-सफाई करने के लिए कुछ 5 कर्मचारी तैनात थे और पांचों हाजिर हो गए।

सेवकों के हाजिर होने के बाद बीरबल ने उन सभी को कहा, ‘महाराज की अंगूठी चोरी हो गई है, जो अलमारी में रखी थी। अगर आप में से किसी ने उठाई है, तो बता दे, वरना मुझे अलमारी से ही पूछना पड़ेगा।’ फिर बीरबल अलमारी के पास जाकर कुछ फुसफुसाने लगे। इसके बाद मुस्कुराते हुए पांचों सेवकों से कहा, ‘चोर मुझसे बच नहीं सकता है, क्योंकि चोर की दाढ़ी में तिनका है।’ यह बात सुनकर उन पांचों में से एक ने सबसे नजर बचाकर दाढ़ी में हाथ फेरा जैसे कि वह तिनका निकालने की कोशिश कर रहा हो। इसी बीच बीरबल की नजर उस पर पड़ गई और सिपाहियों को तुरंत चोर को गिरफ्तार करने का आदेश दिया।

जब बादशाह अकबर ने उससे सख्ती से पूछा, तो उसने अपना गुनाह काबुल कर लिया और बादशाह की अंगूठी वापस कर दी। बादशाह अकबर अपनी अंगूठी पाकर बेहद प्रसन्न हुए।

चोर की दाढ़ी में तिनका कहानी से सीख

इस कहानी से यह सीख मिलती है कि ताकत की जगह दिमाग का इस्तेमाल करने से हर समस्या का हल मिल सकता है।

राजा और उसकी तीन बेटियों की कहानी  | The King And His Three Daughters Story In Hindi

The King And His Three Daughters Story In Hindi

बहुत समय पहले एक राजा था, जो खुद के बारे में सोचता था कि वह बहुत ही नेक सोच, दयालु स्वाभाव और दरियादिली है। उसे लगता था कि वह स्थितियों को सही से समझने, हर बात पर न्याय करने और हर विषय में उचित विचार रखने वाला व्यक्ति है।

राजा की तीन बेटियां थीं। एक दिन उसने अपनी बेटियों को बुलाकर कहा, ‘मेरे पास जो भी है, वो सब तुम्हारा है। तुम तीनों को मुझसे ही जीवन मिला है। मेरी इच्छानुसार ही तुम तीनों का भूत, वर्तमान और भविष्य बना हुआ है, जो आगे भी ऐसे ही बना रहेगा। मैं ही तुम तीनों का भाग्य बनाता हूं।’

राजा की यह बात सुनकर उसकी दो बेटियों ने शांत मन से राजा की बात में हामी भर दी, लेकिन तीसरी बेटी ने ऐसा नहीं किया। उसने कहा, ‘नहीं, मुझे तो नहीं लगता है कि आपके हाथों में मेरा भाग्य है।’

राजा यह सुनते ही गुस्से में आ गया। उसनी अपनी तीसरी बेटी की कही बातों को एक चुनौती के रूप में स्वीकार किया। उसने खुद को अपनी तीसरी बेटी के सामने सही साबित करने की ठान ली और उसे जेल में बंदी बना दिया।

इस वजह से राजा की तीसरी बेटी कई सालों तक जेल में ही बंद रही। राजा और उसकी बाकी की बेटियां राजसी जीवन जीते रहे।

राजा मन ही मन सोचता है कि यह मेरा ही हुक्म है, जो मेरी जिद्दी बेटी जेल में कैद है। लोगों को भी यही लग रहा होगा कि राजा का ही हुक्म है, जो उसकी बेटी को ऐसा भाग्य मिला है।

उसकी प्रजा के लोग भी यही सोचते थे। उन्हें लगता था कि राजा की तीसरी बेटी ने जरूर कोई गलत कार्य किया होगा, तभी उसे जेल में कैद करके रखा गया है। वरना कोई भी पिता अपनी बेटी के साथ भला ऐसा क्यों ही करेगा।

राजा कभी-कभी जेल में कैद अपनी तीसरी बेटी से मिलने के लिए जाता था। उसकी बेटी बहुत कमजोर हो गई थी, लेकिन अभी भी उसके विचारों में कोई बदलाव नहीं आया था। मगर राजा अपनी कमजोर होती बेटी की हालात और नहीं देख पा रहा था।

एक दिन उसने अपनी तीसरी बेटी से कहा, ‘इस तरह से तुम्हारा जिद करना मुझे बहुत गुस्सा दिलाता है। अगर तुम इसी तरह मेरी आंखों के सामने रही, तो गुस्से में मैं न जाने क्या कर बैंठूंगा। मैं तुम्हें मौत की सजा भी दे सकता है, लेकिन मैं एक अच्छे दिल का हूं, इसलिए मैंने सोचा है कि तुम अब मेरे राज्य के पास के ही एक जंगल वाली जमीन पर जानवरों के साथ रहोगी।’

राजा ने आगे कहा, ‘उस जंगल में सिर्फ उन्हीं लोगों को रखा जाता है, जो मेरे आदेश का पालन नहीं करते। तुमने भी अपनी जिद की वजह से मेरी बात नहीं मानी, इसलिए तुम भी अब वहां मौजूद लोगों के साथ अपना पूरा जीवन काटोगी।’

इसके बाद तीसरी बेटी को उस जंगल की जमीन पर रहने के लिए भेज दिया गया। वहां वह फल और सब्जियां खाने और एक गुफा में रहने लगी। उसके पास पीने के लिए झरने का पानी और ठंड से बचने के लिए सिर्फ सूरज की धूप का ही सहारा था।

वहां की खुली हवा में रहते हुए और फल-फूल खाते-खाते वो जल्द ही पूरी तरह से स्वस्थ हो गई। उसने वहां पर खेती करना भी शुरू कर दिया। गुफा को उसने घर की तरह सजा लिया था और खुशी-खुशी वहीं रहती थी। एक दिन वहां पर एक भटकता हुआ राहगीर आ पहुंचा। उसे देखते-ही-देखते राजा की तीसरी बेटी से प्रेम हो गया और दोनों खुशी-खुशी वहीं रहने लगे।

उस जंगल में उन दोनों के अलावा और भी कई लोग रहते थे, जिनकी मदद से उन्होंने उस जंगल को एक शहर के रूप में बदल दिया।

कुछ ही सालों में राजा की तीसरी बेटी और वो राहगीर उस शहर के राजा-रानी बन गए। अब उनके शहर की चर्चा दूर-दूर तक होने लगी। जैसे ही इसकी जानकारी राजा को मिली वह उस जंगल में सबकुछ देखने के लिए पहुंच गया। जब उसने वहां की राजगद्दी पर अपनी बेटी को बैठे देखा और साथ में एक खुबसूरत युवक को, तो उसके होश उड़ गए।

राजा की बेटी ने अपने महल में अपने पिता का पूरे सम्मान के साथ स्वागत किया। उसने अपने पिता से उसके बुरे बर्ताव व फैसल के लिए कुछ भी नहीं कहा। जैसे ही राजा वहां बैठा, तो उसे एक आवाज सुनाई देने लगी, जो कह रही थी कि हर इंसान स्वंय ही अपना भाग्य बनाता है। कोई अन्य इंसान किसी और का भाग्य नहीं बना सकता।

इसके बाद राजा को स्वंय ही अपनी गलती पर पछतावा होने लगा और उसने अपनी सभी बेटियों को अपने भाग्य से आजाद कर दिया। उसने अपनी तीनों बेटियों से कहा, ‘भले ही तुम तीनों का भाग्य मेरे हाथों में है, लेकिन हर व्यक्ति खुद ही परीस्थितियों के अनुसार अपना भाग्य अच्छा व बुरा बना सकता है।’

कहानी से सीख

राजा और उसकी तीन बेटियों की कहानी हमें यह सीख देती है कि कोई भी व्यक्ति किसी का भाग्य बना या बिगाड़ नहीं सकता। हमारा भाग्य स्वंय हमारे हाथों में ही होता है, जिसे हम अपनी सूझबूझ से बुरी परिस्थितियों में भी अच्छा बना सकते हैं।

राजा और रंक की कहानी  | The King And The Pauper Story In Hindi

The King And The Pauper Story In Hindi

एक समय की बात है किसी गांव में एक भिखारी रहता था। खाने की तलब में वह हर दिन घने जंगल को पार करके किसी न किसी के घर भिक्षा लेने जाया करता था। आज भी इसी तरह वह भिक्षा लेकर अपने घर की तरफ जा रहा था, लेकिन वह आज बहुत खुश था। उसने फटे हुए जूते भी पहने हुए थे।

वह खुशी में गुनगुनाते हुए जंगल के रास्ते अपने घर को लौट रहा था। उसी जंगल में एक राजा भी था, जो अपने हालात से बहुत दुखी था और महल से भाग कर वहां आराम कर रहा था। तभी राजा की नजर उस भिखारी पर पड़ी। भिखारी को इतना खुश देखकर वह यह सोचने को मजबूर हो गया कि इस इंसान के पास कुछ नहीं है। फटे हुए कपड़े व पैरों में कटे-फटे जूते होने के बावजूद भी यह कितना खुश है और एक मैं हूं जो दिन-रात एक करके अपनी प्रजा और परिवार वालों की सेवा करता हूं, लेकिन इसके बाद भी वो लोग खुश नहीं होते हैं। उन सभी को सिर्फ मेरी राजगद्दी चाहिए और इसके लिए वे मुझे मरवाने का षड्यंत्र भी रच रहे हैं।

दरअसल, राजा ने एक दिन अपने महल में कुछ पहरेदारों को बात करते हुए सुन लिया था। वो आपस में बात कर रहे थे कि जैसे ही यह राजा मर जाएगा, उनकी आंखों का काटा साफ हो जाएगा। वहीं, राजा की पत्नी बहुत पहले ही उसे व राजमहल को छोड़कर जा चुकी थी। राजा को कोई पुत्र भी नहीं था। इस वजह से उसके पास अपना कोई उत्तराधिकारी भी नहीं था। जिस दिन से राजा ने अपने खिलाफ इस षड्यंत्र के बारे में सुना तब से वह बहुत ही सावधान रहने लगा था। इतना ही नहीं, एक दिन राजा के खाने में उसके भाई ने जहर मिलवा दिया था, जिसके बारे में राजा को भनक भी नहीं थी। वो तो राजा जब खाना खाने बैठा, तो अचानक एक बिल्ली ने आकर वो खाना खा लिया और कुछ देर बाद वो बिल्ली वहीं मर गई। इस घटना के बाद से राजा अपने खिलाफ हो रहे षड्यंत्र के प्रति बेहद सतर्क हो गया था। उसने अपने भाई से कहा कि उसके मरने के बाद वह ही राजा बनेगा। इसलिए उसे राज्य की सारी जानकारी रखनी चाहिए।

इसी वजह से एक दिन इन्हीं सब बातों से परेशान होकर राजा ने महल छोड़ दिया और बिना किसी को बताए वहां से भागकर वह उस जंगल में आ गया था। वह जंगल उसकी नगरी से बहुत दूर था, इस वजह से उसे वहां कोई पहचान भी नहीं सकता था। राजा जंगल में बहुत दिनों से था, जिस वजह से उसके बाल भी काफी बड़े हो गए थे। उस भिखारी को देखकर राजा ने सोचा कि हम दोनों ही इंसान हैं, बस फर्क है कि वह खुश इंसान है और मैं दुखी।

राजा जल्दी-जल्दी में महल से भागा था, इसलिए उसने सुंदर मोतियों की एक माला, जरी हुए जूते, कीमती कपड़े और हाथों में सोने की अंगूठियां भी पहनी हुई थी। जब भिखारी ने राजा को देखा, तो वह थोड़ा पीछे हट गया और सोचने लगा कि मैंने तो कटे-फटे कपड़े और जूते पहने हुए हैं। भीख न मिले तो मैं भूखा ही रह जाऊं, लेकिन इसके तो ठाठ-बाठ ही अलग हैं। यह कितना खुशनसीब है कि इसने हीरे-जवाहरात, सुंदर कपड़े और जूते पहने हुए हैं, लेकिन इसके बाद भी यह खुश नजर नहीं आ रहा है। उसने सोचा, चलो इस शख्स से ही उसके खुश न होने की वजह पूछता हूं।

भिखारी राजा के पास पहुंचा और उसे राम-राम बोला। राजा ने भी भिखारी को राम-राम का जवाब दिया।

भिखारी ने कहा – “आप तो बहुत अमीर परिवार के लगते हैं, शायद आप कहीं के राजा हैं।”

राजा ने कहा – “हां, सही बोले तुम, मैं सूरत गढ़ का राजा हूं और अपना राज अपने भाई को देकर यहां पर आ गया हूं। मेरे घरवाले दौलत के चक्कर में मुझे मरवाने का षड्यंत्र कर रहे थे। उसी से बचने के लिए मैं यहां पर मन की शांति के लिए आया हूं। काफी दिनों से मैं ऐसी हालत में हूं। मेरी लंबी दाढ़ी देखकर लोग मुझे भगा देते हैं। रास्ते में जो भी फल-फूल मिलता है, वही खाकर गुजारा कर लेता हूं। आज मुझे बहुत तेज भूख लगी है, इसलिए मैं इधर-उधर खाने की तालाश में घूम रहा हूं। तुम्हारे पास अगर कुछ खाने के लिए हैं, तो कृपया मुझे थोड़ा खाने के लिए दे दो।”

भिखारी ने मुस्कुराते हुए राजा की तरफ देखा और कहा कि अगर तुम मुझे ये सोने की अंगूठी दोगे, तो मैं तुम्हें खाना खिला सकता हूं। राजा यह सुनकर खुश हुआ। उसने अपनी अंगूठी भिखारी को दे दी और बदले में उससे रोटी लेकर खा ली। भिखारी ने राजा से कहा कि तुम और मैं दोनों ही अकेले हैं। चलो हम दोनों साथ में चलते हैं।

दोनों साथ में चलते हुए एक घने जंगल में पहुंचे। वहां पर वह आराम करने लगे। भिखारी ने राजा से कहा कि आप कितने भाग्यवान हैं। आपके पास इतनी धन-दौलत है, लेकिन मेरे पास कुछ भी नहीं है। फटे जूते पहने हैं। आपकी अंगूठी से मेरी बहुत सी समस्याएं दूर हो जाएंगी। फिर राजा ने कहा कि मैं भी तुम्हारी ही तरह कुछ सोच रहा था। तुम्हें फटे जूतों की परवाह किए बगैर खुशी से अपने रास्ते की तरफ जाते देख मैंने सोचा तुम्हारे जैसा कोई खुशनसीब नहीं होगा। मेरे पास सब कुछ होते हुए भी मैं खुश नहीं हूं। हम दोनों की हालत एक जैसी ही है।

फिर बातों ही बातों में उस भिखारी ने राजा से उसके राज्य की सारी जानकारी पूछ ली और फैसला किया कि रात में जब राजा सो जाएगा, तो वह उसके कपड़े और गहने लेकर वहां से भाग जाएगा। जब तक राजा सोया नहीं, तब तक भिखारी उससे मीठी-मीठी बातें करता रहा। रात को उसने राजा को खाने में बेहोशी की दवा मिलाकर खिला दी। इससे राजा गहरी नींद में सो गया। फिर भिखारी ने राजा के कपड़े व उसके सारे गहने पहने और वहां से भाग गया।

राजा सोता ही रह गया, लेकिन रास्ते में उसे कुछ चोरों ने देख लिया। उन्होंने उसे राजा समझकर पकड़ लिया और उसके उसके सारे कपड़े और गहने छीन लेते हैं। अब भिखारी के पास सिर्फ धोती ही बची थी। चोरों ने सबकुछ लूटने के बाद उसे एक पेड़ से बांध दिया और उससे पूछने लगे कि वह कहां का राजा है। अगर नहीं बताओगे, तो तुम्हें मारकर कहीं फेंक देंगें।

भिखारी ने चोरों से कहा कि वह राजा नहीं है। मैंने अपनी लालच की वजह से एक राजा के सारे कपड़े और गहने चोरी कर पहन लिए थे। वह राजा अपने जीवन से दुखी है और जंगल में खाने के लिए भटक रहा है। चोरों ने उसे बोला कि वह नाटक कर रहा है। उन्होंने फिर से उससे पूछा कि तुम कहां के राजा हो।

भिखारी ने चोरों को बताया कि वह राजा रायप्रताप है, जो सूरतगढ़ का राजा है। उसका भाई रायबहादुर उसके राज्य का मंत्री है। वह अभी जंगल में आराम कर रहा है, लेकिन चोरों ने उसकी बात पर भरोसा नहीं किया।

उधर जब राजा की नींद खुलती है, तो वह भिखारी को बुलाता है। उसने अपने सामान को देखा, तो उसके पास सिर्फ एक पोटली ही होती है, जिसमें उस भिखारी का कुछ सामान होता है। दूसरी तरफ वो चोर सूरतगढ़ के महल में पहुंच जाते हैं। वहां पहुंचकर वो राजा के भाई रायबहादुर से कहते हैं कि उनके पास उनका भाई है। अगर वो उसे जिंदा बचाना चाहते हैं, तो उसके लिए उन्हें 3000 सोने के सिक्के दोने होंगे।

यह सुनकर रायबहादुर ने बोला इसके लिए तुम्हें मेरे भाई को मुंह पर कपड़ा बांधकर राजमहल लाना होगा। तभी हम तुम्हें सोने के 3000 सिक्के देंगे। चोर उस भिखारी के मुंह पर कपड़ा बांधकर उसे राजमहल लाते हैं और उसे रायबहादुर के हवाले कर देते हैं। राजा के कपड़ों में भिखारी को देखकर रायबहादुर को यकीन हुआ कि यह उसका भाई ही है। उसने सोचा कि अब वो इसे मारकर खुद राजा बन जाएगा, लेकिन जब उसने भिखारी के मुंह से कपड़ा हटाया तो वह गुस्सा हो गया। उसने चोरों को कहा कि मुझे पता था कि तुम लोग दौलत के चक्कर में मुझसे झूठ बोल रहे हो। यह आदमी मेरा भाई नहीं है। हम तुम्हें दो महीने का समय देते हैं, मेर भाई को पकड़कर लाओ। अगर नहीं लाए, तो तुम सबको गोली मार देंगे और अगर यहां से भागने की कोशिश की, तो जिंदा दफन करवा दूंगा।

यह सुनकर सभी चोर बहुत डर गए और मौका मिलते ही वहां से भाग गए। रास्ते में उन्होंने भिखारी से कहा कि तुम सही थे। अब हमें बताओं वह असली राजा कहां पर है। फिर तुम्हें भी फिरौती के धन में हिस्सा देंगे। भिखारी ने बताया कि उसने राजा को इसी जंगल में छोड़ा था, लेकिन बहुत ढूंढने के बाद भी राजा उन्हें नही मिला।

वहीं, नींद से जागने के बाद जब राजा को भिखारी की सारी हरकत समझ आती है, तो उसे बहुत दुख होता है। उसने सोचा कि अब उसे कहीं जाकर अपने खाने के लिए इंतजाम करना होगा, वरना वह भूख से ही मर जाएगा। कई दिनों तक राजा भूखा-प्यासा ही चलता रहा और रुखा-सूखा जो मिलता वही खा लेता। चलते-चलते राजा को एक हफ्ता हो गया था। उसे याद आया कि उसके पास एक पोटली है, जो भिखारी उसी के पास भूल गया था। वह उस पोटली को खोलता है, तो उसमे उसे सन्यासियों के कपड़े मिलते हैं। राजा ने सन्यासी वाले कपड़े पहन लिए। वह जंगल से निकल कर एक छोटे से गांव के पास पहुंचा। वहां एक नदी के किनारे पहुंचकर वह सो गया और दो दिनों तक सोता रहा। वहीं, आस-पास के लोगों को लगा कि यह कोई साधु बाबा हैं, जो अपनी समाधि में ध्यान कर रहे हैं। लोगों ने सो रहे राजा के पास चावल चढ़ा दिया, तो कुछ लोगों ने धूप जला दी। जब तीसरे दिन राजा की नींद खुली, तो उसे अपने पास बहुत सारे फलों का चढ़ावा मिला। यह देखकर वह बहुत खुश हो गया।

राजा ने मन में सोचा कि सन्यासियों का जीवन अच्छा है। बिना मेहनत किए भोजन मिल जाता है। अब उसे यहां से कहीं और जाने की आवश्यकता भी नहीं होगी। राजा ने वहीं पर एक कुटिया बना ली और उसी में रहने लगा। गांव के लोग उसकी पूजा करते और चढ़ावे में खाने के लिए फल और अन्य चीजें देकर जाने लगे।

एक दिन गांव के सभी लोग मिलकर उसके पास गए और उससे कहने लगे कि बाबा हमारे गांव में बहुत सालों से बारिश नहीं हुई है। आप कोई उपाय करें। यह सुनकर राजा परेशान हो गया कि अब वह क्या करे। वह अपनी सच्चाई भी नहीं बता सकता था। उसने लोगों को बोला कि इसके लिए उपवास करना होगा और अगले दो महीने तक कोई भी इस कुटिया के अंदर नहीं आएगा। गांव वाले उसकी बात मान गए। लोग दूर से ही कुटिया के बाहर चढ़ावा चढ़ाकर चले जाते थे।

राजा सोचने लगा कि उसका जीवन हर तरह से मुश्किलों से भरा है। उसे दूसरों का अच्छा जीवन देखकर जलन नहीं करना चाहिए। साधु बनकर वह बैठे-बैठे खा रहा है, लेकिन उसका जीवन एक कैदी की तरह हो गया है। उसे एक ही जगह पर बैठे रहना होता है। कहां मैं हर रोज बढ़िया-बढ़ियां भोजन खाता था और कहां यहां सिर्फ फल खाकर जिंदा हूं।

राजा नास्तिक था, इसलिए साधु के वेश में उसे भगवान का भजन करने का ढोंग करना पड़ रहा था। उसने सोचा दो महीने पूरे होते ही वह वहां से चला जाएगा। धीरे-धीरे समय बीतता जा रहा था। एक दिन राजा परेशान होकर खुद ही भगवान से कहने लगा कि हे भगवान! मुझे बचा लो। आप ही कोई चमत्कार कर दो। इसके बाद राजा ने भगवान से अपनी सारी गलतियों के लिए माफी भी मांगी। राजा ने भगवान के सामने हाथ जोड़ते हुए कहा कि मुझे समझ आ गया है कि अपनी मुसीबतों से कभी घबराकर भागना नहीं चाहिए, बल्कि उनका डटकर सामना करना चाहिए। हे भगवान, मेरी लाज रख लो। इस गांव में बारिश करवा दो।

वहीं, गांव के लोग रोजाना कुटिया के बाहर आते, भजन-कीर्तन करते और दूर से चढ़ावा चढ़ा कर घर को लौट जाते थे। इसी तरह दो महीने पूरे होने वाले होतें हैं। तभी एक दिन गांव के लोग दौड़े-दोड़े राजा के पास आते हैं और कहते हैं कि बाबा आप तो महान हैं, उनके गांव में बारिश हुई है।

राजा कहने लगा, अब मुझे इजाजत दो मैं यहां से जाना चाहता हूं, लेकिन लोगों ने उन्हें रोक लिया। लोगों ने कहां कि वे एक आदमी भेजेंगे, जो उनकी सेवा किया करेगा। राजा ने भी सोचा चलो ठीक है, आगे जो होगा देखा जाएगा और वहीं पर रहने लगा।

कुछ समय बाद वह भिखारी और चोर भी राजा को ढूंढते-ढूंढते उसी गांव में आ गए। उन्होंने वहां के लोगों से उस चमत्कारी बाबा के बारे में सुना, जो लोंगों की समस्याओं को दूर करने के उपाय बता ता है। जब वे लोग उस बाबा से मिले तो, राजा और भिखारी एक-दूसरे को पहचान जाते हैं, लेकिन वे चोरों को इसका पता नहीं चलने देते हैं। फिर बाबा के भेष में राजा ने उनसे पूछा कि तुम लोग कहां से आए हो?

इसके बाद भिखारी ने राजा को सारी सच्चाई बताई कि मैंने लालच में आपके सारे कपड़े और जेवर पहन लिए थे, लेकिन उन्हें पहने के तुरंत बाद ही मेरे पीछे चोर पड़ गए। उन चोरों ने मूझे लूट लिया और पूछताछ करने लगे कि कौन हो, कहां से हो, तो मैंने खुद को आपके बारे में बताते हुए आपके राज्य की सारी जानकारी दे दी। उसके बाद वो चोर मुझे राजमहल ले गए। जहां पर 3000 सोने के सिक्के में वो मुझे आपके भाई को देने वाले थे। आपके भाई ने बताया कि वह आपको मरवाना चाहता है और खुद वहां का राजा बनना चाहता है। लेकिन, जब उसने मेरा चेहरा देखा, तो उसने मुझे पहचान लिया और चोरों को दो महीने के अंदर आपको ढूंढ निकालने के लिए कहा। तभी से हम सभी आपको ढूंढ रहे हैं।

भिखारी ने राजा से कहा कि तुम साधू बनकर इन चोरों को जो कहेंगे ये मान जाएंगे। इसके बाद राजा साधू के भेष में चोरों के सामने गया और भिखारी से सुनी सारी समस्याएं चोरों को बताने लगा। यह सुनकर सारे चोर हैरानी में पड़ गएं। उन्होंने राजा से बोला – “बाबा हमें इस परेशानी से बाहर निकाल दो। हम आपके सच्चे भक्त बन जाएंगे।”

राजा ने कहा – “तुम लोग मुझे उस राजा के महल लेकर चलो। मैं वहां पर जाकर खुद ही सब कुछ देखना चाहता हूं। महल में कहना कि तुम्हारे साथ एक बहुत बड़े साधु महात्मा हैं, जो हर व्यक्ति का भूत और भविष्य जानते हैं।”

चोर और भिखारी साधू बने राजा को अपने साथ लेकर सूरतगढ़ के महल पहुंच गए। चोरों ने राजा के मंत्री भाई से कहा कि हमारे साथ बहुत बड़े महात्मा आएं हैं, जो आपको आपके भाई राजा रायप्रताप से मिलवा सकते हैं। राजा अपने भाई को बहुत प्यार करता था, लेकिन अब उसे पता चल गया था कि उसका भाई उसके खून का प्यासा है। महल में साधू के रूप में आए राजा की खूब सेवा की गई। फिर उसका भाई उनके पास बैठकर बोला कि बाबा कृपया कर मुझे मेरे भाई से मिलवा दें। आज मैं इस राज्य का राजा बनने जा रहा हूं। मेरा भाई बिना कुछ बताए महल छोड़कर यहां से चले गए हैं।

फिर वो साधू के रूप में राजा चोरों के पास गया और उनसे कहा कि मैं थोड़ी देर के लिए इसका राजा भाई बन जाता हूं। फिर उसने अपने राजसी कपड़े पहने और राजदरबार में आ गया। यह देखकर पूरी प्रजा हैरान थी। सभी लोग राजा को वापस आया देखकर उसकी जय जय कार करने लगें।

उन्होंने राजा से पूछा कि वह इतने दिनों तक कहां पर थे। वहीं, राजा का भाई यह सब देखकर हैरान था। वह लोगों से कहने लगा कि यह उसका राजा भाई नहीं है, बल्कि यह तो एक साधू है, जिसने थोड़ी देर के लिए मुझे अपने भाई के रूप से मिलवाया है। वह अभी अपने असली रुप में आ जाएंगें और बाबा बन जाएंगें। राजा ने भी सभी को समझाते हुए कहा कि हैं मैं थोड़ी देर में अपने असली रूप में आ जाऊंगा। इसके बाद सभी लोग राजा के भाई का राज्यभिषेक करने लगे।

वह जैसे ही राजा की गद्दी पर बैठने वाला था, वैसे ही साधू बने राजा ने कहा – “मैं खुद अपने भाई को राजा बनाना चाहता था, लेकिन एक दिन मैंने महल में लोगों को मेरे खिलाफ हो रही साजिश के बारे में बात करते हुए सुन लिया था। मुझे कभी भी यह नहीं पता चल सका कि इन सबके पीछे मेरे अपने ही भाई का हाथ है। अगर मेरा भाई मुझसे अपने राजा बनने की बात कहता, तो मैं खुश-खुशी उसे राजा बना देता। लेकिन, इसने मुझे जहर दे कर मारने का प्रयास किया। पर जिस पर भगवान का साया हो, उसका कुछ नहीं बिगड़ता।”

यह सुनकर राजा का भाई रायबहादुर बोलने लगा कि यह साधु कुछ भी अनापश्नाप बोल रहा है। यह हमें ठगने का प्रयास कर रहा है। उसने राजा को धमकी देते हुए कहा कि तुम यहां से जल्दी से दफा हो जाओ, वरना तुम्हें धक्के मार कर महल से बाहर निकाल देंगे।

राजा का एक वफादार सेवक था। साधू बने राजा की बातें सुनकर वह रोने लगा। रोते हुए उसने बोला – “मैंने आपको पहचान लिया है। आप ही हमारे असली राजा हैं। मुझे क्षमा कर दें। मैंने ही आपके खाने में जहर मिलाया था। इसके बदले में मुझे आपके भाई ने 1000 सोने के सिक्के देने का वादा किया था। आप मुझे माफ कर दो। मैं आपका असली गुनहगार हूं और इसके लिए आप मुझे जो भी सजा देंगें मैं उसके लिए तैयार हूं।”

अब राजा के जीवन की सारी सच्चाई पूरी प्रजा को पता चल गई थी। सभी लोग राजा के मंत्री भाई को घृणा की नजरों से देख रहे थे। राजा ने अपने महल के मंत्रियों को आदेश दिया कि वह अपने महल से अपने भाई को बेदखल कर रहा है। उसे आज ही एक साल के लिए यह राज्य छोड़कर जाना होगा। जब उसे अपनी गलती का एहसास हो जाएगा, तो वह महल में वापस आकर मेरे साथ काम करने का अधिकारी बन सकेगा।

एक बार फिर से राजा रायप्रताप को अपने राज्य की राजगद्दी मिल गई और वह फिर से अपनी प्रजा की सेवा करने लगे। राजा ने भिखारी को अपने महल का मंत्री बना दिया और चोरों को भी महल में माली का काम दे दिया। एक साल बीतने के बाद राजा का भाई भी महल वापस आ गया था। उसे अपनी गलती का एहसास हो गया था। महल वापस आकर उसने अपने भाई से मांफी मांगी और पूरे कर्तव्य से अपना काम करने का वचन दिया। राजा ने फिर से उसे महल में उसका स्थान वापस दे दिया।

कहानी से सीख – राजा और रंक की कहानी हमें यह शिक्षा देती है कि कभी लोभ के कारण दूसरों का बुरा नहीं करना चाहिए। हमेशा सत्य का मार्ग अपनाना चाहिए और पूरी निष्ठा से जीवन के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को अपनाना चाहिए।

दयालु राजा की कहानी  | Merciful King Story In Hindi

ज्ञानी बालक और राजा की कहानी  | Budhiman Balak Aur Raja 

एक समय केशवपुर नामक नगर में कृष्ण देव राजा का शासन चलता था। राजा काफी धार्मिक और दयालु था। वो राज्य में आने वाले हर साधु-संत की खूब मन लगाकर सेवा करता था। उसका आदेश था कि कोई भी साधु राज्य में आए, तो सबसे पहले उसे बताया जाए। राजा के आदेशानुसार राज्य में कभी भी कोई साधु या साधु मंडली आती, तो सबसे पहले राजा को बताया जाता।

राजा के साथ ही नगरवासी भी साधुओं की अच्छे से सेवा करते थे, जिस कारण साधुओं के आशीर्वाद से केशवपुर के लोग खुशहाल और संपन्न थे। पूरे राज्य में शांति थी और लोग हर सुख-दुख में एक दूसरे का साथ निभाते थे। खेती के दिनों में सभी मिल-जुलकर कृषि कार्य करते थे। ऐसे ही भाईचारे की वजह से केशवपुर दिन-ब-दिन खूब तरक्की कर रहा था।

केशवपुर के पास में ही सूरजपुर था। उस पड़ोसी राज्य में कंस देव नाम का राजा शासन करता था। वो अपनी प्रजा को खूब सताता था और नए-नए कर यानी टैक्स लगाकर उन्हें परेशान करता ​था। राजा अपना सारा समय नाचगान करने वालों के बीच में बिताता और शराब के नशे में डूबा रहता था। राजा की यह हालत देखकर उसके सिपाही भी प्रजा पर जुल्म करते थे।

सूरजपुर में खेती-बाड़ी भी ठीक तरह से नहीं हो रही थी, जिस कारण वहां की जनता भुखमरी से जूझ रही थी। यहां तक की जानवरों को खिलाने के लिए भी पर्याप्त चारा नहीं मिल पा रहा था। फिर भी राजा ​कर वसूली में कमी नहीं करता था। राजा के अत्यचार से पीड़ित जनता केशवपुर में आश्रय लेने के बारे में सोचने लगे। इसी सोच को लेकर सूरजपुर के हजारों निवासी केशवपुर की सीमा पर खड़े थे।

सूरजपुर की जनता के सीमा के पास खड़े होने की सूचना सिपाहियों ने राजा कृष्ण देव को दी। राजा सूचना पाते ही तुरंत सीमा पर पहंचे और सूरजपुर की जनता की दशा देखकर दुखी हो गए।

राजा कृष्ण देव ने सूरजपुर के लोगों का सम्मानपूर्वक स्वागत करते हुए उन्हें अपने राज्य में रहने की इजाजत दे दी। साथ ही उनके लिए खाना और उनके जानवरों के लिए चारे का भी प्रबंध कराया। भूख से पीड़ित लोगों को कृष्ण देव ने स्वयं खाना परोसा। भोजन करने से पहले और करने के बाद जनता जोर-शोर से महाराज की जय-जयकार करने लगी।

जवाब में राजा ने कहा कि आप लोगों को मेरी जय-जयकार करने की जरूरत नहीं है। मेरे पास जो भी है, वो भगवान का है, इसलिए जो भी मैंने दिया है, उसके लिए जय जयकार के हकदार भगवान हैं। ऐसे में आप सभी मेरी जगह भगवान की जय-जयकार करें, क्योंकि वही हम सब के पालनहार हैं।

कुछ दिनों बाद सूरजपुर की बची हुई जनता भी केशवपुर की तरफ पलायन करने लगी और धीरे-धीरे सूरजपुर के ज्यादातर लोग केशवपुर में बस गए। देखते-ही-देखते पूरा राज्य खाली हो गया और राजा कंस देव और उनके कुछ ही सिपाही नगर में रहने लगे। भुखमरी के कारण पशु-पक्षी मरने लगे और उनकी लाशें नगर में ही सड़ने लगी। इसी के चलते पूरे सूरजपुर में बीमारी फैल गई।

राज्य में बचे लोग भूख व बीमारी से परेशान रहते थे और अधिकतर लोग मरने लगे। एक दिन राजा कंस देव की पुत्री को हैजा हो गया, जिससे कुछ ही दिनों में हैजा से उसकी मृत्यु हो गई। राजा लाचार हो गया और वह बार-बार सोचने लगा कि उन्होंने जनता पर काफी अत्यचार किया है। यह सोचकर राजा कंश देव भगवान से क्षमा की भीख मांगने लगा।

कुछ दिन बिताने के बाद राजा कृष्ण देव के राज्य में साधुओं की टोली पहुंची, जिसकी सूचना राजा को सिपाहियों ने तुरंत दी। उन्होंने राजा को बताया कि इस मंडली में दो महिला साधु व युवक हैं, जिनमें से एक युवक राजकुमार जैसा और एक युवती राजकुमारी के समान दिख रही है।

राजा यह सुनते ही सब काम छोड़कर तुरंत सीमा पर पहुंचे और उन सभी को सम्मान के साथ राजमहल में ले आए। राजा ने उन सभी की खूब सेवा की। कुछ दिनों बाद साधुओं ने राजा से उनके नगर घूमने व वहां की जनता से मिलने की इच्छा जताई। राजा भी साधुओं की बात सुनकर उनके साथ नंगे पांव नगर की ओर निकल पड़ा। साधुओं ने देखा की केशवपुर का हर नागरिक खुश है और जहां से वो गुजरते हैं, वहां राजा की जय-जयकार होने लगती है।

सभी प्रजावासियों ने राजा व साधुओं को फूल-मालाओं से सम्मानित किया। जनता द्वारा राजा के लिए इतना आदर सत्कार देखकर एक साधु ने कहा, ‘राजन! आप धन्य हैं। आपके बारे में जितना सुना था आप उससे भी बढ़कर हैं। मैं साधु नहीं हूं, बल्कि आपके पड़ोसी राज्य सूरजपुर का राजा हूं। मैंने अपनी जनता पर बहुत अत्याचार किया है, जिस कारण वो आपके राज्य में बस गए हैं। मेरे अत्यचार के चलते पूरे राज्य में भुखमरी व बीमारी बढ़ गई, जिसकी शिकार मेरी एक बेटी भी हो गई। अब मैं अपने पापों को धोने के लिए भगवान की भक्ति करने लगा हूं।’

उसने आगे बताया कि मैं जिस राह पर चल रहा हूं, उस पर अपनी पत्नी, बेटी और बेटे को चलने के लिए नहीं बोला है। मगर ये कहते हैं कि ये मेरे पाप में बराबर के भागीदार हैं, जिस कारण ये भी वैराग्य जीवन जी रहे हैं। हम अब सबकुछ छोड़कर तीर्थ के लिए निकलने वाले थे, लेकिन तीर्थ पर जाने से पहले अपनी प्रजा का हाल देखने की चाहत हुई। अब मैं अपनी प्रजा को खुश देखकर संतुष्ट हो गया हूं। मैं आपका आभारी रहूंगा कि आपने मेरे राज्य की जनता और अपने  राज्य की जनता के बीच किसी तरह का भेदभाव नहीं किया। अब हम भगवान की भक्ति में अपना जीवन सुकून के साथ व्यतीत कर सकते हैं।

कंस देव की बातें सुनकर राजा ने उन्हें गले लगाया और कहा कि आप धन्य हैं, जो आपको इतना अच्छा परिवार मिला। आपका परिवार सुख के साथ ही दुख में भी आपके साथ है। मुझे अफसोस है कि आपकी जनता ने आपको बुरे समय में अकेला छोड़ दिया। राजा कृष्ण देव की बात सुनकर कंस देव कहता है कि मुझे अपनी प्रजा से किसी तरह की शिकायत नहीं है। फिर राजा कृष्ण देव ने कंस देव से कहा कि आप अपने पुत्र को मेरा दामाद और अपनी बेटी को मेरी बहू बना दीजिए।

राजा कृष्ण देव की बातें सुनकर कंस देव की आंखों में आंसू आ गए और मुंह से एक भी शब्द नहीं निकला। किसी तरह से कंस देव ने कहा कि राजा कृष्ण देव आप धन्य हैं। मैं आपके इस प्रस्ताव को स्वीकार करता हूं। आपने मेरी चिंता दूर कर दी है।

फिर राजा ने दोनों की शादी बड़ी धूमधाम से की और कंस देव व उसकी पत्नी कुछ दिन बाद तीर्थ यात्रा के लिए रवाना हो गए। थोड़े दिन बीतने के बाद राजा कृष्ण देव ने अपने दामाद को सूरजपुर का राजा घोषित कर दिया और धीरे-धीरे सूरजपुर की जनता वापस राज्य लौट गई। फिर दोनों राज्य के लोग खुशहाली और चैन से रहने लगे।

कहानी से सीख – हमेशा दूसरों के साथ अच्छा व्यवहार करना चाहिए। धनवान होकर घमंड करने की जगह दूसरों के प्रति मदद की भावना रखनी चाहिए। वरना पैसों का घमंड इंसान को ले डूबता है।

ज्ञानी बालक और राजा की कहानी  | Budhiman Balak Aur Raja

ज्ञानी बालक और राजा की कहानी  | Budhiman Balak Aur Raja 

कई वर्षों पहले की बात है। युधिष्ठिर नाम का एक राजा हुआ करता था। उसे शिकार का बड़ा शौक था। एक बार वह अपने सैनिकों के साथ शिकार के लिए जंगल गया हुआ था। वो जंगल काफी घना था। शिकार की तलाश में वह जंगल में काफी अंदर तक चला गया था। तभी वहां अचानक तेज तूफान आ गया। सब तितर-बितर हो गए। जब बारिश रुकी तो राजा ने देखा कि उसके आस-पास कोई भी नहीं है। राजा अकेला था। उसके सैनिक उससे बिछड़ गए थे। 

शिकार की तलाश में भटकने की वजह से राजा थक भी गया था। भूख और प्यास के मारे उसका बुरा हाल हो रहा था। तभी उसे तीन लड़के आते दिखे। राजा उनके पास गया और बोला कि भूख और प्यास के मारे मेरी जान निकल रही है। क्या मुझे कुछ खाना और पानी मिल सकता है। लड़कों ने बोला क्यों नहीं और वे भागकर अपने घर गए और राजा के लिए भोजन और पानी लेकर आए। खाना खाने के बाद राजा बहुत खुश हुआ और उसने उन लड़कों को बताया कि वह फतेहगढ़ का राजा है और तीनों ने जो उसकी मदद की उससे वह बहुत खुश है। 

राजा ने तीनों लड़कों की सेवा से खुश होकर उन्हें बदले में कुछ मांगने के लिए कहा। इसपर पहले लड़के ने राजा से ढ़ेर सारा धन मांगा, ताकि वह आराम से अपना जीवन व्यतीत कर सके। इसके बाद, दूसरे लड़के ने घोड़ा और बंगले की मांग की, लेकिन तीसरे लड़के ने राजा से धन, दौलत की जगह ज्ञान मांगा। उसने बोला राजा मैं पढ़ना चाहता हूं। राजा राजी हो गया। उसने पहले लड़के को वादानुसार बहुत सारा धन दिया। दूसरे लड़के को बंगला और गोड़ा दिया और तीसरे लड़के के लिए टीचर की व्यवस्था कर दी। 

बहुत दिन बीतने के बाद एक दिन अचानक राजा को जंगल वाली घटना याद आई, तो उसने उन तीनों लड़कों से मिलना चाहा। उसने तीनों को खाने पर आमंत्रित किया। तीनों लड़के एक साथ आए और खाना खाने के बाद राजा ने तीनों से उनका हाल लिया। 

इस पर पहला लड़का दुखी होकर बोला- इतना धन पाने के बाद भी आज मैं गरीब हूं। राजा जी आपने जितना धन दिया था अब वह खत्म हो चुका है। मेरे पास कुछ नहीं बचा। 

राजा ने दूसरे लड़के की तरफ देखा तो उसने कहा- आपके द्वारा दिया गया गोड़ा चोरी हो गया और बंगला बेचकर जो पैसा आया वो भी कुछ खर्च हो चुका है और बचा हुआ भी जल्द खत्म हो जएगा। हम तो फिर वहीं आ गए, जहां से चले थे। 

अब राजा ने तीसरे लड़के की ओर देखा। तीसरे लड़के ने बोला- राजा मैंने आपसे ज्ञान मांगा था, जो रोजाना बढ़ रहा है। इसी का नतीजा है कि मैं आज आपके दरबार में मंत्री हूं। आज मुझे किसी चीज की जरूरत नहीं है। यह सुनकर दोनों युवकों को काफी अपसोस हुआ। 

कहानी से सीख : इस कहानी से हमें सीख मिलती है कि ज्ञान ही सबसे बड़ी पूंजी है। 

राजा और चोर की कहानी  | The King And The Thief Story In Hindi

राजा और चोर की कहानी  | The King And The Thief Story In Hindi

धौलपुर गांव में एक चालाक चोर रहता था। वह इतनी सफाई से चोरी करता था कि किसी की पकड़ में नहीं आता था। लोगों का मानना था कि वो किसी की आंख से काजल चोरी कर लेगा, तो भी किसी को भनक नहीं लगेगी। गांव में चोरी करते करते अब उसे बोरियत होने लगी थी। वह दूसरे चोरों के बीच अपनी धाक जमाना चाहता था। उसने सोचा कि क्यों न राजधानी जाकर राजमहल में सेंध मारी जाए। इससे दूसरे चोरों के बीच उसका रुतबा बढ़ेगा। 

यह सोचकर वह राजधानी आ गया। अब समस्या यह थी कि राजमहल में चोरी कैसे की जाए। वहां सुरक्षा में पहरेदार 24 घंटे तैनात रहते थे। कई दिनों तक रेकी करने के बाद उसने ध्यान दिया कि महल के ऊपर जो घड़ी लगी है, वह समय बताने के लिए हर घंटे बजती थी। चोर के दिमाग में एक विचार आया। चोर रात में कुछ लोहे की कीलें और हथौड़ी लेकर राजमहल पहुंचा और जैसे ही घंटी बजती वह दीवार पर एक कील ठोक देता। इससे घंटी की आवाज में हथौड़े की आवाज दब जाती और किसी को पता भी नहीं चलता था। इस तरह उसने 12 कीलें ठोक दी। उन कीलों के सहारे वह महल में दाखिल हो गया और हीरे-जवाहरात चोरी करके रफूचक्कर हो गया।

अगले दिन जब राजा को चोरी का पता चला, तो उसे यह जानकर बड़ी हैरानी हुई कि इतनी सुरक्षा के बावजूद भी कैसे कोई राजमहल से चोरी करने में कामयाब हो सकता है। राजा ने नगर में सिपाहियों की संख्या बढ़ाने का आदेश दिया और कहा कि कोई भी व्यक्ति रात में घूमता नजर आए, तो चोर समझकर गिरफ्तार कर लिया जाए। 

दरबार में ऐलान के वक्त चोर भी भेष बदलकर मौजूद था। उसने चालाकी से पता लगा लिया कि कौन-कौन से सिपाही इस काम के लिए चुने गए हैं। उसने उन सिपाहियों के घर का पता लगाया और साधू का भेष धारण करके उनके घर पहुंच गया। वहां उसने पाया कि सभी सिपाहियों की पत्नियां चाहती थी कि उनका ही पति चोर को पकड़े। इस बात का फायदा उठाते हुए उसने सभी की पत्नियों को कहा कि पूरी रात तुम्हारे पति चोर की तलाश में बाहर रहेंगे। इस बीच चोर तुम्हारे पति का वेश धारण कर घर में घुसने की कोशिश करेगा। भले ही वह तुम्हारे पति की आवाज निकाले, लेकिन तुम उसे अंदर मत आने देना और गर्म कोयला फेंकना। इससे चोर घायल हो जाएगा और पकड़ा जाएगा। पत्नियों ने हामी भर दी।

वहीं, सिपाही पूरी रात गश्त करते रहे और चोर की तलाश करते रहे। सुबह के 4 बजे गए थे। सभी सिपाही चोर को ढूंढते-ढूंढते थक गए। तभी सारे सिपाहियों ने सोचा कि अब घर चलकर थोड़ा आराम कर लेते हैं। जब वे घर पहुंचे और दरवाजा खटखटाया तो पत्नियों को शक हुआ। उन्होंने सोचा कि साधू की बात सच हो गई। जरूर ये चोर है, जो भेष बदलकर आया है। वे जलता हुआ कोयला अपने पतियों पर फेंकने लगीं। इससे सारे सिपाही घायल हो गए। उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा।

दूसरे दिन राजा को जब सारी बात पता चली, तो वह चिंतित हो गया। उसने फौरन कोतवाल को आदेश दिया कि जितनी जल्दी हो सके उस चोर को पकड़कर हाजिर किया जाए। कोतवाल ने शहर में पहरा देना शुरू कर दिया। इस दौरान कोतवाल को एक युवक आता दिखा। कोतवाल ने उस लड़के से पूछा, कौन हो तुम?

युवक ने कहा, मैं चोर हूं।

कोतवाल को यकीन नहीं हुआ। भला इस तरह कोई खुद को चोर कैसे बता सकता है। उसे लगा युवक मजाक कर रहा है। कोतवाल ने आगे कहा, अगर तुम चोर हो तो चलो तुम्हें जेल में बंद करने का आदेश मिला है।

वह युवक (चोर) तैयार हो गया। कोतवाल उसे लेकर एक कमरे में गया, जिसे देखकर चोर ने बोला कि कोतवाल साहब इस जेल को तो कोई भी खोल सकता है। कोतवाल बोला, इसे खोला नहीं जा सकता। चोर बोला, आप अंदर जाइए, मैं बताता हूं इसे कैसे खोल सकते हैं।

कोतवाल मान गया और जैसे ही अंदर गया, चोर ने दरवाजा बंद करके लॉक कर दिया और हंसते हुए बोला। मैंने पहले ही बोला था मैं चोर हूं, आप माने नहीं। कोतवाल पूरी रात जेल में बंद रहा। सुबह सिपाहियों की मदद से कोतवाल किसी तरह जेल से बाहर आया और राजा के पास पहुंचकर उसने सारी कहानी सुनाई।

पूरी बात सुनकर राजा दंग रह गया। अब उसने खुद चोर को पकड़ने का फैसला किया। रात होने पर राजा ने गश्त देना शुरू कर दिया। इस दौरान चोर ने साधू का भेष बनाया और एक पेड़ के नीचे धूनी जमाकर बैठ गया। गश्त के दौरान राजा इधर-उधर के चक्कर काट रहा था। इस दौरान उसने पेड़ के नीचे साधू को बैठा देखा, तो पूछा कि बाबा इधर से किसी अजनबी इंसान को जाते देखा है क्या?

साधू के भेष में बैठा चोर बोला कि मैं ध्यान में था। इसलिए देख नहीं पाया। इस दौरान राजा को एक विचार आया। उसने तय किया कि वह साधू की पोशाक पहनकर पेड़ के नीचे बैठकर नजर रखेगा और साधू (चोर) को अपने कपड़े पहना देगा, ताकि वह नगर के चक्कर लगा सके। पहले तो चोर इस बात पर राजी नहीं हुआ, लेकिन काफी चर्चा के बाद वह राजा के कपड़े पहनने के लिए राजी हो गया। 

राजा साधू के भेष में पेड़ के नीचे बैठ गया। इस दौरान चोर ने राजा के कपड़े पहने, घोड़े पर बैठा और महल जाकर आराम से सो गया। जब पूरी रात गुजर गई। सुबह के चार बजे के करीब राजा को लगा कि साधू तो अब तक लौटा नहीं और न ही कोई अजनबी इस रास्ते से गुजरा तो उसने महल लौट जाने का फैसला किया। जब वह महल के फाटक के पास पहुंचा, तो पहरेदारों ने सोचा कि राजा तो काफी पहले महल आ चुके हैं। ये जरूर कोई बहरूपिया है। उन्होंने राजा को बहरूपिया समझकर जेल में डाल दिया। भोर होने पर एक संतरी ने राजा को पहचाना और जेल से बाहर निकाला। वह राजा के पैरों पर गिरकर माफी मांगने लगा। राजा ने उसे माफ कर दिया। राजा ने महल पहुंकर देखा कि चोर रातभर उसके बिस्तर पर सोया और उसी की पोशाक में फरार हो गया। 

अगले दिन राजा ने एलान किया कि अगर चोर उसके सामने आ जाएगा तो उसे बख्श दिया जाएगा। साथ ही उसे इनाम भी दिया जाएगा। चोर वहां मौजूद भीड़ से निकलकर बोला कि मैं ही चोर हूं। सबूत के तौर पर उसने राजा को उसकी पोशाक दिखाई और चोरी का सारा सामान भी वापस कर दिया। राजा ने अपने वादे के मुताबिक चोर को माफ कर दिया। राजा ने भेंट में उसे एक गांव दिया। साथ ही वादा लिया कि भविष्य में वह कभी चोरी नहीं करेगा। इस तरह चतुराई के बल पर चोर ने खुद को साबित किया और खुशी-खुशी जीवन यापन करने लगा। 

कहानी से सीख : अगर इंसान में बुद्धिमानी और समझदारी है, तो वह विषम परिस्थितियों में भी खुद को साबित कर सकता है। 

बुद्धिमान राजा की कहानी | The Wise King Story In Hindi

The Wise King Story In Hindi

सालों पहले एक नगर में एक बुद्धिमान राजा राज्य करता था। उनकी बुद्धि और होशियारी की चर्चा दूर-दूर तक थी। राजा कभी भी बिना सोचे-समझे कुछ नहीं कहता और न ही किसी आरोपी की बात सुने बिना उसे सजा सुनाता था। उसकी बुद्धिमत्ता के चर्चे सुनकर आसपास के राजा, रानियां और राजकुमारी आदि उनसे जलते थे।

इसी जलन के चलते सभी उस राजा की बुद्धिमत्ता की परीक्षा लेने के लिए नए-नए तरीके अपनाते थे। हर बार राजा दूसरे राज्य के शासकों द्वारा ली गई परीक्षा में खरा उतर कर खुद को होशियार और योग्य राजा साबित करता था।

एक दिन राजा की परीक्षा लेने के लिए एक राजकुमारी आई। उसके हाथों में दो फूलों की माला थी। दोनों माला में से एक असली फूल से बनी थी और दूसरी नकली से। उन दोनों मालाओं को देखकर उनका ये भेद बिल्कुल पता नहीं चल पाता था। इसी वजह से राजकुमारी ने राजा के सामने दोनों मालाएं रखकर पूछा, ‘हे राजन! अगर आप बुद्धिमान हैं, तो बताइए कि इनमें से कौन-सी माला असली है।

राजदरबार में बैठे सभी दरबारी माला को देखकर हैरान थे, क्योंकि किसी को समझ नहीं आ रहा था कि असली फूलों की माला कौन-सी है। सभी इस सोच में थे कि राजा कैसे बता पाएंगे कि असली फूलों की माला कौन-सी है।

राजा भी माला को देखकर परेशान होने लगे। उसी वक्त उनके दिमाग में कुछ तरकीब आई। उन्होंने तुरंत अपने एक सेवक से कहा, ‘बगीचे की खिड़कियों को खोल दो।’ सेवक ने बगीचे की खिड़की को जैसे ही खोला, तो राजा ने देखा कि फूल में बैठी मधुमक्खियां खिड़कियों से राज दरबार में आ रही हैं। वो कुछ देर मधुमक्खियों को ही देखते रहे। जैसे ही एकात मधुमक्खी एक फूल की माला में बैठी, वैसे ही राजा ने कहा कि अब मैं बता सकता हूं कि असली माला कौन-सी है।

राजा ने तुरंत उस माला की तरफ इशारा किया, जिसपर मधुमक्खी बैठ रखी थी। राजा की होशियारी देखकर दरबार में मौजूद सभी उनकी तारीफ करने लगे। सभी कहने लगे कि हर राज्य को आपके जैसे ही बुद्धमान राजा की जरूरत है।

राजकुमारी भी राजा के बुद्धिमत्ता देखकर खुश हो गई। उसने भी बुद्धिमान राजा की तारीफ में कुछ शब्द कहे और वहां से अपने राज्य की ओर निकल पड़ी।

कहानी से सीख

अगर व्यक्ति अपनी बुद्धि का इस्तेमाल करे, तो वो हर प्रश्न का सही जवाब तलाश सकता है और हर मुसीबत का हल भी निकाल लेता है।

संतान प्राप्ति की कहानी | Santan Prapti Ki Story

Santan Prapti Ki Story

सालों पहले एक नगर में भीमा नामक राजा का शासन हुआ करता था। वह दिल का बहुत अच्छा और अपनी प्रजा को खुश रखने वाला राजा था। अगर किसी को कोई समस्या होती, तो राजा तुरंत उसका समाधान कर देता। धन-संपत्ति और खूब इज्जत होने के बाद भी राजा की पत्नी दुखी रहती थी। उसके मन में हमेशा से संतान प्राप्ति की चाहत थी, जो सालों से पूरी नहीं हो पाई थी। राजा को भी यह दुख रह-रहकर सताता था।

राजा ने कभी अपना दुख खुद पर हावी होने नहीं दिया और पूरे राज्य की लगन से सेवा करते रहते थे। एक दिन भीमा राजा के राज्य में एक सिद्ध साधु भ्रमण करने पहुंचे। वो गांव -गांव घूमकर लोगों से पूछने लगे कि वो कितने सुखी हैं। हर किसी का जवाब एक ही था कि हमारे राजा बहुत अच्छे हैं और पूरी प्रजा को खुश रखते हैं।

हर किसी के मुंह से राजा की तारीफ सुनने के बाद वो साधु राजा के पास पहुंचा। राजा को प्रणाम करने के बाद साधु बोला, ‘हे राजन! तुम्हारे राज्य में हर कोई खुश है। ये सब देखकर मुझे भी बहुत अच्छा लग रहा है। तुम्हारे काम से खुश होकर मैं तुम्हें एक टोकरी दे रहा हूं। ध्यान रखना कि ये कोई सामान्य टोकरी नहीं है। तुम इसमें जो भी डालोगे, वो चीज एक से दो बन जाएगी।’

इतना कहकर साधु वहां से चला जाता है। अब राजा टोकरी लेकर सीधे रानी के पास पहुंचा और साधु की सारी बातें बताई। राजा की बात सुनकर रानी अपने हाथ से एक कंगन उतार कर उस टोकरी में डाल देती है। देखते ही देखते कंगन एक से दो हो जाते हैं।

यह देखकर राजा व रानी दोनों हैरान होने के साथ ही काफी खुश हुए। दोनों के मन में हुआ कि अब राज्य में किसी चीज की कमी नहीं होगी और प्रजा की खुशी दोगुनी हो जाएगी। इस टोकरी से भी हम अपनी प्रजा की ही सेवा करेंगे।

कुछ दिनों बाद भोला नाम का एक व्यक्ति अपने परिवार के साथ राजा और रानी से मिलने के लिए पहुंचा। उसके साथ पत्नी और नवजात शिशु भी था। भोला ने सबसे पहले राजा-रानी दोनों को प्रणाम किया और बताया कि हम आपके ही नगर के रहने वाले हैं। आपको संतान न होने का दुख हमसे सहा नहीं जा रहा है, इसलिए हम अपने इस शिशु को आपको देने के लिए आए हैं। इस वक्त से ही आप दोनों मेरे पुत्र के माता-पिता हो।

भोला की बात पर राजा के कुछ बोलने से पहले ही रानी ने नवजात को अपनी गोद में उठा लिया। रानी ने भोला और उसकी पत्नी सुलेखा को धन्यवाद कहा। इन सबके बीच राजा कुछ कह नहीं कह पाए। राजा को पुत्र मिलने की खुशी तो थी, लेकिन वो भोला और सुलेखा के लिए परेशान थे। राजा को पता था कि पुत्र न होने से भी अधिक दुख उसे पैदा करके किसी को दे देने से होता है।

इतना सब सोचने के बाद राजा कुछ देर बाद रानी को समझाते हैं कि हम किसी बच्चे को उसके माता-पिता से अलग नहीं कर सकते हैं। राजा और रानी की बातें सुनकर भोला व सुलेखा उनसे हाथ जोड़कर पुत्र को रखने की प्रार्थना करते हैं।

राजा-रानी दोनों ही भोला और सुलेखा की बातें सुनकर हैरान हो जाते हैं। तब राजा ने सीधे भोला से पूछा, ‘आखिर क्या बात है, तुम अपने बच्चे को अपने साथ रखने की बात सुनकर दुखी हो जाते हो। साफ-साफ कहो क्या परेशानी है।’

राजा की बातों का जवाब देते हुए भोला कहता है, ‘हमारे बच्चे को श्राप है कि अगर वो बारह दिन हमारे पास रहता है, तो तेहरवें दिन उसकी मृत्यु हो जाएगी। आज हमारे बच्चे को हमारे साथ बारह दिन हो गए हैं। अगर हम कल इसे अपने पास रखेंगे, तो इसकी मृत्यु हो जाएगी।’

राजा ने इस बारे में सोचने के लिए थोड़ा समय मांगा और भोला व सुलेखा को कुछ देर राजमहल में आराम करने के लिए कहा। फिर राजा भी इस बारे में सोचने के लिए अपने कक्ष में गए और रानी बच्चे को गोद में लेकर राजा के पीछे चलने लगी। कक्ष में पहुंचकर रानी ने राजा से पूछा, ‘आप आखिर इतने परेशान क्यों हैं।’ तब राजा ने कहा कि मेरे राज्य में रहने वाला कोई भी परिवार मुझे अपनी संतान देकर सारी जिंदगी रोता रहे, ये मुझे हरगिज मंजूर नहीं है।

राजा की बात सुनकर रानी भी इस बारे में सोचने लगी। तभी रानी महाराज से बोलती है, क्यों न हम इस बच्चे को टोकरी में डालकर एक से दो लें। फिर इस बच्चे को हम रख लेंगे और दूसरे बच्चे को भोला व सुलेखा को सौंप देंगे। राजा यह सुनकर खुश हो गए और जल्दी से बच्चे को टोकरी में रख दिया। टोकरी में रखते ही वो नवजात एक से दो हो गए।

फिर रानी ने जिस नवजात को टोकरी में डाला था उसे उठाती है और राजा दूसरे बच्चे को उठाता है। अब दोनों बच्चे को लेकर राजा-रानी सीधे उस कमरे में पहुंचे जहां भोला और उसकी पत्नी आराम कर रहे थे। राजा ने अपनी गोद में लिए बच्चे को भोला को सौंपकर कहा, ‘ये लो अपना बच्चा।’

राजा की बात सुनकर भोला और सुलेखा निराश हो गए। तभी राजा ने टोकरी के बारे में उन दोनों को बताते हुए कहा कि अब ये बच्चा श्राप मुक्त हो गया है। आपके जिस बच्चे को श्राप मिला है, वो रानी के पास है। आप दोनों इस शिशु को ले जाएं और इसकी अच्छे से देखभाल करें। राजा की पूरी बात सुनने के बाद भोला और उसकी पत्नी खूब खुश हुए और बच्चे को लेकर चले गए।

राजा और रानी भी बच्चा पाकर खुश थे। उन्होंने खूब अच्छी तरह से बच्चे का पालन-पोषण किया। वो बच्चा भी बड़ा होकर एक अच्छा राजकुमार बना और माता-पिता व राज्य का नाम रोशन किया।

कहानी से सीख

खुद को दुख होने के बाद भी दूसरों की भलाई के बारे में सोचना ही इंसानियत और इंसान का सबसे बड़ा धर्म है।