08 March 2022

 विजय | Vijay Premchand Story In Hindi

Munsi-premchand-ki-kahani-hindi-1

शहजादा मसरूर और मलका मखमूर दोनों शादी करके काफी खुश रहने लगे। मसरूर गाय चराता और खेत जोतता, तो वहीं मखमूर खाना पकाती और चरखा चलाती। इस तरह दोनों मिलजुल कर अपना जीवन चलाते थे। दोनों अपनी इस शादी-शुदा जिंदगी से काफी खुश थे। उनके जीवन में कोई फिक्र या परेशानी नहीं थी, लेकिन जैसे हर दिन एक जैसा नहीं रहता, उसी तरह उनके भी दिन बदलने लगे।

इसका कारण था मसरूर के दरबार का नजरबंद सदस्य बुलहवस खां। बुलहवस खां एक फसादी आदमी था, जिस वजह से उसे दरबार से नजरबंद (निगरानी में रखना) किया गया था। अब वह धीरे-धीरे मलका मखमूर का खास बन गया। मलका अपने सभी सलाह उसी से लेने लगी। उसके पास एक हवाई जहाज था, जिस पर बैठकर वो महज कुछ ही मिनटों में हजारों मील दूर दुनिया की सफर करता और खबर लाता था। कभी-कभी मलका भी उस जहाज पर बैठकर दूसरे देशों की सैर करती थी। बुलहवस कहता था कि बादशाह को अपना साम्राज्य अन्य देशों में भी फैलाना चाहिए। उन्हें दूसरे देशों पर कब्जा करके धन कमाना चाहिए। इसी तरह की कई बातें करके वह मलका के कान भरता और मलका भी उसकी बातों को ध्यान से सुनती। धीरे-धीरे मलका के मन में भी बुलहवस की बातें घर कर गई और उसे अभी अपना सुखी जीवन परेशान करने लगा।

मगर मसरूर एक शांतिप्रिय व्यक्ति था। धीरे-धीरे दोनों पत्नी-पत्नी के बीच कलह बढ़ने लगी और उनके रिश्ते में सिर्फ संदेह रह गया। इतना ही नहीं, उसके कुछ दरबारी भी उसका विरोध करने लगे। इन सबसे परेशान होकर एक दिन उसने सारी सल्तनत मलका के हवाले कर दी और खुद एक पहाड़ी इलाके में जाकर छिप गया।

इस बात को वर्षों गुजर गए। अब मलका अपने सल्तनत की रानी थी। दूसरे देशों पर कब्जा करने के लिए उसने एक बड़ी सेना तैयार कर ली थी। जिसे लेकर उसने कई पड़ोसी मुल्कों पर आक्रमण किया और उन्हें लूटा भी।

वहीं, इन सबके बीच उसके सल्तनत में अब पहले जैसी शांति नहीं थी। उसके लोग आपस में ही एक-दूसरे के विरुद्ध हो रहे थे। इन्ही में से एक था कर्णसिंह बुन्देला। उसकी अपनी ही एक अलग फौज थी, जो मलका के कारनामों के खिलाफ था। उसकी फौज कोई हथियार बंद सेना नहीं, बल्कि गाने-बजाने वाले लोगों से भरी हुई थी। एक दिन कर्णसिंह बुन्देला की फौज ने मलका के महल में चढ़ाई कर दी। मलका को लगा कि वो इन्हें आसानी से हर देगी। यही सोचकर मलका ने कर्णसिंह के काफिले पर हमला करने के लिए अपनी सेना भेजी। उसकी सेना ने जब वहां पहुंचकर कर्णसिंह और उसके काफिले के गीत सुनें, तो उनके दिमाग पर एक नशा छाने लगा। जिसने भी उनका गीत सुना नशे में खोकर बेहोश गया। मलका दूर से यह सारा माजरा बस देखे जा रही थी। फिर उसने खुद वहां पर जाने का फैसला किया, लेकिन मलका का हाल भी उसकी सेना जैसा ही हुआ। उन गीतों की आवाज सुनते ही वह भी मदहोश होकर बेहोश हो गई।

इसके बाद कर्णसिंह शाही महल में पहुंचता है और अपना गीत गाना बंंद कर देता है। जैसे ही उसका गीत बंद होता है, मलका होश में आती है और उसने कर्णसिंह से फिर से वही राग सुनाने की इच्छी जाहिर करती। मलका के साथ ही होश में आए, उसके सिपाहियों ने भी अपना मत देते हुए कहा कि उन्हें भी वही राग सुनना है।

उन्हीं के सल्तनत में सूबेदार लोचनदास भी रहता था। जब उसे कर्णसिंह के विजय की खबर मिली, तो उसने भी विद्रोह करने की ठानी। वह भी अपनी फौज लेकर राजधानी में आ गया। मलका ने भी अपने सैनिकों को युद्ध करने के लिए तैयार रखा हुआ था, लेकिन इस बार भी यही हुआ। बंदूक और तलवार जैसे हथियारों से बंधे उसके सैनिक सूबेदार लोचनदास की सरकस करने वाली फौज के सामने एक पल भी नहीं टिके। जैसे ही उसके सैनिक युद्ध मैदान में गए, वहां पर सुन्दर नर्तकियों, एक्टर, सर्कस और बाइस्कोप देखकर वो सभी अपना होश खो बैठे। सूबेदार लोचनदास की सरकस फौज बर्फिस्तानी चोटियां और बर्फ के पहाड़ से लेकर पेरिस का बाजार, लंदन का एक्सचेंज, अफ्रीका के जंगल, सहारा के रेगिस्तान और जापान की गुलकारियां जैसे सैकड़ों विचित्र आकर्षक दृश्य सर्कस में दिखा रहे थे। मलका की पूरी फौज युद्ध भूलकर बेतहाशा होकर इन दृश्यों को देखते हुए बेहोश हो गए।  यहां तक कि मलका भी बेहोश हो गई।

वहीं, लोचनदास अपनी विजय की हुंकार लगाते हुए, जब शाही महल में आया, तो मलका और उसके सिपाही होश में आए। एक बार फिर से उन्होंने लोचनदास से वही तमाशा देखने की इच्छा जाहिर की।

इसी तरह अपनी दूसरी हार देखकर मलका मखमूर को बहुत दुख हुआ। वह पूरा दिन सोचती रहती कि, अगर इसी तरह चलता रहा, तो एक दिन उसका सारा राज्य उसके हाथ से निकल जाएगा। इन हालातों के लिए वह शाह मसरूर को कोसती भी थी। उसका सोचना था कि अगर मसरूर इस तरह सल्तनत से न जाते, तो आज उनकी ऐसी दशा नहीं होती। इसके बावजूद भी मलका में ठाना की वो अपनी सल्तनत को बचाने के लिए मसरूर की मदद नहीं लेगी।

मलका जब भी उन आकर्षक गीतों को सुनती और मनमोहक सर्कस के दृश्य देखती, तो उसे अपने सल्तनत की खबर नहीं रहती। वह सब कुछ भूलकर बस आनंद महसूस करती थी।

एक दिन बुलहवस खां ने लिखा कि, उसे उसके दुश्मनों ने घेर लिया है और वो चारों तरफ से हमला कर रहे हैं। बुलहवस खां के संदेश का मलका पर कोई असर न हुआ। मलका और उसकी फौज गाने सुनने और दृश्य देखने में ही व्यस्त थे।

इतने में दो सूबेदारों ने फिर से बगावत कर दी। इस बार मिर्जा शमीम और रसराज सिंह ने मिलकर राजधानी पर हमला किया। मलका की फौज में अब न पहले जैसी वीरता थी और न ही सल्तनत को बचाने की आग। गाने-बजाने और सैर-तमाशे ने उन्हें आराम से रहने वाला बना दिया था। वहीं, मिर्जा शमीम की फौज के सिपाही भी लड़ाकू नहीं थे। उसके किसी सिपाही के हाथ में फूलों के गुलदस्ते थे, तो किसी के हाथ में इत्र की खुशबूदार शीशियां थी। पूरे मैदान में बस मनमोहक खुशबू ही खुशबू फैली हुई थी। वहीं, दूसरी तरफ रसराज की सेना में किसी सिपाई के पास बर्फी और मलाई की टोकरी थी, तो किसी के पास कोरमे और कबाब थे। कोई खुबानी और अंगूर लिए खड़ा था, तो कोई इटली की चटनी और फ्रांस की शराब।

मलका की फौज जैसे ही मैदान में आती है, वह मिर्जा शमीम की सुगंधित खुशबू सूंघते ही मदहोश हो जाती है। उसकी सेना ने अपने तलवार फेंक दिए और रसराज के स्वादिष्ट पकवानों का लुत्फ लेने लगे। इस बार उसकी फौज का हाल भिखारियों जैसा हो गया था, जो तरह-तरह के खाने के लिए अपना हाथ फैलाए मांग रही थी। सब कुछ खाने के बाद उसकी पूरी फौज वहीं पर बेहोश होकर ढेर हो गई। यही हाल मलका का भी था। वह भी जी भर खा-पी लेने के बाद बेहोश हो गई।

अब मलका अपनी पूरी सल्तनत हार चुकी थी। वह अब इन लोगों की गुलामी करने लगी। कभी कर्णसिंह के दरबार में हाजिर लगाती, तो कभी मिर्जा शमीम की खुशामद करती थी। हां, कभी-कभी थक जाने या बीमार होने पर अकेले बैठकर घंटों रो लेती थी। वह मन ही मन चाहती थी कि मसरूर को मनाकर वापस ले आए, लेकिन अगले ही पल उसका मन बदल भी जाता था।

बुलहवस खां ने जब सल्तनत की यह कमजोरी देखी, तो उसने भी मलका से बगावत करने की ठानी। उसकी फौज ने अगले ही पल में मलका की फौज को हरा कर उसे बंदी बना लिया। गिरफ्तार करने के बाद मलका को एक कैदखाने में बंद करवा दिया गया। अब वह किसी का सेवक नहीं था, बल्कि खुद मलका का स्वामी बन गया था।

जिस कैदखाने में मलका को कैदी बनाया गया था, वह काफी विचित्र था। वह कैदखाना इतना लंबा-चौड़ा था कि वहां से कोई बाहर नहीं भाग सकता था। वहां पर कोई पहरेदार नहीं थे, न ही कैदी के हाथों-पैरों में कोई बेड़ियां थी। फिर भी मलका अपने पूरे शरीर को तारों से बंधा हुआ महसूस करती थी। वह उस कैदखाने में अपनी इच्छा से हिल भी नहीं सकती थी। कैदखाने में दिन के समय वह जमीन पर मिट्टी के घरौंदे बनाती थी और उन्हें महल की तरह समझती थी। पत्थरों के टुकड़ों को गहनों की तरह पहनती और कहती कि उसके सामने हर तरह के हीरे-जवाहरात फीके हैं।

ऐसे ही कई दिन गुजर गए। मिर्जा शमीम, लोचनदास सभी उसे हर वक्त घेर कर रखते थे। उन लोगों के मन में डर भी था कहीं वह कैद में रहते हुए भी शाह मसरूर तक कोई संदेश न भेज दे। वहीं, मलका भी उस कैद से निकल भागने की सोचने लगी।

एक दिन मलका बैठी-बैठी सोचने लगी कि, जो पहले उसके इशारों पर नाचते थे, अब वही उसके मालिक बन गए हैं। वो जैसा चाहते हैं उसे वैसे ही अपने इशारों पर नचाते हैं। उसे अब अफसोस होने लगा था कि उसे शाह मसरूर की बात मान लेनी चाहिए। वह दिन-रात बस इस कैदखाने से भागने और शाह मसरूर से मिलने का सोचती रहती। इसके बाद उनकी हर बात मानने की भी कसम खाती। खुद को कोसती कि उसके इस नमक हराम बुलहवस खां की बातें क्यों सुनी। यही सब सोचते-सोचते मलका रो रही थी कि अचानक उसने अपने सामने एक हंसी लिए चेहरे वाला पुरुष देखा, जिसने सादे कपड़े पहने हुए थे।

मलका ने आश्चर्यचकित होकर उससे पूछा- आप कौन? मैंने आपको पहले यहां नहीं देखा है।

पुरुष- मैं इसी कैदखाने की देखरेख करता हूं, लेकिन मैं यहां बहुत कम आता हूं। जब किसी कैदी की तबीयत खराब होती है, तो उसे यहां से निकलने में मैं मदद करता हूं।

मलका ने फिर पूछा- ‘आपका नाम क्या है?’

पुरुष ने  जवाब दिया- ‘संतोख सिंह।’

मलका- ‘क्या आप मुझे इस कैद से बाहर निकाल सकते हैं?’

संतोख- ‘हां निकाल सकता हूं, लेकिन इसके लिए आपको मेरी बताई बातों को मानना होगा।’

मलका- ‘मैं आपके सारे हुक्म मानूंगी। खुदा के लिए मुझे बस यहां से बाहर निकाल दें। मैं पूरी उम्र आपकी शुक्रगुजार रहूंगी।’

संतोख- ‘आप कहां जाना चाहती हैं?’

मलका- ‘मुझे शाह मसरूर से मिलना है। क्या आपको पता है कि वो कहां रहते हैं?’

संतोख- ‘हां, मुझे पता है। मैं उन्हीं का नौकर हूं। उन्होंने ही मुझे इस काम पर रखा है।’

मलका- ‘तो मेहरबानी करके मुझे यहां से निकालें और मुझे उनके पास ले चलें।’

संतोख- ‘ठीक है। तो सबसे पहले तुम्हें ये रेशमी कपड़े और सोने के जवाहरात उतारकर फेंकने होंगे। बुलहवस ने इन्हीं जंजीरों से तुम्हें जकड़ा हुआ है। जो भी सबसे मोटा कपड़ा हो बस वही पहन लो। तुम्हारे पास जितनी भी इत्र की शीशियां हैं सब तोड़ दो।’

मलका ने ठीक वैसा ही किया जैसा संतोख ने करने के लिए कहा। इतने में वहां पर बुलहवस खां आया। रोते हुए कहने लगा-  मेरी मालकिन मलका, मैं आपका गुलाम हूं क्या आप मुझसे नाराज हैं?

मलका ने उसकी तरफ देखा और गुस्से में मिट्टी के बनाए घरौंदों को पैरों से गिरा दिया। इसके बाद बुलहवस के शरीर का एक-एक अंग कटकर जमीन पर गिरने लगा। अगले ही पल में वह जमीन पर गिरा और मर गया।

यह देखकर संतोख ने कहा- ‘मलका क्या तुमने देखा? तुम्हारा दुश्मन कितनी आसानी से खाक में मिल गया।’

मलका- ‘काश! मैं यह बहुत पहले करती, तो आज ऐसे कैद में नहीं होती, लेकिन मेरे अभी और भी दुश्मन हैं।’

संतोख- ‘चलो कर्णसिंह के पास चलते हैं। जैसे ही वह अपना गीत गाना शुरू करे, तुम बस अपने कानों पर हाथ रख लेना।’

मलका कर्णसिंह के दरबार में गई। उसे देखते ही दरबार में चारों तरफ से गाने के धुन बजने लगें। मलका ने तुरंत अपने दोनों कानों को बंद कर लिया। इतना करते ही कर्णसिंह के दरबार में आग लग गई। उसके सारे दरबारी जलने लगे। यह सब देखकर कर्णसिंह दौड़ता हुआ मलका के पैरों में गिर पड़ा और बोला- इस गुलाम पर रहम करें, मालकिन। अपना कानों पर से हाथ हटा लें, वरना मेरी जान जा सकती है।

मलका- ठीक है, लेकिन मेरी शर्त है कि फिर कभी तू बगावत नहीं करेगा।

तभी कर्ण सिंह ने संतोख सिंह की तरफ गुस्से में देखा और उसे कोसते हुए दरबार से भाग गया।

इसके बाद संतोख सिंह ने मलका को लोचनदास के पास जाने के लिए कहा। उसे समझाते हुए कहा कि जैसे ही वह अपने करिश्मे दिखाना शुरू करेगा, तुम अपनी आंखें बंद कर लेना।

फिर मलका लोचनदास के पास गई। मलका को दरबार में देखते ही लोचन ने अपने सर्कस के कारनामे दिखाने शुरू कर दिए। इतने में मलका ने अपनी आंखें बंद कर लीं। ऐसा देखकर लोचनदास मलका को सर्कस देखने के लिए उकसाने लगा, लेकिन मलका ने अपनी आंखें न खोलीं।

फिर वह कांपता हुआ मलका के सामने आया और हाथ जोड़कर बोलने लगा- ‘मालकिन, कृपया अपनी आंखें खोलें और मुझ पर रहम करें। अगर मुझसे कोई गलती हुई है, तो उसे माफ करने का एहसान करें।’

उसकी बातों को सुनकर मलका ने कहा- ‘ठीक है, मैंने तेरी जान बख्श दी है, लेकिन अब फिर कभी यहां पर सिर उठाकर न चलना।’

लोचनदास ने मलका की बातें सुनते ही उसका शुक्रिया किया और वहां से अपनी जान लेकर भाग खड़ा हुआ।

संतोख सिंह फिर दरबार में आता है और मलका से मिर्जा शमीम और रसराज के पास जाने के लिए कहता है। मलका को समझाते हुए कहता है कि उनके पास जाते ही अपने एक हाथ से नाक बंद कर लेना और दूसरे हाथ से पकवानों को नीचे जमीन पर गिरा देना।

इसके बाद मलका रसराज और शमीम के दरबार में जाती है और ठीक वैसा ही करती है, जैसा संतोख ने बताया था। अगले ही पल मिर्जा शमीम और रसराज दोनों के सिर से खून गिरने लगा, उनके शरीर का अंग टूट कर गिरने लगा। इसी हालत में वे मलका के पास आते हैं और गिड़गिड़ाते हुए कहते हैं- ‘हुजूर, हम गुलामों पर रहम करें। अगर हमसे कोई गुस्ताखी हुई है, तो उसे माफ करें। दोबारा से ऐसी गलती नहीं होगी।’

मनका ने उनकी बातें सुनकर कहा- ‘रसराज को मैं जान से मारना चाहती हूं, क्योंकि उसके कारण ही मुझे जलील होना पड़ा।’

तभी संतोख सिंह ने वहां आकर मनका को ऐसा करने से रोक दिया। उसने मनका से कहा- ‘इसे जान से मारना समझदारी नहीं है। इस तरह के सेवक का मिलना कठिन होता है। यह सभी सूबेदारों में अपना काम करने में सबसे बेहतर है। इसलिए इसे जान से मत मारिए, बस अपने काबू में रखिए।’

मलका ने ठीक वैसा ही किया। उसने दोनों की जान बख्श दी और उन्हें चेतावनी देते हुए रिहा कर दिया। वे दोनों अपनी-अपनी जान लिए वहां से भाग गए।

मलका की जीत और आजादी की खुशी की खबर सल्तनत में फैल गई। फौज और उसके लोगों ने उसका खुले दिल से स्वागत किया। वहीं, दूसरी तरफ चारों बागी सूबेदार शहर में घात लगाकर छुप गए। फिर संतोख सिंह ने जब वहां के लोगों और फौज को मस्जिद में शुक्रिए की नमाज अदा करने के लिए ले गए, तो बागियों को वहां पर भी हार मिली। उनका एक भी इरादा सफल नहीं हुआ और वे वहां से चलते बने।

मलका ने संतोख सिंह का शुक्रिया करते हुए कहा- ‘मेरे पास इतनी ताकत या कोई शब्द नहीं, जिससे मैं आपके एहसानों का शुक्रिया अदा कर सकूं। अब आप मुझे शाह मसरूर के पास ले चलिए। मैं उनकी सेवा करूंगी और उन्हीं के साथ अपनी पूरी जिंदगी गुजारुंगी।’

संतोख सिंह- ‘ठीक है, लेकिन वहां तक पहुंचने का रास्ता बहुत कठिन है, तुम घबराना मत।’

वहां, चलने के लिए मलका ने बुलहवस का दिया हुआ हवाई जहाज मंगाया, लेकिन संतोख सिंह ने उससे जाने के लिए मना कर दिया। उसने कहा कि उसे पैदल ही अपना यह सफर तय करना है। मलका ने इस बार भी ऐसा ही किया।

वह दिन भर बिना कुछ खाए-पिए चलती रही। थकान के कारण उसकी आंखों के सामने अंधेरा छाने लगा। उसके पैरों में छाले पड़ गए। उसने संतोख से पूछा कि अभी और कितनी दूर है?

संतोख- ‘अभी बहुत दूर है। तुम्हें पूरे रास्ते चुप रहना होगा, क्योंकि बातें करने से मंजिल और भी मुश्किल हो जाती है।’

रात होते-होते वे एक नदी के किनारे पहुंचे। वहां कोई नाव नहीं था। मलका ने संतोख से पूछा कि नाव कहां है?

संतोख ने उसे बताया कि उसे नदी भी चलकर पार करनी होगी।

मलका को नदी में जाने से डर लग रहा था, लेकिन फिर भी उसने हिम्मत जुटाई और नदी पार करने के लिए उसमें उतर पड़ी। अगले ही पल उसे मालूम हुआ कि वह नदी सिर्फ उसकी आंखों का धोखा थी। असलियत में वह बस एक रेतीली जमीन थी। जैसा-जैसे रात बीत रही थी मलका को लग रहा था कि यह सफर तय करते-करते वह मर ही जाएगी। फिर वो इसे पूरा जरूर करेगी।

सुबह तक वो एक पहाड़ी के सामने पहुंच चुके थें। उस पहाड़ की चोटियां आसमान से भी ऊंची थी। संतोख सिंह ने मलका से कहा कि शाह मसरूर इसी पहाड़ी की सबसे ऊंची चोटी पर हैं। फिर उससे पूछा- ‘क्या तुम इस पर चढ़ सकती हो?’

मलका ने हिम्मत दिखाते हुए कहा- ‘हां, मैं चढ़ने की पूरी कोशिश करूंगी।’

इसके बाद वह तेजी से उस पहाड़ पर चढ़ने लगी। पहाड़ के बीचो-बीच आकर वह थक गई और वहीं पर बैठ गई। तभी फिर से संतोख सिंह उससे कहता है कि एक बार फिर से ऐसी ही हिम्मत करो। उसकी बातें सुनकर मलका फिर से हिम्मत बांधती है और फुर्ती दिखाते हुए पहाड़ पर चढ़ने लगती है। जब वह पहाड़ की सबसे ऊंची चोटी पर पहुंच जाती है, तो वहां की शुद्ध हवा में सांस लेते हुए उसे एक नई जिंदगी पाने जैसा एहसास होता है। जब उसने संतोख सिंह की तरफ देखा, तो वह आश्चर्य में डूब गई। उसके सामने खड़ा संतोख सिंह का चेहरा शाह मसरूर का बन गया था। उसे देखते ही मलका शाह के पैरों पर गिर गई और रोने लगी। फिर शाह मसरूर ने उसे उठाकर गले लगा लिया।

कहानी से शिक्षा

किसी चीज के मोह में पड़ना या लालच करना खुशहाल जीवन को कैद कर सकता है। वहीं, अगर मजबूत इरादों से इनका सामना किया जाए, तो इनसे छुटकारा पाया जा सकता है।

अपनी करनी | Apni Karni Premchand Story In Hindi

Apni Karni Premchand Story In Hindi

ओह हो! मेरे ही कर्मों की वजह से आज मैं इतना अभागा महसूस कर रहा हूं। मेरे ऊपर आज अपमान भी हंसता होगा, क्योंकि मैंने खुद अपने हाथों से सब कुछ उजाड़ दिया। एक साल पहले मैं इतना किस्मत वाला था, क्या ही कहूं। आराम की जीवन, अच्छी सेहत, पत्नी और दो प्यारे बच्चे, ऊंचा घराना उसपर पढ़ा-लिखा होने के बाद भी मैंने खुद ही ऐसी हालत कर ली है। एक इंसान को जो कुछ भी एक अच्छी जिंदगी जीने के लिए चाहिए, वो सब मेरे पास था। मैं अब किसी योग्य नहीं, क्योंकि मैंने किसी चीज की कदर ही नहीं की।

मेरे जीवन में ऐसी महिला थी, जिसने मुझमें लाख बुराई होने के बाद भी कुछ बुरा नहीं कहा। कभी गुस्सा नहीं किया। मैं ऐसा हूं कि दीवानगी के नशे में चूर होकर उसे इज्जत नहीं की। उसे तड़पाया, रुलाया और मन-ही-मन खूब जलाया भी। उफ्फ! उसे कितना धोखा दिया और अंधेरे में रखा। देर रात घर आते हुए न जाने कितने बहाने बनाए। रोज नई कहानी बना लेता था। क्या वो मेरे झूठे प्यार के दिखावे को नहीं समझी होगी? मेरा झूठ-फरेब क्या छिपा रह सकता था? भले ही वो अच्छी और भोली थी, लेकिन बेवकूफ नहीं।

मैं जितना झूठा था, वो उतनी सच्ची। मैं जितना गलत व्यवहार करता, वो उतना अच्छा करती। उसे दुनिया के सामने हमारे रिश्ते का मजाक उड़ाना पसंद नहीं था, इसलिए वो मेरे व्यवहार का जिक्र लोगों के सामने कभी नहीं करती थी। शायद उसे हमेशा लगता था कि मैं एक दिन सुधर जाऊंगा और मेरे सिर से ये नशा उतर जाएगा। काश! वो इतनी अच्छी न होती। वो अपने हक के लिए मुझसे लड़ती।

इसी बीच एक दिन मैं आनंद वाटिका मछलियों का करतब देखने गया। वहां मेरी नजर अचानक एक लड़की पर गई, जो फूल तोड़ रही थी। उसके कपड़े मेले थे और वो छोटी उम्र की लड़की थी, जिस वजह वो ताजगी भरी लग रही थी। इसके अलावा, उस लड़की में ऐसी कोई खास बात नहीं थी। कुछ ही देर में उस लड़की ने मेरी तरफ देखा और इस तरह से नजरें फेरी जैसे मैं वहां मौजूद ही नहीं। ऐसा मेरे साथ पहले कभी नहीं हुआ था। मैं इससे परेशान होकर धीरे-धीरे उन फूलों की झाड़ियों के पास पहुंच गया और खुद भी फूल चुनने लगा। मुझे देखते ही माली की वो बेटी बाग के दूसरी दिशा में जाकर फूल चुनने लगी।

उसी दिन से मैं रोज उस आनंद वाटिका में जाने लगा। ऐसा नहीं था कि मुझे उस लड़की से प्यार हो गया था। बस कुछ पाने का मोह मुझे वहां खींचकर ले जाता था। मैं रोज रूप बदलकर वहां जाता, लेकिन हाथ कुछ नहीं लगता। प्यार की बातें होना तो दूर की बात थी, वो मेरी तरफ देखती भी नहीं थी। इस योजना से जब काम नहीं चला, तो मैंने नई तरकीब सोची।

अगले दिन मैं अपने बुलडॉग टॉमी के साथ आनंद वाटिका गया। जैसे ही वो लड़की अपने आंचल में फूल भरकर बाग से जाने लगी, मैंने अपने टॉमी को उसकी तरफ जाने का इशारा कर दिया। वो बुलडॉग भौंकते हुए तेजी से उस लड़की की ओर दौड़ा। वो अपने पीछे कुत्ता देखकर चीखते हुए तेजी से भागी और कुछ ही दूरी पर गिर गई। मैं भी फटाफट छड़ी लेकर वहां गया और अपने टॉमी को एक दो मार लगा दी। उसके बाद फूलमती के आंचल से जमीन पर गिरे फूलों को समेटकर उसे हाथों से पकड़ कर बैठा दिया। फिर उससे दुखी होकर पूछा कि तुम्हें लगी तो नहीं? यह बुलडॉग बदमाश हो गया है। इसने काटा तो नहीं?

उस लड़की ने दुपट्टे से मुंह को ढकते हुए कहा कि तुमने समय पर आकर बचा लिया, वरना ये मार ही डालता। अपनी तारीफ उससे सुनकर मन को अच्छा लगा और दिल जोर से धड़का। मेरे मन में हुआ कि यह तरीका काम कर गया है। उस दिन से उस फूलमती से मेरी बातें होनी शुरू हुई। उसके बाद मैंने जाल फलाया, बातें रची और न जाने क्या-क्या किया। इन सब तरकीबों के बारे में दिल फेक किस्म के सारे लोग जानते हैं। ऐसा नहीं था कि मैं उस लड़की के सौंदर्य से प्रभावित था, क्योंकि मेरी पत्नी इंदु से सुंदर कोई हो ही नहीं सकती थी। फिर भी न जाने क्यों मैं उस फूलमती की धसी हुई आंखों और गालों पर फिदा हो रहा था। होते-होते मैं खुद मोहब्बत के जाल में फंस गया।

घर-बार मुझे कुछ भी अच्छा नहीं लगता था, लेकिन मेरे इस प्रेम के बारे में किसी को खबर न हो, इसलिए मैं घर में इंदु से काफी प्यार से बातें करता था। इस नाटक का एक ही कारण था कि मैं अपनी हरकत को इसके पीछे छिपा सकूं। वक्त के साथ मैंने ये नाटक बंद कर दिया और घर व पत्नी की जरूरतों से मुंह मोड़ लिया। सच कहूं तो पत्नी से कुछ भी कहते हुए डर लगता था कि कहीं उसके मन की बात जुबान पर न आ जाए। यूं तो मैं कभी भी जौहरी की दुकान गया नहीं था, लेकिन अब मेरा वहां आना-जाना भी होने लगा। मेरा वक्त पैसा सब कुछ सिर्फ फूलमती का ही था।

एक दिन मैं हमेशा की तरह शाम के समय आनंद वाटिका में घूम रहा था। तभी मैंने फूलमती को देखा, वो मेरे दिए हुए गहने और रेशम की साड़ी पहन कर फूल तोड़ रही थी। उसी वक्त राजा भी कुछ दोस्तों के साथ वहां पहुंच गए। फूलमती राजा को पहचानती थी, इसलिए तेजी से झाड़ी की तरफ छिप गई। उस वक्त महाराज को जाना तो था पानी के कुंड के पास, लेकिन वो बाग की तरफ ही चले गए। वहां उन्होंने झाड़ी के पीछे फूलमती को छिपते हुए देखकर गुस्से में पूछा, “तुम कौन हो और यहां क्या कर रही हो?”

उस समय आनंद वाटिका का सारे लोग मेरी तरफ ही देखने लगे। मुझे भी लगा कि झट से जवाब दे देना चहिए, नहीं तो पता नहीं क्या हो जाए। मैंने कहा, “महाराज, ये यहां के माली की बेटी है।” यह सुनते ही राजा और बिगड़ गए। उन्होंने पूछा, “ये माली की बेटी है? इसके कपड़े गहने इन सबको देखकर कहां से लग रहा है कि ये माली की बेटी है।”

तभी माली भी वहां पहुंच गया और उसने जवाब में कहा, “साहब! यह मेरी ही बेटी है।”

राजा ने गुस्से में पूछा, “तुम्हारी तनख्वाह कितनी होगी?”

माली ने बताया, “पांच रुपये।”

फिर राजा ने पूछा, “क्या यह शादीशुदा है?”

माली जवाब में बोला, “नहीं।”

यह सुनते ही महाराज ने नाराज होते हुए कहा, “इसका मतलब तू चोरी करके इसे ये गहने और रेशम की साड़ी देता है। अभी मैं तेरी शिकायत पुलिस में करता हूं। कमाता है पांच रुपये और बेटी को गहनों से लदा रखा है।”

महाराज के पैर पर गिरकर माली बोलने लगा, “साहब! मेरी वफादारी पर सवाल मत उठाइए। ये इस लड़की की ही हरकत है। आजकल ये बड़े लोगों के साथ उठने बैठने लगी है। इसने मेरी नाक कटा दी है। वहां से ही इसे ये सबकुछ मिला है। आप जानते ही हैं अमीर लोग कैसे होते हैं।”

इतना सब सुनते ही महाराज ने जोर देते हुए पूछा, “क्या इसका संबंध किसी सरकारी नौकर के साथ है?”

माली ने जवाब में हां कहा।

फिर महाराज बोले, “जब भी मैं तुमसे उसका नाम पूछूंगा तुम्हें बताना होगा।”

वो सिर झुकाते हुए कहने लगा, “बिल्कुल महाराज! सच को किसी बात का भय नहीं होता है। आप जब भी पूछेंगे मैं नाम जरूर बताऊंगा”

उस समय मेरा शरीर पूरा ठंडा पड़ गया। मन में हुआ कि आज ही राजा के सामने मेरा राज खुल जाएगा और बदनामी होनी पक्की है। लेकिन, महाराज ने अपने दरबार के कार्यकर्ता की इज्जत को यूं सरेआम उछालना ठीक नहीं जाना और नाम बाद में पूछने की बात कहते हुए अपनी गाड़ी में बैठकर महल चले गए।

तभी मैं अपने घर पहुंचा, तो वहां एक बूढ़ी औरत दिखाई दी। वो बिल्कुल पूछताछ करने वाली जासूस महिला लग रही थी, जो चेहरे पर नकली भोलापन लेकर चलती है। मैंने अंदर जाते ही पत्नी से पूछा, “कौन थी वो?” उसने बताया कि एक भिखारन थी। मेरे मन में हुआ कि वो ऐसी तो लग नहीं रही थी।

मैंने गुस्से में कहा, “वो भीख मांगने आई थी, ऐसा तो बिल्कुल नहीं लग रहा था।”

मेरी पत्नी ने मुझपर तंज कसते हुए कहा, “आजकल अंदर से कौन कैसा होता है किसी को पता थोड़ी चलता है। वो भीख मांगने के लिए आई थी मैंने दे दी। वो कैसी है, कैसी नहीं, इसकी जांच नहीं की मैंने।”

तब मैं नाराज होकर पत्नी का हाथ पकड़ते हुए बोला, “देखो, जो भी है सच-सच मुझे बता दो। मैं तुमपर बहुत भरोसा करता हूं और मुझे अपनी इज्जत किसी भी चीज से ज्यादा प्यारी है। तुम्हारे बात करने के तरीके से ही मैं समझ रहा हूं कि जरूर कुछ गड़बड़ है।”

तभी वो रोते हुए बोली, “तुम मुझपर शक मत करो। मैं उस महिला की बात में आ गई थी और घर का पूरा हाल बता दिया।”

मेरा गुस्सा कम हुआ और मैंने इंदुमती से पूछा, “आखिर क्या हाल बता दिया तुमने उसे?”

उधर से जवाब आया, “सबकुछ तुम्हारे घर से यूं मुंह मोड़ना, लापरवाही, बेवफाई, किसी चीज की फिक्र न करना। मैंने सब उसे बता दिया। तुम्हें अंदाजा भी है कि घर चलाने के लिए मेरे सारे गहने बिक गए हैं। तुमने तीन महीने से घर खर्च के लिए एक रुपये भी नहीं दिए हैं। इन सबसे मेरा मन दुखी था और जब उसने प्यार से पूछा, तो मैंने भी सारा हाल कह दिया। लेकिन, आज एक बात साफ हो गई कि तुम्हें मुझपर भरोसा नहीं है। वरना इस तरह से बात नहीं करते।”

यह सब जानते ही मैंने अपने दोनों हाथों से अपना सिर पकड़ लिया। उधर महाराज को फूलमती और मेरे बारे में सबकुछ पता चलने ही वाला है और इधर घर का सारा भेद एक औरत लेकर चली गई है। किसी तरह रात गुजरी और मैं सुबह दफ्तर पहुंच गया। वहां पहुंचते ही मुझे महाराज का बुलावा आया।

मेरे दिमाग में यह बात चल रही थी कि पक्का वो बुढ़िया महाराज की ही भेजी हुई गुप्तचर होगी। उसने सारी रिपोर्ट यहां दे दी होगी। यह सोचते हुए मैं महाराज के पाच पहुंचा। वो पूजा के कमरे में थे और उनके चारों तरफ कागज-ही-कागज बिखरे नजर आ रहे थे।

उन्होंने मुझे देखते ही नाराज अंदाज में कहा, “कुंवर श्याम सिंह मुझे जो कुछ भी पता चला है, उसके बाद तुम्हारे साथ सख्ती से पेश आना होगा। उन्होंने आगे कहा कि तुम यहां के पुराने वसीकेदार हो। यह वसीका यानी पेंशन तुम्हारी कई पीढ़ियों द्वारा अपनी जान लगाकर की गई सेवाओं का नतीजा है, लेकिन तुमने अपनी हरकत से उनका नाम भी खराब कर दिया।”

महाराज ने आगे कहा कि तुम्हें वसीका अपने परिवार पर खर्च करने के लिए मिलता था। तुमने इस वसीके का गलत फायदा उठाया। माली की बेटी पर सबकुछ लुटा दिया। अब मैंने उस वसीके के दस्तावेज से तुम्हारा नाम हटाकर तुम्हारी पत्नी का नाम डाल दिया है, ताकि वो तुम्हारे बच्चों को पढ़ा-लिखाकर इस काबिल बना सके कि तुम्हारी पीढ़ियों की तरह वो महल की सेवा करें। तुम्हारी जैसी हरकत से तो पीढ़ियों का नाम खराब तो होगा ही और वसीकदारों का नाम भी नहीं बचेगा। तुम्हारी पत्नी ही वसीका पाने के काबिल है और तुमको अब मालियों की सूची में डाल दिया गया है। तुम इसी के लायक हो। अब यहां से जाओ और अपनी करनी पर पछताओ। इसके अलावा, तुम्हारे पास करने के लिए कुछ है भी नहीं।

मेरी गलती थी ही, इसलिए मुझे कुछ भी कहने की हिम्मत नहीं हुई। सबकुछ सुनने के बाद मैं घर लौटने लगा। फिर मन से आवाज, आई कौन सा घर? अब तुम्हारा कुछ भी नहीं रहा। धीरे-धीरे ये बात पूरे नगर में फैल जाएगी और लोग तरह-तरह की बातें करेंगे। कुछ झूठी हमदर्दी दिखाएंगे, तो कुछ मजाक उड़ाएंगे। फिर मन हुआ कि एक बार फूलमती से मिल लूं, लेकिन लगा कि अब न वो रौब है और न ही रुतबा कैसे उससे मिलूंगा। उसने कहीं भावनाओं में बहकर मेरे साथ चलने की बात कह दी, तो क्या करूंगा? अकेला तो जैसे भी गुजारा हो जाएगा, लेकिन उसके साथ चीजें मुश्किल होंगी। मन से भी आवाज आई उसी की वजह से सबकुछ बर्बाद हो गया है। इतना सोचकर मैं बंबई की ओर निकल गया।

अब बंबई की ही एक मील में नौकरी करते हुए दो साल बीत गए हैं। पैसे के नाम पर बस इतना ही मिलता था कि किसी तरह कुछ खा-पी लूं। एक बार मैं चुपचाप से अपने घर गया। वहां देखा कि मेरे बच्चे घर के बाहर अच्छे से खेल रहे थे। मेरी पत्नी ने पूरे घर को अच्छे से संभाल रखा था। घर के बाहर दो लालटेन जल रहे थे। सब कुछ बहुत साफ था। तभी मुझे पता चला कि दो-चार महीने मेरी खोज करने के लिए अखबार में कुछ इश्तहार भी छपे थे, लेकिन इस मुंह को लेकर मैं कहां जाता। मैंने फूलमती को भी देखा। पता चला कि वो किसी नए रईस के साथ थी।

अपने जिंदगी पर अफसोस करते हुए मन में हुआ कि अब इसी हालत में जीवन जीना होगा। अब चाहे हंसकर जिंदगी जी लूं या रोकर। अपने पास मौजूद किसी चीज की मैंने कदर नहीं की और खुद अपनी हंसी-खुशी को पैरों से ठोकर मारकर अब पछता रहा हूं। मैं वो इंसान हूं, जिसने अपने सब कुछ को खुद से ही जला दिया और अब उसकी राख भी नहीं बची।

कहानी से सीख :

अपने घर-परिवार को भूलकर किसी पराई महिला के चक्कर में पड़ने से सबकुछ बर्बाद ही होता है। दूसरी सीख यह है कि झूठ छिपाए नहीं छिपता।

शूद्र | Sudra Premchand Story In Hindi

Sudra Premchand Story In Hindi

गांव के सिरे पर एक मां-बेटी झोपड़ी में रहती थी। मां विधवा थी तो बेटी कुवांरी। घर में और कोई आदमी न था। बेटी गौरा बाग से पत्तियां बटोर कर लाती तो मां गंगा भाड़ झोंकती थी। इससे सेर भर अनाज मिल जाता तो दोनों खाकर सो पड़ती थी। इसी से उनका गुजर-बसर हो रहा था।

हर मां की तरह गौरा की मां को भी हमेशा यही चिंता रहती थी कि किसी तरह उसकी बेटी की सगाई हो जाए। पति के मर जाने के बाद गंगा ने कभी दूसरा घर नहीं बसाया, न ही कोई रोजगार शुरू किया था। तब भी मां-बेटी सुकून से रहती थीं। इस बात को लेकर गांव के लोगों पर मां-बेटी पर संदेह होता था। सबके मन में यही सवाल आता था कि दोनों स्त्रियां कोई धंधा नहीं करती, कोई मर्द भी नहीं है तो फिर ये इतने आराम से कैसे रहती हैं। कभी इन्हें किसी के सामने हाथ फैलाते भी नहीं देखा। कुछ न कुछ गड़बड़ जरूर है।

शूद्रों की बिरादरी बहुत छोटी होती है। पांच-दस कोस से अधिक उनका दायरा नहीं होता। आखिर क्या कारण है कि कोई गौरा से शादी के लिए तैयार नहीं होता। गौरा की शादी के लिए मां-बेटी ने साथ कई तीर्थ यात्राएं की। उड़ीसा तक हो आए लेकिन कुछ हल नहीं निकला।

गौरा सुंदर और सुशील थी, लेकिन किसी ने उसे कुएं पर हंसते-बोलते नहीं देखा था। उसकी निगाहें कभी ऊपर न उठती थीं। उसकी ये हरकत गांव वालों के शक को और मजबूत करती थी। सभी को यही लगता कि कोई स्त्री इतनी सती कैसे हो सकती है। दिन गुजरते गए। गौरा की मां चिंता में घुलती जा रही थी। उधर गौरा की सुंदरता, उसकी जवानी गांव वालों की नजरों में चुभ रही थी।

एक परदेसी गांव से दूर नौकरी की खोज में कलकत्ता जा रहा था। दस-बारह कोस दूर पहुंचते उसे रात हो गई। उस समय वह एक गांव में पहुंचा था। वह लोगों से किसी कहार का घर पूछते हुए गंगा के घर पहुंचा। परदेसी को देख गंगा बहुत खुश हुई। गंगा मे उस परेदसी से उसका नाम पूछा, तो परदेशी ने बताया कि उसका नाम मंगरू है। इसके बाद गंगा ने मंगरू का खूब आदर-सत्कार किया। उसके लिए अच्छे पकवान भी बनाएं। धीरे-धीरे दोनों की बातचीत भी बढ़ने लगी। इसी दौरान शादी की चर्चा भी छिड़ गई। मंगरू नौजवान था। तभी उसकी निगाह गौरा पर पड़ी। गौरा एक सुंदर और शांत हाव-भाव की लड़की थी, जिसे देखते ही मंगरू भी मोह में पड़ गया और वह झट से गौरा से सगाई के लिए मान गया।

उसने दो-चार गहने खरीदे और कपड़े उधार लेकर सगाई कर ली। गंगा बेटी-दामाद को अपनी नजरों से दूर नहीं करना चहाती थी, इसलिए दोनों गंगा के साथ ही रहने लगे। दस-पंद्रह दिन भी नहीं बीते थे कि मंगरू के कानों में कई तरह की बातें पड़ने लगी। बिरादरी के अलावा दूसरी जाति के लोग भी कई तरह की बातें बनाने लगे। मंगरू इन अटकलों से परेशान हो गया था, लेकिन वह गौरा को छोड़ना भी नहीं चाहता था।

एक महीने बाद मंगरू अपनी बहन के घर गया। बहन ने खाना परोसा। मंगरू ने बहनोई को साथ खाने के लिए कहा। बहनोई बोला- तुम खा लो, मैं बाद में खा लूंगा। मंगरू को कुछ संदेह हुआ। उसने साफ पूछ लिया कि आखिर बात क्या है?

बहनोई बोला- मैं तुम्हारे साथ नहीं खा सकता। तुमने बिरादरी से बाहर शादी की है। किसी से न कुछ पूछा, न कुछ बताया। जब तक पंचायत नहीं होगी मैं तुम्हारे साथ उठ-बैठ नहीं सकता। तुम्हारी हरकत की वजह से मैं समाज से रिश्ता नहीं खत्म कर सकता।

मंगरू तेजी से उठा और ससुराल लौट आया। मन बेचैन था। उसने किसी से कुछ नहीं कहा और रात के अंधेरे में गौरा को छोड़कर चला गया। इसी तरह कई साल बीत गए, लेकिन मंगरू का कुछ पता न चला। पति के गायब होने पर भी गौरा उदास न थी। वह हंसती-खेलती, मांग में सिंदूर लगाती, रंग-बिरंगे कपड़े पहन कर तैयार होती थी। अपने पीछे मंगरू एक भजन की किताब छोड़ गया था। खाली समय में गौरा उस किताब से कोई भजन गाती थी।

पहले गौरा गांव की औरतों से ज्यादा मिलती-जुलती नहीं थी। दरअसल, उसके पास उन स्त्रियों से बात करने के लिए कोई विषय ही नहीं होता था। गौरा के पास अब गृहस्थ जीवन की ढेरों बातें थी, जिसकी चर्चा वह गली मोहल्ले की औरतें के साथ करती थी। वह सभी को बताती कि मंदरू कितना अच्छा, सहनशील है। तभी वहां मौजूद एक स्त्री ने पूछ लिया- गौरा मंगरू तुम्हें छोड़ कर क्यों चला गया?

गौरा कहती- मर्द कभी ससुराल में रह सकता है भला? बाहर जाकर पैसे कमाना ही मर्द का असली काम है। वहीं जब कोई गौरा से ये सवाल करता कि- मंगरू खत क्यों नहीं लिखता?

इस पर गौरा मुस्कुरा कर कहती- अपना ठिकाना बताने से डरते हैं। जानते हैं कि गौरा सामने आ पहुंचेगी। सच कहूं तो मैं उनके बिना एक दिन भी नहीं रह सकती।

एक सहेली बोली- तेरी बात हम नहीं मानते। जरूर मंगरू और तेरी लड़ाई हुई होगी। तभी इसी तरह बिना बताए वह तुझे छोड़कर चला गया।

गौरा बोली- बहना, अपने भगवान से भी भला कोई लड़ता है क्या? जिस दिन ऐसी नौबत आई मैं कहीं जाकर डूब मरुंगी।

कई दिनों बाद कलकत्ता से एक आदमी आया और गंगा के घर रुका। इत्तेफाक से वह मंगरू का पड़ोसी निकला। उसने कुछ पैसे और दो साड़ियां गौरा के हाथ में थमाई और बोला कि मुझे मंगरू ने तुम्हे लेने भेजा है। ये सुनते ही गौरा की खुशी का ठिकाना न रहा। वह फटाफट जाने के लिए तैयार हो गई। गांव की औरतों से मिल आई और सबको अपने जाने की खबर दे आई। बेटी के जाने से गंगा मायूस थी, लेकिन साथ ही खुश भी थी।

रास्ते भर गौरा के मन में हजारों अच्छे-बुरे ख्याल आते रहे। बीच-बीच में उसे अपनी मां के अकेलेपन की भी याद आ जाती। डर सताता कि बेचारी अम्मा अकेले कैसे रहेगी, सारा काम अकेले करना पड़ेगा। बूढ़ी दिन भर रोती रहेगी। इसी उधेड़बुन में रास्ता कट गया। लगभग तीन दिनों बाद गाड़ी कलकत्ता स्टेशन पहुंची। गौरा का दिल जोर से धड़क रहा था।

वह प्लेटफार्म पर उतर कर मंगरू का इंतजार करने लगी। बूढ़ा बोला- मैंने आस पास सभी जगह देख लिया, लेकिन मंगरू तो कहीं दिखाई नहीं दे रहा है। शायद अब तक आया नहीं है।

गौरा घबरा गई। तभी बूढ़ा बोला- चलो हम डेरा पर चलते हैं, उसे मालूम न था कि हम कौन सी गाड़ी से आ रहे हैं। ऐसे में भला उसकी राह देखने से कोई फायदा नहीं। गौरा बात मान गई और दोनों तांगे पर सवार होकर चल दिए।

यह पहली बार था जब गौरा गांव से बाहर निकली थी, उसकी आंखें इधर-उधर चीजों को निहारने में लगी हुई थी। अचानक तांगा एक सुंदर और विशाल भवन के सामने रूका। गौरा उतरी और तेजी से सीढ़ियों के सहारे ऊपर चढ़ने लगी। मंगरू से मिलने की थोड़ी भी देरी उससे बर्दाश्त नहीं हो रही थी।

तभी बूढ़े ने पहली मंजिल के एक कमरे की ओर इशारा करते हुए कहा- यह मंगरू का कमरा है। जाओ वह अंदर ही पड़ा होगा। गौरा अंदर गई लेकिन कमरे में कोई न था। कोने में खाट और चार-पांच बर्तन पड़े हुए थे। वह बाहर आई और बूढ़े को बताया। बूढ़ा बोला- मंगरू काम पर गया होगा। शाम को लौटेगा। यहां वह किराये पर रहता है।

कमरे में मंगरू को न पाकर गौरा थोड़ी मायूस हो गई, लेकिन शाम को मिलने की सोच कर मुस्काई और साफ-सफाई में लग गई। उसने कमरे में झाड़ू लगाया, बर्तन धोए। नहा-धो कर शाम का इंतजार करने लगी। राह देखते-देखते देर शाम हो गई, लेकिन मंगरू का अब तक कोई पता न था। गौरा का मन फिर घबराने लगा। घना अंधेरा छा गया था। परंतु कमरे में एक दीपक तक न था। जब भी किसी की आहट होती तो गौरा को लगता मंगरू आया होगा, लेकिन दरवाजे पर कोई दस्तक न होती थी। कुछ देर बाद दस्तक हुई। गौरा दौड़ी और दरवाजा खोला।

सामने बूढ़ा खड़ा था। गौरा बोली- वो अब तक आए क्यों नहीं आया?

बूढ़ा बोला- अभी मैं मंगरू के दफ्तर से ही लौटा हूं। साहब ने बताया कि मंगरू का ट्रांसफर हो गया है। मंगरू ने साहब से कई मिन्नतें की लेकिन किसी ने उसकी एक न सुनी और दूसरी जगह भेज दिया। मैं दफ्तर से उसका नया पता ले आया हूं। कल सुबह तुम्हें जहाज पर बैठा दूंगा फिर तुम अपने मंगरू के पास चली जाना।

गौरा घबरा कर बोली- जहाज में? कितने दिन का सफर होगा?

बूढ़े ने कहा- कम से कम आठ से दस दिन तो जरूर लगेंगे। लेकिन घबराओ मत, तुम्हें कोई परेशानी नहीं होगी।

तय बात के मुताबिक अगले दिन गौरा बूढ़े के साथ मंगरू के पास जाने के लिए निकली। बूढ़े ने उसे जहाज पर बैठाया और विदा किया। जहाज जैसे-जैसे किनारे से अलग हो रहा था वैसे-वैसे गौरा को लग रहा था कि अब उसकी अम्मा, गांव सब पीछे छूट रहा है। चारों ओर पानी-पानी देख गौरा का मन अजीब हो रहा था। अंजान जगह में मंगरू को कहां खोजेगी, यह सोच-सोच कर उसका दिल बैठा जा रहा था।

जहाज पर कई स्त्रियां और पुरुष सवार थे। गौरा उन्हें देख और उनकी बातें सुन रही थी। तभी उसकी नजर एक कोने में अकेली बैठी स्त्री पर पड़ी। गौरा ने हिम्मत कर उससे पूछा- कहां जा रही हो बहन?

ये सुनते ही स्त्री की आंखें डबडबा गई। बोली- मुझे नहीं मालूम कि मैं कहां जा रही हूं। बस जहां भाग्य ले जाए वहां चली जा रही हूं। तुम कहां जा रही हो?

गौरा बोली- मैं तो अपने मालिक के पास।

स्त्री झट से बोली- बहन कोई तुम्हें बहला-फुसला कर लाया है। तुम किसके साथ यहां आई?

गौरा ने कहा- मुझे एक बूढ़ा ब्राह्मण यहां बैठा गया। मैं तो अपने पति से मिलने कलकत्ता आई थी।

स्त्री बोली- किनारे पर जो लंबा, दुबला-पतला सा बूढ़ा था, जिसकी एक आंख फूली हुई थी वही?

गौरा- हां, बहन वही।

स्त्री बोली- बहन उसी दुष्ट ने मेरा जीवन बर्बाद किया है। भगवान करे, उसकी सात पुश्तों को नरक नसीब हो। उस कपटी के कारण मैं किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रही। अब जा रही हूं मिश्र देश, वहीं मेहनत-मजदूरी करके गुजर-बसर करूंगी।

ये सब सुनकर गौरा के मुंह से बोल न फूटे। वह सोचने लगी कि अब क्या करूंगी? उसे अपनी मां, अपने गांव, सहेलियों की याद आने लगी। कुछ क्षण बाद हिम्मत करके बोली- अब क्या करें बहन?

स्त्री बोली- अब यह तो वहां पहुंचने के बाद ही मालूम चलेगा। यह कहते-कहते वह जोर-जोर से रोने लगी और अपना दुख बताने लगी।

गौरा ने हिम्मत दी तो स्त्री ने बताया कि शादी के तीसरे साल में उसके पति की मौत हो गई। पति के ख्यालों के साथ वह किसी तरह जी ही रही थी कि एक रोज पापी बूढ़ा वेश बदलकर भिक्षा मांगने आया। उसने सन्यासी का रूप धारण किया हुआ था। मैं उसके जाल में फंस गई और आज मेरी यह दुर्दशा है। इसने मुझे पति से मिलवाने का लालच दिया। मैं बेवकूफ पति से मिलने की चाह में इस बहरूपिया की बात में फंस गई और इसके साथ चल दी। आगे कि कहानी मुझे नहीं मालूम। अगले दिन जब मुझे होश आया तो मैं घर भी नहीं लौट सकती थी। अब बूढ़ा मुझे यहां ले आया और जहाज पर छोड़ गया है।

स्त्री की बातें सुनकर गौरा को समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या प्रतिक्रिया दे। वह बिल्कुल मौन हो गई थी। मंगरू से मिलन का सपना एक झटके में टूट गया था। गौरा को इस हाल में देख स्त्री बोली- भगवान पर भरोसा और साहस रखो बहन। हिम्मत पाकर गौरा बोली- मुझे अब तुम्हारा ही सहारा है, मैं और तुम दोनों अब साथ ही रहेंगे।

स्त्री कुछ न बोली। दोनों एक टक नीले आकाश की ओर निहारने लगी। कई घंटों बाद जहाज किनारे पर पहुंचा। सभी यात्री उतरने लगे। तट पर मौजूद एक आदमी सभी यात्रियों के नाम लिख रहा था। अब गौरा के उतरने की बारी आई। जैसे ही उसने पांव नीचे रखा, वह चौंक गई। उसके शरीर में करंट दौड़ गया। वह जड़ बन गई। न कुछ बोल पा रही थी और न ही पीछे से आवाज दे रहे यात्रियों की बात सुन रही थी। ऐसा लगा मानों दुनिया रुक गई हो।

गौरा के सामने वह दृश्य था, जिसकी उसने उम्मीद छोड़ दी थी। तट पर खड़ा व्यक्ति जो यात्रियों के नाम लिख रहा था वह कोई और नहीं बल्कि मंगरू था। गौरा इस क्षण सातवें आसमान पर थी। उसकी खुशी छिपाए नहीं छिप रही थी। मंगरू ने अपना हाथ आगे बढ़ाया। गौरा ने प्रतिक्रिया न दी। इतने में यात्रा के दौरान मिली स्त्री ने गौरा को कोहनी मारी। गौरा लड़खड़ा गई। मंगरू ने उसे थाम लिया।

स्त्री- क्या हुआ? इस आदमी को पहचानती हो?

गौरा बोली- बहुत अच्छी तरह से। ये ही तो वे हैं जिनसे मिलने के लिए मैं घर से निकली।

स्त्री बोली- अच्छा तो ये तुम्हारे पति हैं। अब तो तुम मेरे साथ न आओगी? मुझे भूल जाओगी?

गौरा बोली- क्या ऐसा भी हो सकता है भला। तुमने मुझे सहारा दिया है।

मंगरू इन दोनों से दूर अपने काम पर लगा हुआ था। वह यात्रियों से जानकारियां जुटाने में व्यस्त था। गौरा कोने में खड़ी मंगरू को निहार रही थी। कुछ देर बाद उसका काम खत्म हुआ और वह गौरा के पास आया।

मंगरू- तुम कौन हो? क्या नाम है तुम्हारा और कहां से आई हो?

गौरा मंद-मंद मुस्काई और बोली- गौरा नाम है हमारा। मदनपुर, बनारस से आए हैं।

मंगरू ने उसका हाथ थाम लिया और आंखों में आंसू लिए बोला- भला तुम यहां आई कैसे?

गौरा ने उसके आंसू पोछे और चौंक कर बोली- तुमने ही तो बुलावा भेजा था, सो मैं आ गई।

मंगरू को समझ नहीं आया कि गौरा क्या कह रही है। उसने बोला- मैंने कब बुलावा भेजा? भला मैं तो पिछले 7 सालों से यहां कैद हूं। चाह कर भी घर नहीं जा सका।

गौरा घबरा कर बोली- तुमने बूढ़े को नहीं भेजा था मुझे लाने के लिए?

मंगरू बोला- बिल्कुल नहीं। गौरा का मन छोटा हो गया। उसने इस जवाब की आशा न की थी।

गौरा गुस्से में बोली- मैं कल ही यहां से चली जाऊंगी। मुझे तुम पर बोझ नहीं बनना।

मंगरू बोला- अब तुम यहां से अगले पांच सालों तक नहीं जा सकती गौरा। यही यहां का नियम है।

गौरा बोली- ठीक है फिर, मैं अलग रह कर अपना पेट पाल लूंगी, लेकिन तुम पर भार न बनूंगी।

मंगरू बोला- तुम मेरे लिए कभी बोझ नहीं हो सकती गौरा। तुम सती हो, देवी हो। जिस बूढ़े आदमी ने तुम बहकाया उसी ने मुझे भी यहां भेजा है। आओ मेरे साथ, मेरे ठिकाने पर चलो। वहां आराम करने फिर आगे बातें होगी। यह स्त्री कौन है तुम्हारे साथ?

गौरा बोली- यह मेरी सहेली है। यात्रा के दौरान जहाज पर मिली। इसका यहां कोई न है अत: यह मेरे साथ ही रहेगी।

मंगरू मान गया। तीनों लोग पैदल चल दिए। तभी सामने से दो लंबे-चौड़े शरीर के आदमी आते दिखाई दिए। मंगरू के पास आकर दोनों आदमियों ने बोला- आज से ये दोनों औरतें हमारी। मंगरू के क्रोध का ठिकाना न था।

मंगरू चिल्लाकर बोला- ये दोनों मेरे घर की स्त्रियां हैं, इन पर आंख तक न डालना।

दोनों आदमी ठहाके लगाकर हंस पड़े। मंगरू का गुस्सा और बढ़ गया। तभी एक आदमी गौरा की ओर बढ़ा और उसका हाथ पकड़ने की कोशिश करने लगा।

मंगरू चिल्लाया- छूना मत वरना अच्छा नहीं होगा।

दोनों आदमी सहम गए और बाद में देख लेने की धमकी देकर आगे निकल गए।

मंगरू, गौरा और उसकी सखी आगे बढ़ गए। मंगरू बोला- इसलिए मैं कह रहा था कि ये जगह तुम जैसी औरतों के लिए नहीं है।

अचानक सामने से एक अंग्रेज आ पहुंचा। उसने मंगरू से कहा- जमादार! ये दोनों औरतें आज से मेरे कोठे में रहेंगी।

मंगरू ने हाथ जोड़ लिए। बोला- साहब! यह मेरे घर की औरतें हैं। इन्हें जाने दीजिए।

अंग्रेज बोला- झूठ मत बोलो तुम। गौरा की ओर इशारा कर उसने कहा- इसको हमारी कोठी में भेज दो।

मंगरू कांप गया और ना में सिर हिलाने लगा, लेकिन तब तक अंग्रेज आगे बढ़ चुका था। साहब की बात पर अमल करना जमादार का काम था। मंगरू समझ नहीं पा रहा था कि वह क्या करे।

आखिरकार रास्ता खत्म हुआ। सामने मजदूरों के रहने के लिए मिट्टी के घर बने थे। बाहर दर्जनों की संख्या में स्त्री और पुरुष बैठे थे। सभी गौरा और सखी को गंदी नजरों से घूर रहे थे।

किसी तरह नजर बचाकर मंगरू दोनों औरतों को घर ले गया और खुद दरवाजे पर बैठा रहा। दोनों स्त्रियां कमरे के भीतर अपने भाग्य को कोसती तो मंगरू दरवाजे पर बैठा रखवाली करता रहा। किसी तरह रात बीती। अगले रोज दिन किसी तरह कट गया। रात के तकरीबन दस बजे दरवाजे पर दस्तक हुई। मंगरू निकला तो देखा सामने सिपाही खड़ा है। सिपाही बोला- चलो तुम्हें साहब ने बुलाया है।

मंगरू बोला- भाई तुम हमारे देश के आदमी हो। मुझ पर मुसीबत आन पड़ी है। मदद करो, जाओ साहब को कह दो कि मंगरू घर पर नहीं है।

सिपाही बोला- न बाबा। वह बहुत गुस्से में है। मैं ऐसा कुछ नहीं कह सकता। तुम साथ चलो।

मंगरू के पास कोई चारा न था, वह सिपाही के साथ निकल गया। मंगरू को सामने देख साहब जोर से चिल्लाया- वह औरत कहां है? कल तुम उसे मेरे कोठे पर क्यों नहीं लाए?

मंगरू ने हाथ जोड़ लिए और बोला- वह मेरी पत्नी है, साहब।

साहब बोला- वह दूसरी कौन थी फिर?

मंगरू- मालिक वह मेरी बहन है।

साहब गुस्से में बोला- हम कुछ नहीं जानते हैं, तुम उन दोनों में से किसी एक को लेकर आओ, जल्दी।

मंगरू साहब के पैरों में गिर गया और रोने लगा, लेकिन साहब का दिल नहीं पसीजा। उसने आदेश दिया- जल्दी एक स्त्री को लेकर आओ वरना तुम्हें कोड़े पड़ेंगे।

मंगरू कोड़े खाने को तैयार हो गया। साहब नशे में था। उसने न आव सोचा न ताव। हंटर निकाला और कोड़े बरसाने शुरू किए। मंगरू की चीख निकल आई। साहब उसे लगातार कोड़े मारते रहे लेकिन वह अपने घर की औरतों की इज्जत देने को तैयार न हुआ। उसने अपने प्राण त्यागना बेहतर समझा।

इधर गौरा और सखी कमरे में बैठे मंगरू की बाट देख रही थी। उन्हें क्या पता कि मंगरू पर क्या बीत रही थी। अचानक किसी के चीखने-रोने की आवाज सुनाई पड़ी। कान लगाकर सुना तो कलेजा मुंह को आ गया। यह मंगरू की आवाज थी। गौरा दौड़ कर दरवाजे पर पहुंची। मंगरू की आवाज सुनकर उससे रहा न गया तो आवाज के पीछे दौड़ गई।

फाटक खुला था। गौरा कोई है, कोई है आवाज देने लगी, लेकिन जवाब न मिला। वह अंदर जा पहुंची। सामने मंगरू खुले बदन लहूलुहान हुए खड़ा था और अंग्रेज उस पर चाबुक बरसा रहा था। गौरा से यह सहन नहीं हुआ। वह दौड़कर मंगरू से लिपट गई और बोली- इनके बदले जितना चाहो मुझे मार लो लेकिन इन पर दया करो।

अंग्रेज खुश होकर गौरा से बोला- तुम यहां मेरे पास रहोगी तो मैं इसे छोड़ दूंगा। गौरा बहुत असहाय महसूस कर रही थी। कुछ न बोली। वहीं मंगरू दर्द से कहरा रहा था। जिस साथ के लिए वह यह सब कर रहा था उसकी आंखों के सामने वह उससे छूट रहा था।

गौरा ने दिल पर पत्थर रख कर कहा- मुझे तुम्हारी शर्त मंजूर है। लेकिन अपने पति के स्वस्थ होने के बाद मैं तुम्हारे पास आऊंगी। अंग्रेज बात मान गया। उसने मंगरू पर अत्याचार बंद किया और सिपाही को उसे अस्पताल में भर्ती कराने का आदेश दिया। मंगरू को अस्पताल ले जाया गया। गौरा भी उसके साथ थी। इलाज के दौरान गौरा एक क्षण के लिए भी मंगरू के सामने से नहीं हटी। चार दिनों के इलाज के बाद मंगरू ने आंखें खोली।

तय शर्त के मुताबिक अब गौरा को मंगरू का साथ छोड़ अंग्रेज के पास जाना था। यह उसे मंजूर नहीं था। ऐसे में उसने मरना बेहतर समझा। अस्पताल के बाहर नदी की धार बह रही थी। गौरा जाकर उसमें कूद पड़ी। आनन-फानन में एक अस्पताल कर्मचारी दौड़ा मंगरू के पास आया और गौरा के नदी में कूदने की सूचना दी। मंगरू की आंखों के सामने अंधेरा छा गया। उसे कुछ समझ नहीं आया। दौड़ कर नदी के सामने पहुंचा और छलांग मार दी। जीते जी जो कभी साथ नहीं रह पाए अब वे दोनों परलोक की यात्रा में साथ जा रहे थे।

कहानी से सीख :

शूद्र कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि व्यक्ति को अपना मन साफ और सच्चा रखना चाहिए। किसी कार्य को करने के पीछे यदि आपकी नियत नेक होती है तो नियति आपके साथ कभी बुरा नहीं करेगी।

लैला | Laila Premchand Story In Hindi

Laila Premchand Story In Hindi

कौन है लैला, वह कहां से आई है, यह सब किसी को मालूम न था। तेहरान की चौक पर एक रोज लोगों ने खूबसूरत सुंदरी को हाथों में डफली लिए गजल गाते और झूमते देखा।

देखते ही देखते पूरे तेहरान में एक खूबसूरत महिला की चर्चा होने लगी। वह कोई और नहीं, बल्कि लैला ही थी। लैला की सुंदरता को लफ्जों में बताने के लिए शायद शब्द भी कम पड़ जाए। उसकी सुंदरता की मात्र कल्पना ही की जा सकती थी।

लैला किसी रंग-बिरंगे फूल से कम न थी। उसकी आवाज बांसुरी की मधुर धुन की तरह थी। जब लैला मस्ती में गाती थी, उस समय पूरा वातावरण खुशनुमा हो जाता था। लैला कविता, गीत-संगीत और सुंदरता की मनोरम मूर्ति सी थी। वह अपने गीतों में आने वाले वक्त का हाल सुनाती थी। कहती थी एक समय आएगा जब युद्ध-संघर्ष का अंत हो जाएगा, देश में प्रेम-संतोष का राज होगा। वह गीतों के जरिए राजा से सवाल भी करती थी और सोई हुई प्रजा को भी जगाती थी। सारा तेहरान उसकी अदा पर फिदा था।

लैला गरीब-कमजोर के लिए आशा के दीपक की तरह, रईसों के लिए मार्गदर्शक, दिलदारों के लिए परी और सत्ताधारियों यानी राज-पाठ संभालने वालों के लिए धर्म का संदेश थी। उसके एक इशारे पर नगर की जनता आग में भी कूद सकती थी। लैला के गुण और उसकी सुंदरता पूरी जनता को आकर्षित कर चुकी थी।

एक समय की बात है, एक बार तेहरान का शहजादा अपने घोड़े पर बैठकर नगर में निकला। इत्तेफाक ऐसा कि लैला उसी वक्त मधुर गीत गुनगुना रही थी। शहजादे ने आवाज सुन घोड़ा रोक दिया। वह स्तब्ध हो गया और काफी देर तक बीच सड़क पर रुक कर गीत सुनता रहा। कुछ देर बाद शहजादा घोड़े से उतरा और रोने लगा। आंखों में आंसू लिए वह उस आवाज की ओर चलने लगा। सामने लैला को देख वह दौड़ा और उसके चरणों पर झुक गया। वहां खड़े आसपास मौजूद लोग पीछे हट गए।

लैला घबराकर बोली, “कौन हो तुम?”

शहजादे ने कहा, “गुलाम हूं तुम्हारा।”

लैला, “आपको मुझसे क्या चाहिए?”

शहजादे ने कहा, “आपकी खिदमत का हुक्म चाहता हूं। मेरे छोटी सी झोपड़ी में अपने कदम रखकर उसे रोशन कर दीजिए।”

लैला, “मेरी आदत में यह सब नहीं है।”

शहजादा दुखी होकर वहीं रुक गया। लैला ने फिर से गाना शुरू किया। उसका गला कांपने लगा, ऐसा लगा मानो जैसे वीणा के तार टूट गए हो। उसने मुड़कर शहजादे को देखा और बोली, “तुम यहां ऐसे मत बैठो।”

वहां मौजूद दर्जनों लोगों ने लैला को बार-बार बताया कि ये तेहरान नगर के शहजादे हैं। इनका नाम नादिर है, लेकिन लैला को इससे तनिक भी फर्क नहीं पड़ा। वह बोली, “बड़ी अच्छी बात है कि ये शहजादे हैं, लेकिन ये यहां क्या करेंगे? उनके पास महल में महफिल है। शान-ओ-शौकत है फिर वे भला यहां क्यों रहेंगे? जिन्हें गम है और जो अपने दिल के दर्द को बयां नहीं कर पाते हैं, मैं उनके लिए गाती हूं, न कि किसी के शौक के लिए।”

शहजादे ने कहा,  “लैला मैं तुम्हारे इस मधुर संगीत पर सब कुछ कुर्बान कर सकता हूं। मैं अब तक शौक का गुलाम था, लेकिन तुम्हारी आवाज ने मुझे दर्द का स्वाद चखा दिया है।”

लैला कुछ बोली नहीं और फिर से गाने लगी। इस बार उसकी जुबान से शब्द नहीं फूटे। उसकी आवाज पर उसका काबू नहीं था, वह रुक गई। वो डफली लेकर वहां से जाने लगी। सभी लोग अपने घर जाने लगे। जैसे ही लैला अपनी झोपड़ी के करीब खड़े पेड़ तक पहुंची तो उसने देखा कि कोई उसके पीछे आ रहा था। वह मुड़ी और बोली, “कौन हो तुम?”

दरअसल लैला का पीछा करते-करते शहजादा नादिर उसके घर तक आ पहुंचा था।

लैला बोली, “क्या तुम नहीं जानते कि मैं अपने आशियाने में किसी व्यक्ति को भी नहीं आने देती हूं?”

शहजादे ने कहा,  “मैं ये जानता हूं।”

लैला बोली, “सब जानते हो फिर किस उम्मीद में यहां तक आए हो?”

इस बार शहजादे ने कुछ नहीं कहा। कुछ देर की चुप्पी के बाद लैला बोली, “कुछ खा-पीकर आए हो या नहीं?”

शहजादे ने कहा, “अब न तो भूख है और न ही प्यास जान पड़ती है।”

लैला बोली,  “चलो, आज आपको गरीब के हाथ का स्वाद चखाऊं।”

शहजादा इनकार नहीं कर पाया। लैला न बाजरे की रोटी परोसी।

इस बार बाजरे की रोटी में भी शहजादे को स्वाद मिला। गरीब झोपड़ी में भी उसे आनंद आ रहा था। वह एक सुकून महसूस कर पा रहा था, जो शायद आज तक उसने कभी नहीं किया था।

शहजादे का खाना खत्म होते ही लैला बोली, “आधी रात हो चुकी है। अब तुम्हें जाना चाहिए।”

शहजादा बेचैन हो गया। उसने जाने से मना कर दिया और कहा,  “अब मैं भी यहीं रहूंगा।”

अब शहजादा लैला का साथी बन गया। जहां-जहां लैला जाती शहजादा उसके साथ जाता था। लैला गाती और वह सुनता था। जब यह खबर बादशाह को लगी तो उन्होंने शहजादे को बहुत समझाया, लेकिन शहजादे ने किसी की एक न सुनी। वहीं दूसरी ओर, अब लैला के आवाज में भी वो पहले वाला जादू न था।

लैला अभी भी गाती, झूमती थी। लोग आते थे, लेकिन पहले वाली बात नहीं थी। जो लैला कभी दूसरों के दिल के दर्द गाती थी, अब वह अपना मन बहलाने के लिए गाने लगी। इस तरह लगभग छह महीने बीत गए।

एक रोज लैला गाने जाने के लिए तैयार नहीं हुई। तो शहजादे ने कहा,  “आज जाना नहीं है क्या?”

लैला बोली, “सच बताना शहजादे, क्या अब भी तुम्हें मेरे गाने पहले जैसे अच्छे लगते हैं?”

शहजादे ने कहा, “मुझे पहले से भी कई गुना ज्यादा मजा आता है।”

लैला झट से बोली, “लेकिन लोगों को अब मजा नहीं आता। अब मैं कभी नहीं गाऊंगी।”

शहजादे ने कहा, “हां इसका मुझे भी ताज्जुब है।”

लैला बोली, “पहले मेरे दिल में सभी के लिए समान जगह थी। पहले मेरी जो आवाज निकलती थी वह सभी के दिलों तक पहुंचती थी, लेकिन अब तुम औरों से अलग हो गए हो। आज से तुम मेरे सब कुछ हो। अब से मैं तुम्हारे साथ चलूंगी। इस झोपड़ी में आग लगा दो।”

फिर पूरे तेहरान में जश्न का माहौल हो गया। घर-घर मिठाइयां बन रही थी। शहजादे और लैला का विवाह हो रहा था। हजारों लोग मस्जिदों में एक साथ नए जोड़े के लिए लंबी उम्र की दुआएं मांग रहे थे। इस मौके पर लैला ने बिल्कुल सादे कपड़े पहन रखे थे। आभूषण का कोई नामोनिशान नहीं था। महिलाएं लैला को दुआएं और मुबारकबाद दे रही थी। जिस पर एक सुर में वहां मौजूद लोग आमीन-आमीन कह रहे थे।

देखते ही देखते कई साल बीत गए। शहजादे नादिर अब नगर के बादशाह बन चुके थे और लैला उनकी मल्लिका। उस दौर से पहले ईरान का राजपाठ कभी इतना अच्छा नहीं था। बादशाह नादिर और मल्लिका लैला दोनों ही अपनी प्रजा को अपने करीब मानते थे और उनका हमेशा भला सोचते थे। नादिर राजसत्ता की वकालत करता तो लैला प्रजा की ओर से दलील देती। जब कभी राज-पाठ से थोड़ा वक्त मिलता तो दोनों एक साथ गाते-बजाते थे।

कभी नादिर लैला की मान जाता, तो कभी लैला नादिर की सुन लेती। यह उनके सुखी वैवाहिक जीवन का उसूल था। उस समय जब बादशाहों और महलों में एक से अधिक बेगमों का बोलबाला हुआ करता था, उस वक्त तेहरान के बादशाह पर लैला का एकमात्र अधिकार था। लैला ने राज-पाठ की सारी कमान अपने हाथों में रख ली थी। अब सारा धन प्रजा के हित में खर्च किया जाता था।

सब बढ़िया था, किंतु प्रजा मन ही मन संतुष्ट नहीं थी। उन्हें ये डर था कि अगर ऐसा ही हाल ज्यादा दिनों तक चला तो वो दिन दूर नहीं कि राजा-प्रजा का भेद खत्म हो जाएगा। लैला और नादिर के लाख समझाने के बावजूद भी दोनों वर्गों का भेद मिटाने का नाम नहीं ले रहा था। लड़ाईयां और विवाद बढ़ते जा रहे थे। सामंत और ऊंचे वर्ग के लोग बादशाह नादिर को मारना चाह रहे थे, जबकि वहां की प्रजा लैला की दुश्मन बनती जा रही थी।

पूरे राज्य में अशांति का वातावरण था। एक रोज रात के समय बादशाह और मल्लिका आरामगाह में थे। शतरंज की बाजी चल रही थी। नादिर ने कहा, ‘लैला अब तुम्हारा प्यादा गया।”

लैला बोली, “ये लो शह। तुम्हारा खेल खत्म।”

नादिर ने कहा, “तुमसे हारने में जो खुशी मिलती है, वह जीत में बिल्कुल नहीं है।”

लैला, “शह बचाइए वरना अब अगली चाल से आपकी हार तय है।”

नादिर ने भौएं चढ़ाकर कहा, “तुमने राजा का अपमान किया है।”

इतने में लैला बोली, “दो बार मैंने आपको छोड़ दिया है। अब आप नहीं बचेंगे।”

नादिर ने कहा, “जब तक मेरे पास मेरा घोड़ा दिलराम है, तब तक मुझे कोई दुख नहीं है।”

लैला, “तो लाइए दिलराम को। हो गई आपकी मात।”

नादिर, “जब मैं तुम्हारे गुणों के सामने अपना दिल हार बैठा, तो अब मेरा प्यादा क्या चीज था। उसका अंत तो होना ही था।”

लैला बोली, “बातें मत बनाइए। आप हारे हैं, इसलिए शर्त के मुताबिक इस पत्र पर अपनी मोहर लगा दीजिए। फरमान में लैला ने यह लिखा था कि आयात कर कम करके आधा कर दिया जाए। शतरंज में हारने पर नादिर ने इस फरमान पर मोहर लगाने का वादा किया था। शर्त के मुताबिक बादशाह ने मुहर लगा दी और इसके साथ ही प्रजा को साल के तकरीबन पांच करोड़ के कर से छुटकारा मिल जाएगा। लैला मन ही मन ये सोचकर खुश हो रही थी कि जब प्रजा को इसकी जानकारी मिलेगी तो वो कितनी खुश होगी और उन्हें दुआएं देंगी।”

तभी अचानक राज-भवन में शोर मचा। अफरा-तफरी का माहौल हो गया। पूछने पर पता लगा कि गुस्साए लोगों की भीड़ आई है और वे राजभवन की दीवार तोड़कर अंदर आने की कोशिश कर रहे हैं। शोर बढ़ता ही जा रहा था। लैला एक कोने में चुपचाप खड़ी थी। नादिर को भी कुछ समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे। अंत में उसने लैला की तरफ देखकर कहा, “मैं सेना को बुलावा भेजता हूं।”

इतने में लैला बोली, “थोड़ा रुकिए। आखिर इन सभी लोगों से एक बार पूछिए तो कि ये चाहते क्या हैं?”

लैला की बात सुनते ही नादिर छत पर चढ़ गया और लैला भी उसके साथ आ पहुंची। दोनों छत पर खड़े थे। भीड़ की नजर उन पर गई। भीड़ चिल्लाई, “वो देखो लैला, छत पर खड़ी है।”

नादिर ने चिल्लाकर कहा, “यह ईरान की बदनसीबी है कि आज ये दिन आया। तुम लोगों ने राजभवन को क्यों इस प्रकार से घेरा है? आखिर क्यों तुमने बगावत की राह चुनी है, बताओ? मैं बादशाह-ए-तेहरान तुम सभी को हुक्म देता हूं इसी वक्त यहां से जाओ वरना यहां खून की नदियां बहा दी जाएगी।”

तभी भीड़ से एक विद्रोही निकला और बोला, “हम तब तक यहां से नहीं जाएंगे जब तक लैला इस महल से नहीं जाएगी।”

गुस्से में तमतमाकर नादिर ने कहा, “अल्लाह से डरो! मल्लिका का इस तरह अपमान करते हो, तुमलोगों को बिल्कुल शर्म नहीं है। लैला जब से मल्लिका बनी है उसने तुम लोगों को कितनी सुविधाएं दी हैं और तुम ऐसी बेअदबी कर रहे हो। कभी महल में आकर देखो कि मल्लिका कैसा जीवन जीती है। लैला वैसा भोजन खाती है जो तुम जानवरों को खिलाते हो। साज-सजावट तो दूर लैला का महल खाली-खंडहर है। लैला मल्लिका होकर भी फकीरों सा जीवन जीती है, दिन-रात प्रजा की सेवा में ही डूबी रहती है और तुम उसके साथ ऐसा बर्ताव कर रहे हो।”

नादिर बोल ही रहे थे कि विद्रोहियों में से किसी ने चिल्लाकर कहा, “मल्लिका हम सबकी दुश्मन है। हम लैला का चेहरा तक नहीं देखना चाहते।” इतने में नादिर ने चिल्लाकर कहा, “खामोश हो जाओ सब।” फरमान दिखाते हुए नादिर ने कहा, “ये देखो लैला ने तुम लोगों के लिए कितना सोचा। तुम लोगों का कर अब आधा हो गया है, फिर भी तुम उसके लिए ऐसी बातें कर रहे हो।”

हजारों लोग एक साथ बोले, “यह तो बहुत पहले ही माफ होना चाहिए था। हम अपनी मल्लिका के रूप में इसे स्वीकार नहीं कर सकते हैं।” बादशाह को समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे। उसे इस हालत में देख लैला बोली, “अगर अल्लाह की यही मर्जी है कि मैं डफली बजाऊं और गाना गाकर गुजर-बसर करूं तो मुझे इस बात का कोई दुख नहीं है। मैं फिर से एक बार अपनी आवाज से जनता का दिल जीत लूंगी।”

नादिर लैला को खोना नहीं चाहते थे। उसने घबराकर मीनार की घंटी बजाई, ताकि सैनिक बाहर मदद के लिए आएं और भीड़ को खाली कराएं, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। नादिर ने फिर दूसरी बार घंटी बजाई। इस बार भी कोई सैनिक बाहर नहीं आया। बादशाह नादिर ने तीसरी बार घंटी बजाई, एक भी सैनिक बाहर नहीं निकला। नादिर ने सिर पर हाथ रख लिया। वह समझ गया कि यह खतरे की घंटी है। अब खराब दिन आ चुके हैं। अब उसे जनता के कहे अनुसार काम करना ही पड़ेगा।

लैला नादिर को अपनी जान से भी ज्यादा प्यारी थी। वह उसका हाथ पकड़े राजभवन के द्वार से बाहर आया। भीड़ दो हिस्सों में बंट गई। नादिर और लैला रात के अंधेरे में तेहरान के रास्तों पर चलने लगे। उन्होंने मस्जिद में पनाह ली, क्योंकि उन दोनों का अब कोई आश्रय नहीं था।

इस तरह दर-दर भटकते-भटकते पूरा साल बीत गया। दोनों ने समरकंद, बुखारा, बगदाद, हलब, काबिरा और अदन इन सारे देशों की खाक छान डाली। लैला की आवाज का जादू एक बार फिर काम आया। उसके गाते ही पूरे शहर में एक अलग ही हलचल सी मच जाती थी। दिनभर वे गाकर लोगों का मनोरंजन करते घूमते-खाते और कहीं रात बिताकर अगले दिन वहां से रवाना हो जाते थे।

प्रजा के बुरे बर्ताव से उनका मन बहुत दुखी था। लैला के मन में ये बात बैठ गई थी कि आप जिनके लिए अपना सबकुछ दे देते हैं, आगे चल कर वही आपका दुश्मन बन जाता है। जिसकी भलाई करो, आने वाले दिनों में वही बुराई करता है। किसी से भी इतना दिल नहीं लगाना चाहिए।

लैला के पास बड़े-बड़े रईसों, बादशाहों का बुलावा आता था, लेकिन लैला किसी के यहां नहीं जाती थी। इधर ईरान में शासन व्यवस्था अनियंत्रित थी। लोगों से तंग होकर रईस-धनवानों ने भी फौज जमा करनी शुरू कर दी थी। तभी राज्य में अकाल पड़ गया। लोग भूखे मरने लगे थे और व्यापार नष्ट होने लगा था।

सारा खजाना खत्म हो रहा था। जनता कमजोर हो रही थी और बड़े लोगों की शक्ति बढ़ती जा रही थी। आखिरकार एक दिन आया जब जनता ने घुटने टेक दिए। प्रजा ने जिन्हें नेता चुना, उन नेताओं को फांसी दे दी गई और राज्य में रईसों का दबदबा हो गया। उन्होंने राज-भवन पर कब्जा कर लिया। अब उन्हें नादिर की भी याद आने लगी। शक्तिशाली रईसों को लगा कि बीते समय में जो हुआ उसके बाद नादिर और लैला का जनता के लिए प्रेम मर गया होगा। अगर वे दोबारा सिंहासन पर बैठे तो भी शक्तिशालियों का ही कहा सुनेंगे। इसी उद्देश्य के साथ वे नादिर और लैला को मनाने के लिए निकल पड़े।

शाम का वक्त था, लैला और नादिर एक पेड़ के नीचे बैठकर आराम कर रहे थे। दोनों एकदम चुपचाप प्रकृति की सुंदरता को निहार रहे थे। तभी उन्हें लगा कि घुड़सवारों का काफिला उनके करीब आ रहा है। नादिर झटके में उठा और देखने लगा। तभी एक घुड़सवार उनके करीब आया और रुक कर सलाम किया। नादिर का चेहरा खिल गया। वह लैला की ओर देख कर चिल्लाया कि यह ईरान का आदमी है। इस बीच वह समझ नहीं पा रहा था कि यह सब क्या चल रहा था।

लैला चिल्लाकर बोली, “सावधान हो जाओ और अपनी तलवार संभाल लो। क्या पता इसकी जरूरत पड़ जाए।”

घुड़सवारों ने एक साथ नादिर को फिर से सलाम किया। इस बार नादिर खुद को रोक नहीं पाया और उन्हें गले से लग लिया। घुड़सवार बोले, “बादशाह देश अपने स्वामी को खोज रहा है, आप हमारे साथ चलिए।”

नादिर ने कहा, “एक बार आप लोगों ने हमारी इज्जत ले ली। इस बार क्या जान लेंगे? मैं यहां बहुत ही आराम से हूं, मुझे परेशान मत करिए।” लोगों ने बार-बार साथ चलने की गुहार लगाई, लेकिन नादिर एक ही रट लगाए था। काफी मिन्नतों के बाद वह साथ जाने के लिए तैयार हो गया। तभी लैला बोली, “तेहरान की प्रजा मुझसे नाराज थी, आपसे नहीं। आप भले ही उन्हें माफी दे सकते हैं, लेकिन मैं नहीं।”

लैला के मुंह से ऐसी बातें सुनकर नादिर हैरान रह गया। उसे समझ नहीं आया कि लैला ऐसा क्यों कह रही है, लेकिन उसने कुछ नहीं कहा। दूतों के साथ वे दोनों तेहरान के लिए चल पड़े। नगर पहुंचते ही शक्तिशाली लोगों ने उनका जोरदार स्वागत किया। जबकि गरीब-कमजोर लोग चीख-पुकार रहे थे। लैला को अब इससे कोई फर्क नहीं पड़ता था।

जिन लोगों की तकलीफ देखकर एक वक्त में लैला का कलेजा फटता था अब उनके जीने-मरने से लैला को कोई मतलब नहीं था। नादिर जब भी प्रजा की भलाई का काम करता लैला उसमें बाधा डाल देती थी। तीन साल इसी तरह बीत गए और प्रजा की स्थिति दिनों-दिन बिगड़ती चली गई।

एक रोज नादिर शिकार पर निकला। शिकार के दौरान वह रास्ता भटक गया और अपने साथियों से बिछड़ गया। वह जंगल में काफी देर भटकता रहा, लेकिन उसे महल लौटने का कोई रास्ता न सूझा। अंत में वह खुदा को याद करते हुए एक रास्ते पर निकल पड़ा। सोचा कि कोई बस्ती या घर दिखे तो रात में आसरा लेकर सुबह महल का रास्ता पूछ, लौट आऊंगा।

मीलों चलने के बाद उसे एक गांव दिखा। जहां मात्र तीन-चार ही घर थे। तभी उसकी नजर वहां मौजूद एक मस्जिद पर पड़ी। बहुत रात हो गई थी, इसलिए बादशाह नादिर ने वहां रात बिताने की सोची। वहां एक फटी चटाई पड़ी थी, नादिर उसी पर सो गया।

अचानक आहट हुई और नादिर चौंक गया। उसने आंखें खोली और एक बूढ़े को सामने पाया। नादिर ने देखा कि वह बूढ़ा व्यक्ति सुबह की नमाज पढ़ रहा था। नादिर इतना थका था कि उसे पता ही नहीं चला कि सुबह हो गई थी।

वह शांत उस बूढ़े व्यक्ति को नमाज पढ़ता देखता रहा। बूढ़े ने नमाज पढ़ने के बाद दुआ मांगी। बूढ़े ने हाथ उठा कर कहा, “ए खुदा! तू गरीबों का मददगार है, बेसहारों का सहारा है। तू इस क्रूर बादशाह का अत्यचार देख रहा है। तू देख रहा है कि कैसे वो एक औरत के इश्क में इतना डूब गया है कि अपनी प्रजा को भूल गया है। खुदा तू उसे अपने पास बुला ले या तो फिर हमें अपने पास बुला ले। ये यातनाएं हमसे और न सही जाएंगी। ईरान अब इस अत्यचार से तंग आ गया है।”

आज से पहले बादशाह नादिर ने अपनी ऐसी आलोचना कभी न सुनी थी। दुआ के लफ्ज सुन कर बादशाह नादिर का खून सूख गया। उसे समझ नहीं आया कि वह क्या करे। नादिर वहीं सोया रहा, वह हिल भी नहीं पाया।

घटना के एक सप्ताह बाद तक नादिर सभा में नहीं आया। साथ ही उसने किसी सेवक से भी मुलाकात नहीं की। कमरे में पड़ा सोचता रहा कि आखिर क्या करूं? लैला से नादिर की ये हालत देखी नहीं जा रही थी। वह कई बार उसके पास जाकर पूछती कि आखिर बात क्या है, क्यों वे इस तरह से बर्ताव कर रहे हैं। नादिर उसकी गोद में सिर रखता और रोने लगता। वह चाह कर भी कुछ बोल नहीं पा रहा था। कई दिनों तक मन ही मन व्याकुल होकर अंत में उसने सोचा, “प्रेम अमर है, मैं और लैला दिल से जुड़े हैं। मुझे इस बादशाहत का लोभ नहीं है। मैं लैला के बिना नहीं जी सकता।”

वह कमरे से निकला और दौड़ते हुए लैला के कमरे में पहुंचा। देर रात हो चुकी थी, लेकिन द्वार खुला था। नादिर को समझ नहीं आया कि इस वक्त लैला कहां जा सकती है, वह डर गया। मन में कई सवाल आने लगे, लेकिन उसने आशा न छोड़ी और पूरा महल छान मारा। लैला कहीं नहीं थी। बादशाह नादिर मायूस हुए लैला के कमरे में लौट आए। हजारों बुरे ख्यालों के बीच नादिर लैला के बिस्तर पर लेट गया कि तभी उसका हाथ तकिए के नीचे रखे कागज के टुकड़े पर पड़ा। नादिर ने पर्ची उठाई, वह लैला का खत था।

नादिर ने पढ़ना शुरू किया। पहली लाइन पढ़ते ही उसकी आंखें छलक उठी। हिम्मत न हुई कि आगे पढ़े, लेकिन उसने खत पढ़ा। लैला ने लिखा था,

“मेरे प्रिय नादिर, मैं तुमसे अब हमेशा के लिए विदा लेती है। तुम्हें मेरी सौगंध है, तुम मुझे ढूंढने की कोशिश मत करना। लैला तुमसे इश्क करती है, वह तुम्हारे प्यार की भूखी है तुम्हारे दौलत की नहीं। बीते हफ्ते से तुमने मुझसे निगाहें फेर रखी है। मेरी तरफ देखते तक नहीं हो। मेरे लिए इस सजा से बड़ी कोई सजा नहीं हो सकती। मैंने अब तक जो किया केवल तुम्हारी भलाई के लिए ही किया था। अब मैं तुम्हारे सामने भी गिर गई हूं। ये पांच साल मुझे हमेशा याद रहेंगे। मैं डफली लेकर आई थी, डफली लेकर ही जा रही हूं। अलविदा!” इतना पढ़ने के बाद नादिर लैला के गम में वहीं खड़ा रोता रह गया।

कहानी से सीख :

लैला कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि दुनिया में प्रेम से बड़ी कोई पूंजी और मानवता से बड़ा कोई धर्म नहीं है। संसार में सच्चा इंसान वही है जो दूसरों की तकलीफ और दुख को महसूस कर सकता है।