03 March 2022

सिंहासन बत्तीसी की 22वीं कहानी - अनुरोधवती पुतली की कथा - the story of the request pupil

Singhasan Battisi Baisvi putli Anurodhvati Story-1

राजाभोज एक बार फिर सिंहासन की ओर बढ़े और तभी 22वीं पुतली अनुरोधवती वहां पर आ गई। उसने राजाभोज से कहा कि मैं तुम्हें राजा विक्रमादित्य की एक कहानी सुनाऊंगी उसके बाद यह फैसला करना कि आप सिंहासन पर बैठने लायक हो या नहीं। इसके बाद 22वीं पुतली ने कहानी सुनाना शुरू किया।

राजा विक्रमादित्य कला प्रेमी थी और अच्छे कलाकारों को सम्मानित करते थे। वह अपने दरबार में मौजूद योग्य लोगों का भी बहुत सम्मान करते थे। उन्हें चापलूसी बिल्कुल भी पसंद नहीं थी। राजा विक्रमादित्य के इस स्वाभाव के बारे में जानकर एक दिन एक युवक उनसे मिलने उनके दरबार पहुंचा। उस युवक को कई शास्त्रों का ज्ञान था और हमेशा खरी बात ही बोलता था। उसका यह स्वाभाव अक्सर राजाओं को पसंद नहीं आता था, जिस कारण उसे हर राजा अपने यहां नौकरी से निकाल देता था। बार-बार नौकरी से निकाले जाने के बाद भी उसने अपनी प्रकृति और व्यवहार को बदला नहीं था। जब वह राजा विक्रमादित्य के दरबार पहुंचा, तो उस समय वहां संगीत का रंगारंग कार्यक्रम चल रहा था। वह राजा के आदेश का इंतजार करने लगा।

वह दरबार के दरवाजे पर खड़ा होकर संगीत सुन रहा था, जिस सुनकर वह धीमी आवाज में बोला, “दरबार में बैठे हुए लोग नासमझ हैं। इन्हें संगीत की बिल्कुल भी समझ नहीं है। साजिंदा गलत धुन बजा रहा है, फिर भी कोई उसे रोक नहीं रहा है।” उसे बोलते हुए वहां खड़े द्वारपाल ने सुन लिया, जिससे उसका चेहरा गुस्से से लाल हो गया। उसने युवक से कहा, “महाराज विक्रमादित्य सच्ची कला के प्रेमी हैं और वह खुद दरबार में मौजूद हैं।” द्वारपाल की बात सुनकर युवक हंसा और बोला, “वह कला प्रेमी हो सकते हैं, लेकिन कला पारखी नहीं, क्योंकि साजिंदे की गलती को वह पकड़ नहीं पा रहे हैं।”

युवक की बात सुनकर द्वारपाल ने कहा कि कि अगर उसकी बात गलत साबित हुई, तो उसे दंड मिलेगा। इस पर युवक ने कहा कि अगर उसकी बात गलत साबित हुई, तो वह हर प्रकार की सजा के लिए तैयार है। इसके बाद द्वारपाल ने युवक के बारे में विस्तार से राजा को बताया। राजा विक्रमादित्य ने तुरंत उस युवक को दरबार में लाने का आदेश दिया। राजा विक्रमादित्य के सामने भी युवक ने कहा कि किसी एक साजिंदे की उंगली पर चोट लगी हुई है, जिस कारण संगीत में कम है। यह सुनकर राजा विक्रमादित्य ने सभी साजिंदों की उंगलियां देखने का आदेश दिया। जांच के दौरान सच में एक वादक के अंगूठे का ऊपरी भाग कटा हुआ मिला। उसने अंगूठे पर पतली खाल चढ़ा रखी थी।

यह देखकर राजा ने उस युवक की बहुत प्रशंसा की। इसके बाद उन्होंने उस युवक से उसका परिचय पूछा और उसे अपने दरबार में नौकर रख लिया। युवक ने भी समय-समय पर अपनी योग्यता का परिचय, जिससे राजा विक्रमादित्य बहुत प्रभावित हुए।

कुछ दिनों के बाद दरबार में एक खूबसूरत नृतिकी आई। दरबार में उसके नृत्य का आयोजन किया गया। वह युवक भी दरबार में बैठा हुआ था और नृत्य को गौर से देख रहा था। वह नृतिकी बहुत ही अच्छा नृत्य कर रही थी और सभी दरबारी मोहित होकर उसके नृत्य को देख रहे थे। तभी न जाने कहां से एक भंवरा आकर उसकी छाती पर बैठ गया। नृतिकी न तो नृत्य रोक सकती थी और न ही हाथों से भंवरे को हटा सकती थी, क्योंकि ऐसा करने से भंगिमाएं बिगड़ जातीं। ऐसे में उस नृतिकी ने चतुराई से सांस अंदर की ओर खींची तथा पूरे जोर से भंवरे पर छोड़ दी। ऐसा करने में भंवरा उड़ गया। हालांकि, यह घटना कोई नहीं देख सका, लेकिन उस युवक ने सब कुछ देख लिया।

वह नृतिकी की तारीफ करते हुए उठा और अपने गले की मोतियों की माला उस नृतिकी के गले में डाल दी। यह देखकर सभी दरबारी हैरान हो गए। दरबार में मौजूद लोग कहने लगे कि राजा के होते हुए दरबार में किसी और का इस तरह से इनाम देना राजा का सबसे बड़ा अपमान है। युवक का यह व्यवहार राजा विक्रमादित्य को भी यह पसंद नहीं आया और उन्होंने युवक से ऐसा करने के पीछे का कारण बताने को कहा। इस पर युवक ने भंवरे वाली सारी घटना राजा को विस्तार से बता दी। उसने कहा कि नृतिकी ने जिस तरह से सुर, लय, ताल और भाव-भंगिमा के बीच सामंजस्य रखते हुए, जिस सफाई से भंवरे को उड़ाया वह इनाम के काबिल है।

जब विक्रमादित्य ने नृतिकी से पूछा, तो उसने युवक की बातों का समर्थन किया। यह सुनकर राजा विक्रमादित्य ने नृतिकी और उस युवक बहुत तारीफ की। अब उनकी नजर में उस युवक का महत्व और बढ़ गया। अब तो जब भी किसी भी समस्या का हल ढूंढना होता, तो राजा विक्रमादित्य उसकी बातों पर जरूर गौर करते।

ऐसे ही एक दिन दरबार में चर्चा शुरू हुई कि बुद्धि और संस्कार के बीच क्या संबंध है। दरबारियों का कहना था कि बुद्धि से ही संस्कार आते हैं, लेकिन वह युवक उनकी बातों से सहमत नहीं था। उसका कहना था कि संस्कार आनुवंशिक होते हैं। जब इस मुद्दे पर एक राय नहीं बनी, तो विक्रमादित्य ने इसका एक हल निकाला।

राजा ने नगर से दूर जंगल में एक महल बनवाया और उसमें गूंगी और बहरी नौकरानियों को रहने का आदेश दिया। साथ ही चार नवजात शिशुओं को उन नौकरानियों की देखरेख में रखा गया। इनमें से एक शिशु राजा विक्रमादित्य का था, जबकि एक महामंत्री का, एक कोतवाल का और एक ब्राह्मण का था। जब 12 वर्ष के बाद चारों बच्चे दरबार में पेश किए गए, तो राजा विक्रमादित्य ने बारी-बारी से उनसे पूछा, “क्या तुम ठीक है?” चारों ने अलग-अलग जवाब दिए।

राजा के बेटे ने कहा सब कुशल है, वहीं महामंत्री के बेटे ने कहा कि यह संसार नश्वर है। जब आने वाले को जाना है, तो कुशलता कैसी। कोतवाल के बेटे ने कहा कि चोर चोरी करते हैं और नाम खराब निरपराधी का होता है। ऐसी हालत में कुशलता की सोचना बेकार है। अंत में ब्राह्मण के बेटे ने कहा कि जब आयु दिन-ब-दिन घटती जाती है, तो कुशलता कैसी।

चारों के जवाब सुनकर उस युवक की बातों की सच्चाई सामने आ गई। राजा का बेटा निश्चित भाव से सबकुछ कुशल मानता था और मंत्री के बेटे ने तर्कपूर्ण उत्तर दिया। इसी तरह कोतवाल के बेटे ने न्याय व्यवस्था की चर्चा की, जबकि ब्राह्मण के बेटे ने दार्शनिक उत्तर दिया। ये सबकुछ आनुवंशिक संस्कारों के कारण हुआ, जबकि सभी का पालन-पोषण एकसाथ और एक तरह से हुआ। फिर भी चारों के विचारों में अपने संस्कारों की तरह अंतर था। इस प्रकार सभी दरबारियों ने मान लिया कि युवक बिल्कुल सही है।

इतना कहकर 22वीं पुतली वहां से उड़ गई और राजा भोज एक बार फिर इस सोच में पड़ गए कि क्या राजा विक्रमादित्य की तरह वह भी सच्चे और अच्छे लोगों की परख करने के काबिल हैं या नहीं।

कहानी से सीख:

बच्चों, इस कहानी से सीख मिलती है कि जो व्यक्ति हमेशा सच बोलता है और गलत का साथ नहीं देता है, उसका हमेशा समर्थन करना चाहिए। ऐसे लोग कभी भी गलत सलाह नहीं देते हैं और हमेशा सही राह दिखाते हैं।

सिंहासन बत्तीसी की अठारहवीं कहानी - तारामती पुतली की कथा - Tale of Taramati Putli

Singhasan Battisi Eighteenth Putli Taramati Story In Hindi

18वीं बार फिर राजा भोज सिंहासन पर बैठने के लिए आगे बढ़ें। उन्होंने सोचा कि इस बार चाहे कुछ भी हो जाए, वो सिंहासन पर बैठकर ही रहेंगे। तभी सिंहासन से 18वीं पुतली तारामती बाहर निकली और राजा भोज को रोकते हुए बोली, “सिंहासन पर बैठने से पहले राजा विक्रमादित्य का यह किस्सा सुनिए।” उसके बाद पुतली तारामती ने कहानी सुनाना शुरू किया।

राजा विक्रमादित्य कलाकारों और विद्वानों का खूब सम्मान किया करते थे। उनके दरबार में कई महान कलाकार थे। अन्य राज्यों से भी योग्य कलाकार उनके दरबार आते-जाते रहते थे। एक दिन राजा विक्रमादित्य के दरबार में दक्षिण भारत से एक विद्वान पहुंचे। उनका मानना था कि किसी को धोखा देना सबसे बुरा और गिरा हुआ काम होता है। अपनी बात सही साबित करने के लिए उस विद्वान ने राजा विक्रमादित्य को एक कहानी सुनाई।

उस विद्वान ने कहा कि सालों पहले आर्यावर्त राज्य में एक राजा राज करता था। उसका भरा-पूरा और सुखी परिवार था। उस राजा ने सत्तर साल की उम्र में एक लड़की से शादी कर ली। वो नई रानी की खूबसूरती से इतना आकर्षित था कि उससे एक पल भी अलग नहीं होता था। राजा चाहता था कि हर वक्त रानी का चेहरा उसके सामने रहे। यहां तक कि राज दरबार में भी वो अपने बगल में नई रानी को बैठाने लगा।

नई रानी को बगल में बैठा देख कई लोग राजा के पीठ पीछे उनका मजाक बनाने लगे। राजा के महामंत्री को इस बात का बहुत बुरा लगता। एक दिन अकेले में महामंत्री ने राजा को इस बात की जानकारी दी। उसने राजा को कहा कि अगर वो हर पल रानी को अपने सामने देखना चाहते हैं, तो उनकी एक सुंदर तस्वीर बनवाकर राज दरबार में सिंहासन के सामने लगवा लें। जैसे कि राज दरबार में राजा के अकेले बैठने की ही परंपरा सालों से चली आ रही है। ऐसे में रानी को राज दरबार ले जाना उन्हें शोभा नहीं देता है।

महामंत्री राजा का खास था, इसलिए राजा ने उसकी बात को गंभीरता से लेते हुए अच्छे चित्रकार से रानी की तस्वीर बनाने को कहा। चित्रकार ने भी राजा का आदेश मिलने के बाद जल्दी रानी की तस्वीर बनाई और उसे राज दरबार लेकर चला गया। राज दरबार में जब लोगों ने रानी का चित्र देखा, तो हर कोई चित्रकार की तारीफ करने लगा। उस चित्रकार ने रानी की तस्वीर ऐसी बनाई थी कि वो तस्वीर एकदम असली लगती थी। राजा को भी रानी की तस्वीर बहुत पसंद आई।

तस्वीर को निहारते हुए राजा की नजर चित्र में रानी की जंघा पर गई। उस जगह पर चित्रकार ने एक तिल बनाया था। राजा को इस बात पर काफी गुस्सा आया। उन्हें लगा कि चित्रकार ने जांघों में तिल कैसे बना दिया। यह सोचकर राजा को बहुत गुस्सा आया और उसने चित्रकार से इसको लेकर सवाल पूछा। जवाब देते हुए चित्रकार ने कहा कि प्रकृति से उसे ऐसा गुण मिला है कि वो छिपी हुई बातें भी जान सकता है। इसी गुण की वजह से उसने यह तिल बनाया। साथ ही तिल से तस्वीर की सुंदरता भी बढ़ती है, इसलिए उसने तिल बनाया है।

राजा को उसकी बात पर भरोसा नहीं हुआ। उसने बिना देर किए जल्लादों को बुलाया और चित्रकार को जंगल ले जाकर मारने का आदेश दे दिया। साथ ही उसकी आंखें निकालकर राजमहल लाने को भी कहा। भले ही राजा को चित्रकार की बात पर भरोसा नहीं था, लेकिन महामंत्री को चित्रकार की विश्वास था। ऐसे में जंगल ले जाने के बाद मंत्री ने जल्लादों को धन का लालच देकर चित्रकार को रिहा करवा दिया। साथ ही उन्हें यह सुझाव दिया कि सबूत के तौर पर वो किसी हिरण की आंखें ले जाकर राजा को दे दें। इसी बीच महामंत्री चित्रकार को अपने घर ले आया और वो रूप बदलकर महामंत्री के घर में रहने लगा।

इतना सब होने के कुछ दिनों बाद राजा का बेटा शिकार करने के लिए जंगल गया। तभी उसके पीछे एक शेर पड़ गया। राजकुमार अपनी जान बचाने के लिए एक पेड़ पर जा चढ़ा। पेड़ पर वह बैठा ही था कि उसकी नजर वहां पहले से ही बैठे भालू पर पड़ी। राजकुमार और डर गया। उसको डरा हुआ देखकर भालू ने कहा, “ तुम डरो मत, मैं भी तुम्हारी तरह ही पेड़ पर शेर को देखकर चढ़ा हूं।” इसी बीच भूखा शेर उसी पेड़ के नीचे उन दोनों पर नजरें जमाकर बैठ गया। काफी देर तक पेड़ पर बैठे-बैठे राजकुमार को नींद आने लगी।

यह देखकर भालू ने राजकुमार को अपनी तरफ आने का इशारा किया और कहा कि वो थोड़ी देर उसका सहारा लेकर सो सकता है। भालू ने राजकुमार से कहा कि जबतक तुम सोओगे मैं तुम्हारी रखवाली करूंगा। फिर तुम जागने के बाद मेरी रखवाली करना और मैं सो जाऊंगा।”

राजकुमार ने भालू की बात मान ली और वो सो गया। इसी बीच शेर ने भालू को फुसलाते हुए कहा कि वो और भालू जंगल के जानवर हैं और उन दोनों को एक दूसरे का साथ देना चाहिए। मनुष्य कभी जंगल के जानवर के दोस्त नहीं हो सकते हैं। यह सब कहते हुए शेर ने राजकुमार को नीचे गिरा देने की बात कही, लेकिन भालू ने शेर की बात नहीं मानी और कहा कि वो राजकुमार के साथ धोखा नहीं कर सकता है।

शेर दुखी होकर चुपचाप वहीं बैठा रहा। इतने में कुछ घंटों की नींद पूरी करके राजकुमार उठ गया। उसके उठने के बाद अब भालू की सोने की बारी आई। जैसे ही भालू सोया, तो शेर ने राजकुमार को बहलाने-फुसलाने की कोशिश की। उसने राजकुमार से कहा कि वो भालू को नीचे गिरा दे, तो शेर उसे खाकर अपनी भूख मिटा लेगा और राजकुमार आराम से राजमहल लौट सकेगा।

राजकुमार शेर की बातों में आ गया और भालू को पेड़ से गिराने की कोशिश करने लगा। इसी बीच भालू की नींद खुल गई और भालू ने राजकुमार को विश्वासघाती बोलकर खूब खरी-खोटी सुनाई। राजकुमार को मन ही मन बहुत बुरा लगा। तभी उसकी आवाज चली गई और वो गूंगा हो गया।

इसी बीच शेर थक-हारकर जंगल की ओर अन्य शिकार ढूंढ़ने के लिए वहां से चला गया। फिर राजकुमार वापस अपने महल पहुंचा। उसकी आवाज जाने की वजह से वो कुछ नहीं बोल पा रहा था। राजकुमार की आवाज जाने से हर कोई परेशान हो गया। बड़े-बड़े ऋषि-मुनि और वैद्य राजकुमार को देखने के लिए आएं, लेकिन राजकुमार की इस अवस्था का वो पता नहीं लगा पाएं।

इतने में महामंत्री अपने घर में छुपे उस चित्रकार को चिकित्सक बनाकर वहां ले आएं। चिकित्सक बने चित्रकार ने राजकुमार के चेहरे के हाव-भाव से सारी बात जान ली। उसने इशारों-इशारों में राजकुमार से पूछा कि क्या मन ही मन वो खुद को दोषी समझकर अपनी आवाज खो बैठा है?

इशारों में राजकुमार उसकी बात समझ गया और फिर फूट-फूट कर रोने लगा। रोती ही उसकी आवाज वापस आ गई। राजा बहुत हैरान हो गए और उन्होंने सोचा कि यह चिकित्सक राजकुमार का चेहरे देखकर सारी कैसे जान सकता है। तब उस चित्रकार ने कहा कि जैसे एक चित्रकार ने रानी का तिल देख लिया था, वैसे ही मैंने आपके बेटे का चेहरा देखकर ही सब कुछ जान लिया।

यह सुनते ही राजा को समझ आ गया कि वो कोई चिकित्सक नहीं, बल्कि कलाकार है। राजा ने चित्रकार से अपनी गलती की माफी मांगी और उसे कुछ उपहार देकर सम्मानित किया।

इतनी कहानी राजा विक्रमादित्य को सुनाकर विद्वान चुप हो गया। राजा विक्रमादित्य इस कहानी को सुनकर बहुत खुश हुए और उनकी बात मान ली कि धोखा देना सबसे बुरा काम है। इसके बाद राजा ने विद्वान को एक लाख सोने के सिक्कों से सम्मानित किया।

इतना कहते ही अठारहवीं पुतली तारामती ने कहा कि अगर तुम में भी दूसरों की बातों से सहमत होने और दूसरों की बातों का सम्मान करने का गुण है, तो तुम इस सिंहासन पर बैठ सकते हो। इतना कहकर अठारहवीं पुतली तारामती सिंहासन से उड़ गई और राजा भोज एक बार फिर सिंहासन पर बैठते-बैठते रह गए।

कहानी से सीख –

किसी के साथ कभी धोखा नहीं करना चाहिए। विश्वासघात का अंजाम बहुत बुरा होता है

सिंहासन बत्तीसी की सोलहवीं कहानी - सत्यवती पुतली की कथा - Story of Satyavati Putli

Singhasan Battisi Solahvi putli Satyavati Story

राजा भोज दोबारा सिंहासन पर बैठने के लिए आगे बढ़े। तभी 16वीं पुतली सत्यवती सिंहासन से बाहर आई और राजा भोज को गद्दी पर बैठने से रोकते हुए कहा, “ हे राजन, मैं आपको राजा विक्रमादित्य का एक किस्सा सुनाऊंगी। अगर आपको लगता है कि आप भी उतने ही महान हैं, तो इस सिंहासन पर बैठ जाना।” इतना कहकर 16वीं पुलती सत्यवती ने कहानी सुनाना शुरू किया।

उज्जैन शहर में राजा विक्रमादित्य के शासन काल में उनके न्याय और महानता की चर्चा दूर-दूर तक थी। राजा ने अपने बड़े- बड़े फैसलों और सुझावों के लिए 9 लोगों की समिति बना रखी थी। इन लोगों से ही राजा विक्रमादित्य राज-काज संबंधित सुझाव भी लेते थे। एक बार धन-संपत्ति को लेकर कुछ बात शुरू हुई। तभी पाताल लोक की बात भी सामने आई और एक जानकार ने पाताल लोक के राजा शेषनाग की तारीफ की। उन्होंने बताया कि उनके लोक में सारी सुख-सुविधाएं हैं, क्योंकि वो भगवान विष्णु के खास सेवकों में से एक हैं। शेषनाग का स्थान भगवान के बराबर माना गया है और जो भी उनके दर्शन करता है उसका जीवन धन्य हो जाता है।

इतना सुनते ही राजा विक्रमादित्य ने पाताल लोक जाकर उनसे मिलने का मन बना लिया। तभी राजा विक्रमादित्य ने अपने बेतालों को याद किया और उनके साथ पाताल लोक पहुंच गए। वहां उन्होंने जानकारों की कही सारी बातों को सही पाया। जब शेषनाग को राजा विक्रमादित्य के आने की खबर मिली, तो वो उनसे मिलने पहुंच गए। राजा विक्रमादित्य ने शेषनाग को नमस्ते करते हुए अपना नाम और पाताल लोक आने का कारण बताया। राजा विक्रमादित्य की बातें सुनकर और उनके व्यवहार से शेषनाग इतने खुश हुए कि राजा विक्रमादित्य को जाते-जाते उपहार के तौर पर चार चमत्कारी रत्न दिए।

चारों रत्न की अपनी-अपनी खूबी थी। पहले रत्न से मनचाहा धन, दूसरे रत्न से मनचाहे कपड़े व गहने, तीसरे रत्न से किसी भी तरह की पालकी, घोड़ा या रथ और चौथे रत्न से मान-सम्मान मिल सकता था। रत्न मिलने के बाद राजा विक्रमादित्य ने शेषनाग को प्रणाम किया और अपने बेतालों के साथ राज्य लौट गए।

चारों रत्न लेकर राजा विक्रमादित्य अपने राज्य में प्रवेश कर ही रहे थे कि रास्ते में उनकी मुलाकात एक ब्राह्मण से हुई। ब्राह्मण ने राजा से पाताल लोक की यात्रा के बारे में पूछा। राजा ने वहां हुई सारी बातें बता दी। सब कुछ जानने के बाद अचानक ब्राह्मण ने राजा से कहा कि आपकी हर सफलता में प्रजा का भी सहयोग होता है। ब्राह्मण की इस बात को सुनते ही राजा विक्रमादित्य उनके मन की बात को समझ गए और तुरंत उन्होंने ब्राह्मण को अपनी इच्छा से एक रत्न लेने को कहा। यह देखकर ब्राह्मण थोड़ी उलझन में पड़ गए और उन्होंने कहा कि वो अपने परिवार के हर सदस्य की राय लेने के बाद ही रत्न लेंगे। राजा विक्रमादित्य उनकी बात मान गए।

फिर ब्राह्मण अपने घर पहुंचे और अपने परिवार में पत्नी, बेटे और बेटी को सारी बात बताई। तीनों ने ही तीन अलग-अलग रत्न लेने की इच्छा जताई। ब्राह्मण की उलझन अब और बढ़ गई थी। परिवार वालों की बात सुनकर ब्राह्मण दोबारा राजा विक्रमादित्य के पास पहुंचे और उन्हें अपनी दुविधा बताई। ब्राह्मण की बात सुनते ही राजा विक्रमादित्य ने हंसते हुए ब्राह्मण को चारों रत्न उपहार के रूप में दे दिए।

इतना कहते ही 16वीं पुतली सत्यवती ने कहा, “क्या तुम भी इतने दानी हो? अगर तुम्हारा दिल भी राजा विक्रमादित्य जितना बड़ा है, तो सिंहासन पर बैठ जाओ। अगर यह गुण तुम में नहीं है, तो इस सिंहासन पर बैठने के लायक बनकर आओ।” इतना कहकर 16वीं पुतली सिंहासन से उड़ गई और एक बार फिर राजा भोज सिंहासन पर नहीं बैठ पाए।

कहानी से सीख:

सच्चा राजा, राजनेता या संचालक वही होता है, जो धन-दौलत का लालच न करते हुए अपनी प्रजा और अपने साथ कार्य करने वालों को प्राथमिकता दे।

सिंहासन बत्तीसी की सत्रहवीं कहानी - विद्यावती पुतली की कथा - Story of Vidyavati Putli
Singhasan Battisi Satrahvi putli Vidyavati Story

राजा भोज एक बार फिर सिंहासन पर बैठने की इच्छा लेकर राजमहल पहुंचे। इस बार सिंहासन से 17वीं पुतली विद्यावती बाहर निकली और राजा भोज को सिंहासन पर बैठने से रोक दिया। 17वीं पुतली विद्यावती ने कहा, “सिंहासन पर बैठने से पहले राजा विक्रमादित्य की यह कहानी सुन लो।” इतना कहकर 17वीं पुतली ने विक्रमादित्य का किस्सा सुनाना शुरू किया।

राजा विक्रमादित्य के राज्य में उनकी प्रजा को किसी बात की कमी नहीं थी। राजा अपनी प्रजा को खूब खुश रखते थे, जब भी उनके दरबार में कोई अपनी परेशानी लेकर आता, तो राजा उसे तुरंत हल कर देते थे। अगर उनकी प्रजा को कोई तंग करता था, तो उसे वो कठोर सजा देते थे। इतना ही नहीं राजा विक्रमादित्य एक आदमी बनकर राज्य का दौरा भी करते थे, इसलिए उनकी प्रजा हमेशा खुश, निडर और संतुष्ट रहती थी।

एक बार राजा विक्रमादित्य वेश बदलकर अपने राज्य में घूम रहे थे। तभी उन्हें एक झोपड़ी से दो लोगों की आवाज सुनाई दी। उन्होंने सुना कि एक महिला राजा को जाकर कुछ बताने को कह रही थी, लेकिन वो व्यक्ति कह रहा था कि वो अपने स्वार्थ के लिए राजा की जान खतरे में नहीं डाल सकता है।

इन बातों को सुनते ही राजा समझ गए कि उन्हें कोई समस्या है और राजा भी इससे जुड़े हुए हैं। राजा विक्रमादित्य हमेशा अपनी प्रजा की परेशानियों को हल करना अपना कर्तव्य मानते थे। ऐसे में राजा विक्रमादित्य से रहा नहीं गया और उन्होंने झोपड़ी का दरवाजा खटखटाया। दरवाजे पर आवाज सुनकर ब्राह्मण दंपत्ति ने दरवाजा खोला। उनके दरवाजा खोलते ही राजा विक्रमादित्य ने अपने बारे में बताया और उनकी परेशानी पूछी।

राजा घर आए हैं जानते ही, दोनों पति-पत्नी डर गए। राजा ने उन्हें हिम्मत और भरोसा दिलाते हुए कहा कि आप अपनी बात बिना डरे कह सकते हैं। तब उन्होंने बताया कि उनकी शादी को बारह साल हो गए हैं, लेकिन उन्हें कोई बच्चा नहीं हुआ।

इन बारह सालों में उन्होंने संतान सुख के लिए कई व्रत-उपवास, पूजा-पाठ किए, लेकिन कोई लाभ नहीं हुआ। फिर एक दिन ब्राह्मण की पत्नी ने सपना देखा कि एक देवी ने उन्हें कहा है कि तीस कोस दूर पूर्व दिशा में एक घने जंगल में कुछ साधु-संन्यासी शिव की आराधना करते हुए भगवान शिव को खुश करने के लिए वो हवन कुंड में अपने अंगों को काटकर डाल रहे हैं। उनकी तरह ही अगर राजा विक्रमादित्य भी वहां जाकर हवन कुंड में अपने अंग काटकर डाल दे, तो भगवान शिव उनसे खुश होकर उनकी इच्छा पूछेंगे। फिर राजा विक्रमादित्य भगवान शिव से उनके लिए बच्चे की मांग करेंगे। ऐसा करने से उन्हें संतान सुख मिल जाएगा।

इतना सुनते ही राजा विक्रमादित्य ने ब्राह्मण पति-पत्नी को भरोसा दिलाते हुए कहा कि वो ये सब जरूर करेंगे। इतना कहते ही राजा विक्रमादित्य वहां से निकल गए और रास्ते में बेतालों को याद किया। बेताल उनके सामने प्रकट हुए, तो राजा विक्रमादित्य ने उन्हें हवन की जगह पहुंचाने को कहा। राजा जैसे ही उस जगह पहुंचे, तो उन्होंने पाया कि वहां सच में कुछ साधु बैठकर हवन करते हुए अपने अंगों को काटकर हवन में डाल रहा था।

ये देखते ही राजा विक्रमादित्य भी वहां संन्यासी के बगल में बैठकर उनकी तरह ही अपने अंगों को काटकर हवन कुंड में डालने लगे। जब राजा विक्रमादित्य और साधु सारे जल गए, तो वहां एक शिवगण पहुंचा और सभी साधुओं को अमृत देकर जिंदा कर दिया, लेकिन गलती से उसने राजा विक्रमादित्य को अमृत नहीं दिया।

जब सारे साधु जिंदा हो गए, तो उनका ध्यान विक्रम पर गया, जो राख बन चुके थे। फिर सभी संन्यासियों ने मिलकर शिव की पूजा की और विक्रम को जिंदा करने की प्रार्थना की। भगवान शिव ने उनकी प्रार्थना सुन ली और राजा विक्रमादित्य को अमृत डालकर जिंदा कर दिया।

राजा विक्रमादित्य जैसे ही जीवित हुए, तो उन्होंने भगवान शिव के सामने हाथ जोड़कर और सिर झुकाकर ब्राह्मण दंपत्ति के लिए संतान मांगी। भगवान शिव, राजा विक्रमादित्य के त्याग से खुश हुए और उनकी प्रार्थना सुन ली। इसके कुछ वक्त बाद ही ब्राह्मण दंपत्ति को संतान सुख प्राप्त हुआ।

ये कहानी सुनाते ही 17वीं पुतली विद्यावती ने राजा भोज से कहा, “क्या तुम में भी है ऐसी हिम्मत और त्याग की भावना? अगर हां, तो तुम इस सिंहासन के योग्य हो।” इतना कहने के बाद 17वीं पुतली विद्यावती उस सिंहासन से उड़ गई।

कहानी से सीख :

अगर कोई बिना किसी स्वार्थ के त्याग करता है, तो उसका कभी कुछ बुरा नहीं होता।


सिंहासन बत्तीसी की 28वीं कहानी - वैदेही पुतली की कथा - Story of Vaidehi Putli

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लगातार 27 पुतलियों से राजा विक्रमादित्य की महानता की कहानी सुनकर परेशान हो चुके राजा भोज ने एक बार फिर सिंहासन पर बैठने की कोशिश की। वह जैसे ही सिंहासन पर बैठने गए, तभी 28वीं पुतली वैदेही ने उन्हें रोका और राजा विक्रमादित्य की स्वर्ग यात्रा और इस दौरान उनके द्वारा किए गए पुण्य कार्यों का किस्सा बताना शुरू किया।

एक रात महाराज विक्रमादित्य अपने महल में सोए रहे थे। इस दौरान उन्होंने सपने में एक सोने का महल देखा। महल की सजावट व आसपास का नजारा बहुत ही खूबसूरत था। सपने में ही महल के बाहर उन्हें एक योगी दिखा जिसका चेहरा हूबहू उनके जैसा ही था। यह देखते ही अचानक उनकी नींद टूट गई। वह समझ गए कि वह एक सपना देख रहे थे, लेकिन जागने के बाद भी उन्हें पूरा सपना अच्छी तरह से याद था। उन्होंने अपने पंडितों व ज्योतिषियों को अपना सपना सुनाया और इसका मतलब जानने के लिए उनसे कहा।

सभी विद्वानों ने राजा विक्रमादित्य से कहा, “महाराज आपने सपने में स्वर्ग के दर्शन किए हैं और वह महल देवराज इंद्र का है। देवताओं ने शायद आपको सशरीर स्वर्ग आने का निमंत्रण दिया है।”

अपने विद्वानों की यह बात सुनकर विक्रमादित्य आश्चर्यचकित हुए। उन्होंने पंडितों से पूछा, “स्वर्ग जाने का रास्ता कौन-सा है और इस यात्रा में किस-किस चीज की जरूरत पड़ सकती है।” काफी सोचने के बाद सभी विद्वानों ने उन्हें वह मार्ग बताया जहां से स्वर्ग में प्रवेश किया जा सकता है। इसके साथ ही उन्हें यह भी कहा कि जो हमेशा भगवान को याद करता है और धर्म का पालन करता है, वही स्वर्ग जा सकता है।

इस पर राजा ने कहा कि काम करते हुए कभी न कभी उनसे अनजाने में कोई गलत काम जरूर हुआ होगा। साथ ही कई बार राज काज के कारण भगवान की पूजा करना भी छूट जाता है। इस पर सभी ने एकमत होकर कहा, “ महाराज, अगर आप इस काबिल नहीं होते, तो आपको स्वर्ग के दर्शन ही नहीं होते।”

सभी के कहने पर राजा विक्रमादित्य राजपुरोहित को अपने साथ लेकर स्वर्ग जाने के लिए निकल पड़ते हैं। अपने विद्वानों के कहे अनुसार उन्हें इस यात्रा के दौरान 2 पुण्यकर्म भी करने थे। यात्रा से पहले राजा ने अपना शाही भेष त्याग दिया था। वह आम लोगों की तरह कपड़े पहन कर यात्रा कर रहे थे। यात्रा के दौरान रात में वह एक नगर में आराम करने के लिए रुक गए। कुछ देर बाद उन्हें एक बुजुर्ग महिला रोती दिखी। वह काफी परेशान थी। राजा विक्रमादित्य ने उस बुजुर्ग महिला से रोने का कारण पूछा। बुजुर्ग महिला ने बताया, “मेरा इकलौता बेटा सुबह जंगल गया था, लेकिन अभी तक लौटा नहीं है। राजा विक्रमादित्य ने उससे पूछा, “आपका बेटा जंगल किस काम से गया है?” बुढ़िया ने बताया, “मेरा बेटा रोज सुबह जंगल से सूखी लकड़ियां लाता है और शहर में बेचता है। इसी से परिवार का गुजारा होता है।”

राजा ने बुढ़िया से कहा, “चिंता मत करो आपका बेटा आ जाएगा।” इस पर बूढ़ी औरत ने कहा, “जंगल बहुत घना है और वहां कई खतरनाक जानवर हैं। मुझे डर है कि कहीं किसी जानवर ने उसे अपना शिकार न बना लिया हो।” बुढ़िया ने आगे कहा, “शाम से मैं कई लोगों से विनती कर चुकी हूं, लेकिन कोई भी मदद नहीं कर रहा। मैं बूढ़ी हो चुकी हूं, इसलिए खुद जंगल जाकर उसे ढूंढ नहीं कर सकती।” यह सुनकर विक्रमादित्य ने कहा कि वह उनके बेटे को ढूंढकर लाएंगे।
इसके बाद राजा विक्रमादित्य लड़के की खोज में जंगल चल दिए। जंगल में उन्हें एक नौजवान युवक कुल्हाड़ी लेकर पेड़ पर दुबका बैठा मिला और उस पेड़ के नीचे एक शेर घात लगाए बैठा दिखा। विक्रम ने कोई रास्ता निकालते हुए शेर को वहां से भगा दिया और उस युवक को अपने साथ लेकर बुढ़िया के पास लौट आए। बुढ़िया बेटे को देखकर बहुत खुश हुई और विक्रम को ढेरों आशीर्वाद मिले। इस तरह बुढ़िया को चिंतामुक्त करके राजा ने एक पुण्य का काम किया।

रात को आराम के बाद उन्होंने अगली सुबह फिर से अपनी यात्रा शुरू की। चलते-चलते वह समुद्र के किनारे पहुंच गए। वहां उन्होंने एक महिला को रोते हुए देखा। जब वह उसके पास गए, तो देखा कि समुद्र के किनारे पर एक जहाज खड़ा है और कुछ लोग उस पर सामान लाद रहे हैं। जब उन्होंने महिला से रोने का कारण पूछा, तो उसने बताया, “कुछ महीने पहले ही मेरी शादी हुई है और अब में गर्भवती हूं। मेरे पति इसी जहाज पर काम करते हैं और आज जहाज दूर किसी देश जा रहा है।”

यह सुनकर राजा विक्रम ने कहा, “इसमें परेशानी की क्या बात है, कुछ ही समय बाद तुम्हारा पति लौट आएगा।” इस पर उसने अपनी चिंता का कारण कुछ और बताया। उसने कहा, “कल मैंने सपने में सामान से लदे एक जहाज को समुद्र के बीच भयानक तूफान में घिरते देखा है। तूफान इतना तेज था कि जहाज टूटकर समुद्र में डूब गया और उस पर सवार सभी लोग मर गए।” उस महिला ने आगे कहा, “अगर यह सपना सच हुआ, तो मेरा क्या होगा और मेरे होने वाले बच्चे की देखभाल कैसे होगी।”

राजा विक्रमादित्य को यह बात सुनकर दया आ गई। उन्होंने समुद्र देवता द्वारा दिए गए शंख को महिला को दिया और कहा, “यह अपने पति को दो और उससे कहो कि जब भी तूफान या कोई अन्य प्राकृतिक आपदा आए, तो इस शंक को फूंक दे, इससे सारी मुसीबत खत्म हो जाएगी।”

उस औरत को विक्रमादित्य की बात पर विश्वास नहीं हुआ और वह शक की नजर से उन्हें देखने लगी। राजा विक्रमादित्य ने महिला की शंका को भांप लिया और तुरंत शंख में एक फूंक मारी, जिसके बाद देखते ही देखते वह जहाज और उस पर तैनात सभी लोग कोसों दूर चले गए। अब दूर-दूर तक सिर्फ समुद्र नजर आ रहा था। वह औरत और वहां खड़े अन्य लोग यह देखकर हैरान हुए। इसके बाद महाराज ने फिर से शंख फूंका, तो वह जहाज सभी कर्मचारियों सहित वापस आ गया। अब उस औरत को शंख की शक्ति पर विश्वास हो गया था। उसने राजा से वह शंख लेकर धन्यवाद कहा।

राजा विक्रमादित्य उस औरत को शंख देकर अपनी यात्रा पर आगे बढ़ गए। कुछ देर चलने के बाद आकाश में काले बादल मंडराने लगे और बादल जोर-जोर से गरजने लगे। इसी बीच उन्हें एक सफेद घोड़ा वहां आता दिखा। जब वह घोड़ा उनके पास पहुंचा, तो एक आकाशवाणी हुई –

“हे महाराज विक्रमादित्य, इस धरती पर तुम्हारे जैसा पुण्यात्मा और कोई नहीं हुआ। स्वर्ग आने की इस यात्रा में तुमने दो पुण्य कार्य किए हैं। इसलिए, तुम्हें लेने के लिए एक घोड़ा भेजा जा रहा है, जो तुम्हें इंद्र के महल तक पहुंचा देगा।”

यह सुन विक्रमादित्य ने कहा, “मैं अपने राजपुरोहित के साथ स्वर्ग की यात्रा पर निकला हूं। इसलिए, स्वर्ग जाने के लिए उनके लिए भी व्यवस्था की जाए।”

यह सुनकर राजपुरोहित ने कहा, “राजन मुझे माफ करें। मेरी सशरीर स्वर्ग जाने की इच्छा नहीं है। अगर भगवान ने चाहा, तो मरने के बाद स्वर्ग आऊंगा और खुद को धन्य समझूंगा।” इसके बाद राजा विक्रमादित्य राजपुरोहित से विदा लेकर घोड़े पर बैठ गए। कुछ ही देर में घोड़ा आकाश में दौड़ने लगा। दौड़ते-दौड़ते इंद्रपुरी पहुंच गया। इंद्रपुरी पहुंचते ही राजा को वही सपनों वाला महल दिखा। चलते-चलते वह इंद्रसभा में पहुंच गए, जहां सभी देवता अपने-अपने स्थान पर बैठे थे। अपसराएं नृत्य कर रही थीं। इंद्र देव पत्नी के साथ सिंहासन पर बैठे थे। राजा विक्रमादित्य को सशरीर स्वर्ग में देखकर सभी हैरान हो गए।

इंद्र उन्हें देखकर सिंहासन से उठकर आए और उनका स्वागत किया। साथ ही राजा विक्रमादित्य को सिंहासन पर बैठने को कहा। राजा ने इंद्र से सिंहासन पर बैठने से यह कहकर इंकार कर दिया कि वह इस आसन के योग्य नहीं हैं। इंद्र, विक्रमादित्य की नम्रता और सरलता देखकर प्रसन्न हुए। इंद्र ने उनसे कहा, “सपने में आपने जिस योगी को देखा था वह आप खुद थे। आपने इतना पुण्य कमा लिया है कि इंद्र के महल में आपको स्थायी स्थान मिल गया है।” इसके बाद इंद्र ने राजा विक्रमादित्य को एक मुकुट उपहार में दिया। राजा विक्रमादित्य कुछ दिन इंद्रलोक में बिताने के बाद वह मुकुट लेकर अपने राज्य वापस आ गए।

यह कहानी सुनाने के बाद 28वीं पुतली वैदेही ने राजा भोज से कहा कि अगर तुम भी राजा विक्रमादित्य की तरह पुण्य करने वाले, सरल व विनम्र हो, तो ही इस सिंहासन पर बैठ सकते हो, वरना नहीं। इतना कहकर 28वीं पुतली वैदेही वहां से उड़ जाती है।

कहानी से सीख : इस कहानी से बच्चों यह सीख मिलती है कि हमें दूसरों की मदद करनी चाहिए, क्योंकि अच्छे कर्मों का फल जरूर मिलता है।

सिंहासन बत्तीसी की छब्बीसवीं कहानी - मृगनयनी पुतली की कथा - Story of Mrignayani Pupil

Singhasan Battisi chabisvi putli Mrignaini Story

पच्चीवीं पुतली के द्वारा राज भोज महाराज विक्रमादित्य के गुणों को जानकर हर्षित हुए और उस स्थान से अपने महल की ओर रवाना हो गए। लेकिन अगल दिन फिर से उन्हें सिंहासन और महाराज विक्रमादित्य के गुणों का आकर्षण खींच लाया। जैसे ही राजा भोज सिंहासन की ओर बढ़े कि छब्बीसवीं पुतली मृगनयनी प्रकट हो गई। उसने राजा भोजा को रोकते हुए कहा कि ठहरो राजन् अगर आप इस सिंहासन पर बैठना चाहते हैं तो पहले मुझे यह बताईए कि क्या आपके अंदर वह गुण है जो महाराज विक्रमादित्य में था और जिसके बारे में मैं आपको बताने जा रही हूं। तब राजा भोज ने हाथ जोड़कर कहा कि देवी कृप्या उस गुण के बारे में मुझे बताईए। तब मृगनयनी पुतली ने महाराज विक्रमादित्य की छब्बीसवीं कथा कहना प्रारम्भ की।

महाराज विक्रमादित्य का मन जितना राजा काज और प्रजा की कुशलता में लगता है उससे कहीं ज्यादा वह पूजा पाठ और प्रभू भक्ति में तपस्वी के जैसे लीन रहते थे। वे इतनी कठोर तपस्या करते थे कि इंद्र देव का सिंहासन भी कांप जाता था।

एक दिन की बात है राजा विक्रमादित्य के दरबार में एक इसके कुछ सैनिक एक आदमी को पकड़ कर लाए जो देखने में किसी भिखारी के जैसा लगता था लेकिन उसके पास से बहुत सारा धन प्राप्त हुआ था। किसी भिखारी जैसे व्यक्ति के पास इतना धन कैसे आया यह सोचकर ही उसे सैनिकों से जंगल से संदिग्ध अवस्था में गिरफ्तार किया था।

महाराज ने जब उस व्यक्ति से धन के बारे में पूछा तो उसने कहा कि वह एक सेठ के यहां पर कार्य करता है और सेठ के पत्नी के साथ उसके अनैतिक संबंध हैं उसने ही यह धन दिया था और कहा था कि जंगल में रुक कर मेरा इंतेजार करना मैं सेठ को मारकर जल्दी ही तुम्हारे पास आ जाऊंगी। राजा ने व्यक्ति की बात सुनकर सेठ के यहां अपने सैनिक भेजे। वहां पर सेठ की चिता पर बैठी हुए उसकी पत्नी कह रही थी कि रात में लुटेरों से उसका सारा धन लूट लिया है और उसके पति की हत्या कर दी है इसलिए वह सती हो जाएगी।

सैनिकों ने पूरा वृत्तांत महाराज विक्रमादित्य को सुना दिया तब महाराज स्वयं उस व्यक्ति के साथ सेठ के घर पहुंचे। वहां सेठानी से कहा कि हमें तुम्हारी सच्चाई का पता चल गया है तुम्हारा चरित्र अच्छा नहीं है अब तुम को राजा द्वारा दिया जाने वाला दण्ड भोगना पड़ेगा। यह सुनकर सेठानी डर गई और राजा से कहा कि आप क्या मेरा चरित्र देख रहे हैं पहले अपनी छोटी रानी का चरित्र तो देख लों।

इतना कह कर वह सेठी की चिता में कूद गई और जलकर राख हो गई। इस घटना के बादे से महाराज का मन विचलित रहने लगा और वह गुप्त तरीके से छोटी रानी पर नजर रखने लगा। एक रात छोटी रानी ने सोचा कि सभी सोरहे हैं और वह उठकर महल से थोड़ी दूरी पर एक साधु की कुटिया में चली गई। राजा भी उसके पीछे पीछे आ गया था और जैसे ही उनके कुटिया से झांक कर देखा तो दंग रह गया।

राजा को अपनी काली करतूत का पता चल गया था कि उसके कुटिया में रहने वाले व्यक्ति के साथ अनैतिक संबंध हैं। गुस्से में उसने रानी और व्यक्ति को मार दिया और स्वयं ने सारे राज्य का भार सैनिकों के ऊपर डालकर सन्यासियों के जैसे जीवन अपना लिए।

सबसे पहले वे एक समुद्र के तट पर गए और समुद्र देव की तपस्या प्रारम्भ कर दी। समुद्र देव से उनसे वरदान मांगने को कहा। तब राजा ने कहा कि वे समुद्र के तट पर कुटिया बनाकर तपस्या करना चाहते हैं कृप्या आर्शिवाद प्रदान करें। समुद्र देव ने उन्हें आर्शिवाद के साथ ही एक शंख दिया और कहा कि किसी भी दैविय मुसीबत आने पर यह शंख बजा दें, इससे मुसीबत दूर हो जाएगी। इतना कह कर समुद्र देवता गायब हो गए।

इसके बाद राजा विक्रमादित्य एक कुटिया बनाकर कठोर तपस्या करने लगे। उनकी तपस्या के प्रभाव से स्वर्ग में इन्द्र देव का सिंहासन कंपायमान होने लगा। इन्द्र ने घबराकर अपने सेवकों को भेजकर कहा कि जहां पर विक्रमादित्य तपस्या कर रहा है उस स्थान को पानी में डुबा दो। सेवको ने ऐसा ही किया और विक्रमादित्य कुटिया सहित पानी में डूब गए, लेकन समुद्र देवता के आर्शिवाद से वह पानी कुछ ही देर में सूख गया।

यह देखकर इन्द्र चकित रह गया और फिर उसने सैनिकों को भेजकर वहां पर आंधी तूफान के जरिए विक्रमादित्य की तपस्या भंग करने का आदेश दिया। सेवको ने ऐसा ही किया लेकिन इस बार महाराज विक्रमादित्य से समुद्र देवता के द्वारा दिए गए शंख को बजाकर उस आपदा को भी दूर कर दिया और अपनी तपस्या में मग्न हो गए।

इन्द्र एक बार फिर से चकित रह गया और इस बार स्वर्ग की सबसे सुन्दर अप्सरा तिलोत्तमा को तपस्या भंग करने के उद्देश्य से भेजा। तिलोत्तमा विक्रमादित्य की साधना में नृत्य रूप और वादन के जरिए विघ्न डालने की चेष्टा करने लगी। लेकिन फिर भी विक्रमादित्य की तपस्या पर्वत के जैसे अचल रही। थक कर तिलोत्तमा वापस स्वार्ग आ गई।

इन्द्र ने फिर से एक और युक्ति सोची। उसे पता था कि विक्रमादित्य बहुत बड़ा दानी है और अगर उससे कोई ब्राह्मण जो भी मांगता है वह उसे दे देता है। इस बार इन्द्र एक ब्राह्मण रूप बनाकर विक्रमादित्य के पास पहुंचा। उन्हें देखकर विक्रमादित्य ने हाथ जोड़ते हुए कहा कि कहिए ब्राह्मण देवता मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूं।

तब इन्द्र ने कहा कि मुझे दान चाहिए। विक्रमादित्य ने कहा कि जो भी मेरे पास और आप उसमें से जो मन हो वाे मांग लीजिए। तब इन्द्र ने कहा कि तुम अपनी तपस्या का सारा फल मुझे दान में दे दो। तक विक्रमादित्य से सहर्ष अपनी तपस्या का सारा फल उन्हें दान में दे दिया। इस बात से प्रसन्न हो कर इन्द्र अपने असली रूप में आ गया और विक्रमादित्य को आर्शिवाद दिया कि उनके राज्य में कभी भी अतिवृष्टी और सूखा नहीं रहेगा और उनकी प्रजा हमेशा ही खुशहाल रहेगी। इतना कहकर इन्द्र देव गायब हो जाते हैं और विक्रमादित्य भी मन की शांति पाकर अपने राज्य की ओर प्रस्थान करते हैं।

राजा विक्रमादित्य के दान की बात कह कर पुलती ने राजा भोज से कहा कि कहिए राजन क्या आपके अंदर भी एसी सामर्थ्य है कि आप अपना सब कुछ दान में दे दें? एक बार फिर राजा भोज निरुत्तर रह गए और पुतली अन्य पुतलियों के जैसे हवा में उड़ गई।

कहानी से सीख-

किसी भी परिस्थिति में हमें डरना नहीं चाहिए बल्कि उस  परिस्थिति का साहस और धैर्य के साथ सामना करना चाहिए।

सिंहासन बत्तीसी की 31वीं कहानी - कौशल्या पुतली की कथा - Story of Kaushalya Putli

Singhasan Battisi ikatiisvi putli Kaushalya Story

जब 30 बार असफल रहने के बाद एक बार फिर राजा भोज सिंहासन पर बैठने की कोशिश करते हैं, तो 31वीं पुतली कौशल्या वहां प्रकट होती है। वह राजा भोज से कहती है, “इस सिंहासन पर तुम तभी बैठ सकते हो, जब राजा विक्रमादित्य जैसे गुण तुम में हों।” इसके साथ ही 31वीं पुतली राजा भोज को राजा विक्रमादित्य की एक कहानी सुनाती है, जो इस प्रकार है-

समय के साथ-साथ राजा विक्रमादित्य बूढ़े हो चले थे और उन्होंने अपनी शक्तियों से यह भी पता कर लिया था कि उनका अंत अब करीब है। अब राजा का ध्यान राज-पाठ और धर्म-कर्म के कामों में ज्यादा लगा रहता था। योग-साधना के लिए उन्होंने वन में एक आवास भी बना रखा था। एक दिन वन में साधना के दौरान उन्हें एक दिव्य रोशनी आती दिखाई दी। जब राजा ने ध्यान से देखा, तो पता चला कि यह दिव्य रोशनी सामने वाली पहाड़ियों से आ रही थी। अचानक से राजा को रोशनी के बीच चमचमाता हुआ सुंदर महल भी दिखाई पड़ा।

इस सुंदर महल को दूर से देखने के बाद राजा को उस महल को पास से देखने की इच्छा हुई। अपनी इच्छा को पूरा करने के लिए राजा ने अपने दोनों बेतालों को बुलाया। बेताल उन्हें पहाड़ी पर तो ले आए, लेकिन बैताल पहाड़ी से आगे महल में नहीं जा सकते थे। इस बात का कारण बताते हुए बेताल ने राजा से कहा, “इस दिव्य और सुंदर महल को एक योगी ने अपने मंत्रों से बांध रखा है। इसके अंदर वो ही जा सकता है, जिसने अपने अच्छे कर्मों से उस योगी से ज्यादा पुण्य कमाया हो।”

बेताल की बातें सुनकर राजा विक्रमादित्य को यह जानने की इच्छा हुई कि उन्होंने योगी से ज्यादा पुण्य कमाया है या नहीं। राजा विक्रमादित्य सीधे महल के दरवाजे की ओर बढ़ते हैं। जैसे ही राजा के कदम प्रवेश द्वार पर पड़े, वहां एक आग का गोला आकर उनके पास रुक गया। इसके बाद महल के अंदर से आज्ञा भरी आवाज सुनाई पड़ी और वो आग का गोला राजा के पास से पीछे हट गया। जब राजा विक्रम ने महल के अंदर प्रवेश किया, तो उस आवाज ने राजा से उनका परिचय मांगते हुए कहा, “सब कुछ सच बताओ, वरना आने वाले को श्राप देकर भस्म कर दिया जाएगा।”

उस योगी ने राजा से उनका परिचय मांगा। राजा ने कहा कि मैं विक्रमादित्य हूं। नाम सुनते ही योगी ने कहा, “मैं भाग्यशाली हूं, जो आपके दर्शन हुए।” योगी ने राजा का आदर-सत्कार किया और उनसे कुछ मांगने को कहा। राजा ने योगी की बात का मान रखते हुए उनसे वो अद्भुत महल मांग लिया।

योगी ने राजा की इच्छा को जानते हुए वो महल राजा को सौंप दिया और वन में चले गए। योगी जब वन में भटक रहे थे, तब उनकी मुलाकात उनके अपने गुरु से हुई। गुरु ने योगी को इस हाल में देखकर वन में भटकने का कारण जानना चाहा, तो वह बोले कि, “मैंने अपना महल राजा विक्रमादित्य को दान कर दिया।”

योगी की इस बात पर गुरु ने हंसते हुए कहा, “धरती के सबसे बड़े दानी को तुम क्या दान करोगे। ब्राह्मण के रूप में जाकर विक्रमादित्य से अपना महल फिर से मांग लो।” अपने गुरु की बात मानकर योगी ब्राह्मण वेश में राजा के साधना वाले स्थान पर पहुंच गया और उनसे रहने के लिए जगह देने की प्रार्थना की। राजा विक्रम समझ गए थे कि ब्राह्मण वेश में वो योगी है। राजा ने उनसे अपनी मन पसंद जगह मांगने के लिए कहा, तो योगी ने उनसे वही महल मांगा, जो उसने राजा को दान किया था। राजा विक्रम ने मुस्कुराते हुए कहा, “मैं वह महल वैसा का वैसा छोड़कर उसी समय आ गया था। मैंने तो बस तुम्हारी परीक्षा लेने के लिए वह महल मांगा था।”

इस कहानी के बाद भी इकत्तीसवीं पुतली ने अपनी कहानी खत्म नहीं की। वह आगे बोली, “राजा विक्रमादित्य में देवताओं से बढ़कर गुण थे। वे इन्द्रासन के अधिकारी माने जाते थे, लेकिन सच तो यह है कि वो देवता नहीं मानव थे, जिन्होंने मृत्यु लोक में जन्म लिया था।” पुतली ने आगे कहा कि राजा ने एक दिन अपना देह त्याग दिया। राजा की मृत्यु के बाद प्रजा में हाहाकार मच गया। उनकी प्रजा दुख से रोने लगी। जब राजा का अंतिम संस्कार होने वाला था, तब उनकी सारी रानियां चिता पर सती होने के लिए बैठ गईं। महाप्रतापी राजा के अंतिम संस्कार के दिन देवताओं ने फूलों की वर्षा कर राजा को आखिरी विदाई दी।

राजा के बाद उनके बड़े पुत्र का राजतिलक हुआ और उसे राजा घोषित किया गया, मगर वह अपने पिता के सिंहासन पर नहीं बैठ पाया, जिसका कारण वो समझ नहीं पा रहा था। एक दिन अपने पुत्र के सपने में राजा विक्रम आए और कहा, “उस सिंहासन पर बैठने के लिए तुम्हें पुण्य, प्रताप और यश कमाना होगा और जिस दिन तुम इन गुणों की प्राप्ति कर लोगे, उस दिन मैं तुम्हारे सपने में आकर बताऊंगा।”

काफी समय हो चला था, लेकिन राजा विक्रम अपने पुत्र के सपने में नहीं आए, तो पुत्र परेशान हो गया कि वो सिंहासन का क्या करे। पंडितों और विद्वानों की सलाह पर वह एक दिन अपने पिता का ध्यान करके सोया, तो राजा विक्रम सपने में आए और कहा कि सिंहासन को जमीन में गड़वा दिया जाए और अपने पुत्र को उज्जैन छोड़कर अम्बावती में अपनी नई राजधानी बनाने के लिए सलाह दी। राजा ने यह भी कहा कि जब भी धरती पर सर्वगुण सम्पन्न राजा पैदा होगा, वो सिंहासन खुद-ब-खुद उसके अधिकार में चला जाएगा। पुत्र ने अपने पिता के स्वप्न वाले आदेश को मानकर सिंहासन को जमीन में गड़वा दिया और खुद उज्जैन को छोड़कर अम्बावती को नई राजधानी बनाकर शासन करने लगा।

इतना कहकर 31वीं पुतली कौशल्या वहां से उड़ जाती है और राजा भोज फिर से सोच में पड़ जाते हैं।

कहानी से सीख :

इस कहानी से यह सीख मिलती है कि इंसान को हमेशा अच्छे कर्म करने चाहिए, ताकि पूरी दुनिया आपके अच्छे कर्मों से आपको याद करे

सिंहासन बत्तीसी की बीसवीं कहानी - ज्ञानवती पुतली की कथा - Story of Gyanvati Putli

Singhasan Battisi Twentieth Putli Gyanwati Story In Hindi

उन्नीसवीं पुतली की कहानी सुनने के बाद राजा भोज अगले दिन फिर से सिंहासन बत्तीसी पर बैठने आते हैं, तभी बीसवीं पुतली ज्ञानवती प्रकट होती है और उन्हें रोकती है। ज्ञानवती कहती है, “रुको राजन! इसपर बैठने से पहले राजा विक्रमादित्य के इस गुण के बारे में तो जान लो। इतना कहने के बाद बीसवीं पुतली ज्ञानवती कहानी सुनाना शुरू करती है, जो इस प्रकार है –

एक समय की बात है, राजा विक्रमादित्य जंगल में भ्रमण के लिए निकले थे। इसी दौरान उन्होंने दो लोगों को आपस में बातें करते सुना, जिनमें से एक ज्योतिषी था। ज्योतिषी ने वहां मौजूद अपने दोस्त से कहा, “मुझे ज्योतिष विद्या का पूरा ज्ञान प्राप्त है। मैं तुम्हारे भूत, वर्तमान और भविष्य के बारे में सब कुछ बता सकता हूं।” लेकिन, उसके दोस्त को उसकी बातों में कोई रुचि नहीं थी। इसलिए, उसने ज्योतिषी से कहा, “तुम्हें मेरे भूत और वर्तमान के बारे में पूरी जानकारी है, इसलिए तुम ये सब बता सकते हो और भविष्य के बारे में जानने की मेरी कोई इच्छा नहीं है। इसलिए, अच्छा होगा अगर तुम अपने ज्ञान का बखान न करो।”

ज्योतिषी इतने पर भी नहीं चुप हुआ। उसने आगे कहा, “जंगल में बिखरी हुई इन हड्डियों को देखकर मैं यह बता सकता हूं कि यह कौन से जानवर की है और उसकी मृत्यु कैसे हुई।” इस बात में भी उसके दोस्त ने रुचि नहीं ली।

इसी दौरान उस ज्योतिषी की नजर जमीन पर छपे पंजों के निशानों पर पड़ी। यह देख उसने कहा, “ये पंजों के निशान किसी राजा के हैं, तुम चाहो तो इसकी जांच कर सकते हो।” ज्योतिषी ने बताया, “राजा-महाराजा के पैरों पर कमल के निशान होते हैं, जो यहां भी हैं। ये बात बिल्कुल सत्य है।” इस पर उसके दोस्त ने सोचा कि क्यों ने इस बार ज्योतिषी की बात की जांच कर ली जाए, नहीं तो वो अपने ज्ञान का बखान ऐसे ही करता रहेगा।

इसके बाद दोनों दोस्तों ने उन निशानों का पीछा करना शुरू किया और चलते-चलते उसकी समाप्ति तक पहुंचे। वहां उन्होंने एक लकड़हारे को देखा। ज्योतिषी ने उसे अपने पैरों को दिखाने को कहा। जब लकड़हारे ने अपना पैर दिखाया, तो ज्योतिषी चौंक गया। उसके पैरों पर वो कमल के निशान मौजूद थे। ज्योतिषी को लगा कि वह किसी राजा का ही पुत्र होगा, लेकिन शायद वो किसी कारण वश इस काम को करने के लिए मजबूर होगा। इसलिए, उसने लकड़हारे से उसका परिचय पूछा। तब लकड़हारे में बताया कि उसका जन्म लकड़हारे के घर में ही हुआ है। सदियों से उसके यहां यही काम चलता आ रहा है।

यह सुनने के बाद ज्योतिषी को बड़ा आश्चर्य हुआ। उसका भरोसा ज्योतिष विद्या से उठने लगा। उसका दोस्त भी उसकी इस विद्या का मजाक उड़ाने लगा। इसपर ज्योतिषी ने कहा, “ऐसा कैसे हो सकता है, चलो एक बार चलकर राजा विक्रमादित्य के पैरों को देखते हैं। अगर उनके पैरों पर ये निशान नहीं हुए, तो मैं अपनी हार स्वीकार कर लूंगा और समझूंगा कि ये सब बेकार है।” इस पर उसका दोस्त भी राजी हो गया और दोनों राजमहल की ओर चल दिए।

राज दरबार पहुंचकर उन्होंने महाराजा विक्रमादित्य से मिलने की इच्छा जताई। राजा ने दोनों को अंदर आने का आदेश दिया। यहां उस ज्योतिष ने राजा से अपना पैर दिखाने का आग्रह किया। राजा विक्रमादित्य ने जब अपने पैर दिखाए, तो ज्योतिषी फिर चकित हुआ। उसके बताए अनुसार राजा के पैरों पर किसी प्रकार के कोई चिन्ह नहीं थे, बल्कि उनका पैर भी आम लोगों जैसा ही था।

यह देखने बाद उस ज्योतिषी का भरोसा पूरे ज्योतिष विज्ञान से उठ गया। उसने राजा को बताया, “ज्योतिष विद्या के अनुसार, राजा-महाराजा के पैरों पर कमल का निशान होता है, लेकिन यहां ऐसा नहीं है। जबकि जंगल में एक लकड़हारे के पैरों पर ऐसा निशान मौजूद है, जिसका संबंध किसी भी राजघराने से नहीं है।”

ज्योतिषी की बातों को सुनने के बाद राजा विक्रमादित्य को बहुत हंसी आई। उन्होंने उससे पूछा, “ये सब देखने के बाद क्या तुम्हारा विश्वास ज्योतिष विद्या से उठ गया?” ज्योतिषी ने कहा, “जी महाराज, ये सब कुछ अपनी आंखों से देखने के बाद मेरा अब ज्योतिष विद्या पर बिल्कुल भी भरोसा नहीं रहा।” इतना कहकर उसने राजा को प्रणाम किया और अपने दोस्त के साथ जाने की आज्ञा ली।

तभी राजा विक्रमादित्य ने दोनों को रुकने का आदेश दिया। फिर उन्होंने अपने सेवक से एक चाकू मंगवाया और अपने पैरों को कुरेदने लगे। जैसे-जैसे उनके पैरों की नकली चमड़ी हटती गई, कमल का निशान दिखने लगा। यह देखकर ज्योतिषी और उसका दोस्त चकित रह गए। उन्होंने राजा से पूछा, “हे राजन ये सब क्या है।” इस पर राजा ने कहा, “आप बहुत बड़े ज्ञानी हैं। आपके ज्ञान की सीमा बहुत बड़ी है, लेकिन यह तब तक अधूरी रहेगी जब तक आप इसका बखान करते रहेंगे।”

राजा ने बताया, “जंगल में आप दोनों की बातें मैंने सुन ली थी। वन में आपने जिस लकड़हारे से मुलाकात की वह मैं ही था। यह सब मैंने इसलिए किया ताकि आपको यह समझा सकूं कि एक ज्ञानी को कभी अपने ज्ञान का बखान करने की आवश्यकता नहीं होती।”

इस कहानी को सुनाने के बाद बीसवीं पुतली ज्ञानवती ने राजा भोज से कहा कि अगर आप भी राजा विक्रमादित्य की तरह गुणवान हैं, तो ही सिंहासन की ओर बढ़ें। इतना कहकर बीसवीं पुतली ज्ञानवती वहां से उड़ जाती है।

कहानी से सीख :

इस कहानी को पढ़ने के बाद बच्चों हमें यह सीख मिलती है कि इंसान को कभी भी अपने ज्ञान का बखान नहीं करना चाहिए। जिसके पास ज्ञान होता है, वह कभी उसका प्रचार नहीं करता है, बल्कि समय आने पर अपने ज्ञान का इस्तेमाल करता है।