13 March 2022

स्वामी विवेकानंद की प्रेरक कहानी - डर का सामना - Inspirational Story of Swami Vivekananda - Facing Fear

Swami Vivekananda's inspiring story - facing fear

हर किसी की जिंदगी में ऐसा पल जरूर आता है जब उसे किसी-न-किसी वजह से डर लगने लगता है। इस डर का सामना करने के लिए जानना जरूरी है स्वामी विवेकानंद का एक किस्सा।

एक दिन की बात है स्वामी विवेकानंद मंदिर में दर्शन करने के बाद प्रसाद लेकर बाहर निकले। कुछ देर आगे चलने के बाद स्वामी के घर के रास्ते में उन्हें कुछ बंदरों ने घेर लिया। स्वामी थोड़ा आगे बढ़ते और वो बंदर उन्हें काटने को आते। काफी देर तक स्वामी विवेकानंद ने आगे जाने की कोशिश की, लेकिन वो ऐसा कर न पाए।

आखिर में स्वामी विवेकानंद वहां से वापस मंदिर की ओर लौटने लगे। उनके हाथ से प्रसाद की थैली को छीनने के लिए बंदरों की टोली भी उनके पीछे भागने लगी। स्वामी डर गए और वो भी डर के मारे दौड़ने लगे। दूर से मंदिर के पास बैठा एक बूढ़ा सन्यासी सब कुछ देख रहा था। उसने स्वामी को भागने से रोका और कहा, “बंदरों से डरने की जरूरत नहीं है। तुम इस डर का सामना करो और फिर देखो क्या होता है।”

स्वामी विवेकानंद संन्यासी की बात सुनकर वहां ठहरे और बंदरों की तरफ मुड़ गए। अपनी तरफ तेजी से बंदरों का आता देखकर स्वामी भी उनकी तरफ उतनी ही तेजी से बढ़ने लगे। बंदरों ने जैसे ही स्वामी विवेकानंद को अपनी तरफ आता देखा, तो वो डरकर भागने लग गए। अब बंदर आगे-आगे भाग रहे थे और स्वामी जी बंदरों के पीछे-पीछे। कुछ ही देर में सभी बंदर उनके रास्ते से हट गए।

इस तरह स्वामी विवेकानंद ने अपने डर पर जीत हासिल की। फिर वो लौटकर उसी संन्यासी के पास गए और उनको इतनी बड़ी बात सिखाने के लिए धन्यवाद कहा।

कहानी से सीख –  कोई भी चीज डर का कारण तब तक बनी रहती है, जब तक हम उससे डरते हैं। इसी वजह से डर से डरने की जगह उसका सामना करना चाहिए। ऐसा करने से डर भाग जाता है।

स्वामी विवेकानंद की प्रेरक कहानी - शिक्षा पर विचार - Inspirational Story of Swami Vivekananda - Thoughts on Education

Swami Vivekananda's inspiring story - Thoughts on education

स्वामी विवेकानंद जी का आदर्शों से भरा जीवन हम सभी को प्रेरणा देता है। उनके उच्च विचार न केवल हमारे जीवन में नई ऊर्जा का संचार करते हैं साथ ही हमारा मार्गदर्शन भी करते हैं। वर्तमान स्थिति को देखते हुए हमें उनके शिक्षा संबंधी विचार बहुत याद आते हैं। स्वामी जी मानते थे कि सही शिक्षा के अभाव के कारण ही हमारा देश अभी तक पूर्ण विकसित नहीं हो पाया है।

स्वामीजी चाहते थे कि शिक्षा प्रणाली ऐसी हो जो युवाओं के चरित्र का निर्माण करे, उनको जीवन संघर्ष के लिए तैयार करे। उनका मानना था कि सिर्फ किताबें पढ़ना शिक्षा नहीं है, बल्कि उनसे ज्ञान प्राप्त करना और उस ज्ञान का प्रयोग जीवन में करना वास्तविक शिक्षा है।

स्वामी जी के मत अनुसार वर्तमान शिक्षा प्रणाली से सिर्फ मजदूर तैयार हो रहें हैं, जबकि वे चाहते थे कि शिक्षा ऐसी हो जिससे बच्चे आत्मनिर्भर बने और कमाई के साधन स्वयं तैयार करें।

स्वामी जी के शिक्षा पर कुछ मुख्य विचार इस प्रकार हैं:

  1. बच्चों की शिक्षा ऐसी होना चाहिए, जिससे उनका शारीरिक, मानसिक और आत्मिक विकास हो।
  1.  शिक्षा बच्चों की बुद्धि का विकास कर उन्हें आत्मनिर्भर बनाने वाली होना चाहिए।
  1. बालक-बालिकाओं को समान रूप से शिक्षा मिलनी चाहिए।
  1. आचरण और संस्कारों के माध्यम से बालकों को धार्मिक शिक्षा भी दी जानी चाहिए।
  1. देश की आर्थिक प्रगति के लिए तकनीकी ज्ञान भी शिक्षा में शामिल किया जाना चाहिए।

स्वामी जी युवओं में अनंत साहस और शक्ति का संचार करना चाहते थे। उनका मानना था कि बेहतर समाज के निर्माण के लिए युवाओं का सही मार्गदर्शन जरूरी है। इसीलिए उन्होंने शिक्षा को बहुत महत्व दिया। उनका मत था कि हर बालक में कुछ न कुछ संभावनाएं अवश्य होती हैं, जरूरत है तो बस उसे पहचानने की और विकसित करने की। जिससे एक निडर, साहसी और आत्मनिर्भर चरित्रवान युवा का निर्माण हो सके। ऐसे में जब देश का युवा शक्तिशाली और बलवान होगा तो अपने आप ही विकासशील और आत्मनिर्भर देश का निर्माण होगा। इसीलिए स्वामी जी का मानना था कि वास्तविक शिक्षा वो है जो व्यक्ति की क्षमताओं को अभिव्यक्त कर उसे कामयाब बनाती है

कहानी से सीख:

तो इस प्रकार स्वामी जी के शिक्षा सम्बंधी विचार ने हमें बताया कि हमारा असल ज्ञान वो है जो हमें जीवन में सफल और स्वतंत्र बनाए, न कि वो जो हमें गुलामी की ओर ले जाए। ये वास्तविक ज्ञान हम में ही मौजूद होता है। बस उसे पहचान कर विकसित करने की जरूरत है।

स्वामी विवेकानंद की प्रेरक कहानी - मां की महिमा - Inspirational Story of Swami Vivekananda - Glory of the Mother

Swami Vivekananda maa ki mahima Story

मां की महिमा का बखान जितना भी किया जाए वो कम है। मां के प्यार का कर्ज कोई नहीं चुका सकता और मां की जरूरत क्या है, इसे स्वामी विवेकानंद ने बखुबी समझाया है। जानिए इस कहानी में…

एक बार किसी व्यक्ति ने स्वामी विवेकानंद जी से सवाल किया, “दुनिया में मां की महिमा इतनी क्यों है और इसका कारण क्या है? इस सवाल को सुनने के बाद स्वामी जी के चेहरे पर मुस्कान फैल गई। इस सवाल का जवाब देने के लिए उन्होंने उस व्यक्ति के सामने एक शर्त रखी। विवेकानंद जी की शर्त के अनुसार उस व्यक्ति को 5 किलो के पत्थर को एक कपड़े में लपेट कर उसे अपने पेट पर 24 घंटे तक बांधना था और फिर स्वामी जी के पास जाना था। इसके बाद उसे अपने सवाल का जवाब स्वामी विवेकानंद जी से मिलना था।

स्वामी जी के कहे अनुसार उस व्यक्ति ने एक पत्थर को अपने पेट पर बांधा और वहां से चला गया। अब उसे पत्थर बांधे-बांधे ही अपना सारा दिनभर का काम करना था, लेकिन उसके लिए ऐसा करना मुश्किल हो रहा था। पत्थर के बोझ के कारण वह जल्दी थक गया। दिन तो जैसे-तैसे गुजर गया, लेकिन शाम होते-होते उसकी हालत खराब हो गई। जब उससे रहा नहीं गया, तो वह सीधा स्वामी जी के पास गया और बोला, “स्वामी जी मैं इस पत्थर को ज्यादा समय तक बांधकर नहीं रख सकता। सिर्फ एक सवाल का जवाब जानने के लिए मैं इतना कष्ट नहीं सह सकता।”

उस व्यक्ति की बात सुनकर स्वामी जी मुस्कुराते हुए बोले, “तुम 24 घंटे भी पत्थर का भार संभाल नहीं सके और मां अपनी कोख में बच्चे को नौ महीने तक रखती है और सभी तरह के करती है। इसके बाद भी उसे जरा भी थकान महसूस नहीं होती। इस पूरे संसार में मां जैसा और कोई नहीं है, जो इतना शक्तिशाली और सहनशील हो। मां तो शीतलता और सहनशीलता की मूरत है। मां से बढ़कर इस दुनिया में कोई नहीं है।

कहानी से सीख:

स्वामी विवेकानंद जी इस कहानी के माध्यम से लोगों को यह सीख देना चाहते थे कि इस संसार में मां जितना धैर्यवान और सहनशील कोई और नहीं है। मां से बढ़कर इस दुनिया में कुछ नहीं हो सकता।

स्वामी विवेकानंद की प्रेरक कहानी - सत्य का साथ - Inspirational Story of Swami Vivekananda - Truth Ka Saath

Swami Vivekananda maa ki mahima Story

स्वामी विवेकानंद बचपन से ही बुद्धिमान छात्र थे। उनके तेज दिमाग और प्रभावशाली बातों की वजह से सभी उनकी तरफ खींचे चले जाते थे। एक दिन स्कूल में भी स्वामी विवेकानंद अपने दोस्तों से बातें कर रहे थे। बातों-ही-बातों में स्वामी उन सबको एक कहानी सुनाने लगे। उनके दोस्तों को कहानी अच्छी लग रही थी, इसलिए सभी ध्यान से सुन रहे थे। विवेकानंद कहानी सुनाने में और उनके दोस्त उसे सुनने में इतना खो गए कि किसी को पता ही नहीं चला कि कब मास्टर जी क्लास में आ गए।

मास्टर जी ने क्लास में आते ही बच्चों को पढ़ाना शुरू कर दिया। आगे बैठे बच्चे उन्हें ध्यान से सुन रहे थे कि कुछ ही देर में मास्टर जी के कानों तक विवेकानंद की हल्की आवाज पहुंची। उन्होंने ऊंची आवाज में पूछा कि कक्षा में कौन बातें कर रहा है? वहां मौजूद अन्य छात्रों ने विवेकानंद और उनके दोस्तों की ओर इशारा कर दिया।

यह जानकर टीचर को गुस्सा आया। उन्होंने उन सभी को अपने पास बुलाया और पूछा कि मैं अभी क्या पढ़ा रहा था? कुछ सेकंड तक किसी से कोई जवाब न मिलने पर उन्होंने हर बच्चे की तरफ देखते हुए सवाल पूछा। सबने अपनी नजरें झुका ली। तभी टीचर विवेकानंद के पास पहुंचे और कहा कि क्या तुम्हें पता है, मैं क्या पढ़ा रहा था? उन्होंने मास्टर को सही जवाब दे दिया।

तब टीचर को लगा कि इन सब बच्चों में से सिर्फ विवेकानंद ही ध्यान से पढ़ रहे थे, दूसरे बच्चे नहीं। यह सोचते ही मास्टर ने स्वामी के अलावा अन्य छात्रों को अपने-अपने बेंच पर खड़े होने की सजा दे दी। सभी ने टीचर की बात मान ली और बेंच पर खड़े हो गए। कुछ ही देर में स्वामी विवेकानंद भी अपनी सीट में जाकर बेंच पर खड़े हो गए।

स्वामी को बेंच पर खड़ा देखकर मास्टर ने कहा कि मैंने तुम्हें सजा नहीं दी है तुम बैठ जाओ। नजर झुकाते हुए विवेकानंद ने कहा, “सर, मैंने ही इन सभी छात्रों को बातों में लगा रखा था। गलती मेरी ही है।” सजा न मिलने पर भी स्वामी विवेकानंद द्वारा सच बोलने पर सभी छात्र काफी प्रभावित हुए।

कहानी से सीख:

जीवन में हमेशा सच बोलना चाहिए।

गौतम बुद्ध की प्रेरक कहानी - कबूतर का घोंसला - Inspirational Story of Gautam Buddha - Pigeon's Nest

Gautam Buddha kabutar ka ghosla Story

एक बार गौतम बुद्ध शाम के समय कुटिया के बाहर शिष्यों के साथ बेठे थे। तभी वहां एक कबूतर का जोड़ा उड़ता हुआ आ गया। उन्हें देख कर महात्मा बुद्ध को एक कहानी याद आई और उन्होंने शिष्यों को कहानी सुनना शुरू किया।

एक पेड़ पर एक कबूतर और कबूतरी रहते थे। कुछ समय बाद कबूतरी ने उसी पेड़ की टहनी पर तीन अंडे दिए। एक दिन कबूतर और कबूतरी दोपहर के समय खाना ढूंढते हुए कुछ दूर निकल गये। तभी कहीं से एक लोमड़ी आ गयी। वह भी भोजन की तलाश में पेड़ पर चढ़ी। जहां उसे कबूतर के अंडे मिल गये और वो अंडों को खा गयी।

जब कबूतर का जोड़ा वापस आया तो अंडे न पा कर बहुत परेशान हो गया। दोनों को बहुत बुरा लग रहा था। उनका मन टूट सा गया। तभी कबूतर ने निश्चय किया कि अब वह घोंसला बनाएंगा। ताकि फिर कभी उसके अंडे कोई न खा जाए।

कबूतर ने अपने निर्णय अनुसार तिनके इकट्ठे कर के घोंसला बनाना शुरू किया। पर उसे एहसास हुआ कि उसे तो घोंसला बनाना आता ही नहीं है। तब उसने मदद के लिए जंगल के दूसरे पक्षियों को बुलाया।

सभी पक्षी उसकी मदद के लिए आ गये आर उन्होंने कबूतर के लिए घोंसला बनाना शुरू किया। पक्षियों ने अभी कबूतर को सिखाना शुरू ही किया था कि कबूतर ने बोला कि अब वो घोंसला बना लेगा। उसने सब सीख लिया है।

सभी पक्षी यह सुन कर वापस चले गए। अब कबूतर ने घोंसला बनाना शुरू किया। उसने एक तिनका इधर रखा एक तिनका उधर। उसे समझ आया कि वह अभी भी कुछ नही सीखा है। उसने फिर से पक्षियों को बुलाया। पक्षियों ने आ कर फिर घोंसला बनाना शुरू किया। अभी आधा घोंसला बना ही था कि कबूतर जोर से चिल्लाया, तुम सब छोड़ दो अब मैं समझ गया हूं यह कैसे बनेगा।

इस बार पक्षियों को बहुत गुस्सा आया। सारे पक्षी तिनके वहीं छोड़ कर चले गये। कबूतर ने फिर कोशिश की पर उस से घोंसला नहीं बना।

कबूतर ने तीसरी बार पक्षियों को बुलाया, लेकिन इस बार एक भी पक्षी मदद के लिए नहीं आया और आज तक कबूतर को घोंसला बनाना नहीं आया।

कहानी से सीख:

गौतम बुद्ध जी की इस कहानी ने बताया कि हमें जो काम नहीं आता हो, उसे किसी की मदद से पूरी तरह सीख लेना चाहिए। जो काम नहीं आता हो उसे जबरदस्ती करने का दिखावा नहीं करना चाहिए, क्योंकि मदद करने वाला व्यक्ति एक या दो बार तो आपकी मदद करेगा, लेकिन हर बार नहीं। इसलिए, किसी की मदद का सम्मान करते हुए वह काम पूरी निष्ठा के साथ सीखना चाहिए।

गौतम बुद्ध की प्रेरक कहानी - ज्ञान से हुई मोक्ष की प्राप्ति - Inspirational story of Gautam Buddha - attainment of salvation through knowledge

Gautam Buddha gyan se moksh ki prapti Story

एक दिन गौतम बुद्ध अपने शिष्यों के साथ कुटिया में बैठे थे। सभी शिष्य आज जानना चाहते थे कि मोक्ष कैसे प्राप्त किया जा सकता है। इसलिए उन्होंने बुद्ध जी से निवेदन किया कि वो आज मोक्ष पर उपदेश दें।

शिष्यों की बात मान कर बुद्ध जी ने एक कहानी सुनाना शुरू किया।

यह कहानी थी एक जल्लाद और भिक्षुक की।

अपने राज्य का मुख्य जल्लाद, जिसने बहुत से गुनाहगारों को दंड दिया था। अब वह रिटायर हो कर राज्य से बाहर एक कुटिया बना कर अपना जीवन व्यतीत कर रहा था। उसे हमेशा लगता था कि उसने कितने लोगों की हत्या की है, वह कितना पापी है, ऐसे ख्यालों से वह हमेशा घिरा रहता था। वह अपना सारा दिन पश्चाताप में ही गुजारता था।

एक दिन वह रोज की तरह इन्हीं खयालों में खोया हुआ, खाना खाने के लिए थाली परोस रहा था। तभी उसको दरवाजे से किसी की आवाज आई। उसने बाहर जा कर देखा तो एक भिक्षुक खड़ा था। भिक्षुक के चेहरे को देख कर ही जल्लाद समझ गया कि भिक्षुक बहुत ही लम्बी साधना के बाद आज उठा है और भूख से व्यकुल भी है।

जल्लाद के मन में आया की जिंदगी भर तो मैंने बस हत्याएं ही की हैं, आज मौका मिला है कुछ पुण्य कमाने का तो इसे गंवाना नहीं चाहिए।

उसने भिक्षुक को अन्दर बुलाया और अपनी खाने की थाली उसे दे दी। भिक्षुक खाना देख कर बहुत प्रसन्न हुए। भर पेट भोजन कर के भिक्षुक ने जल्लाद से बातचीत शुरू की।

जल्लाद ने भिक्षुक को अपने जीवन की सारी कहानी सुनाई। उसने बताया कि वह कैसा काम करता था, उसने कितने लोगों को फांसी दी और वह सोचता है कि वह कितना बड़ा अपराधी है।

जल्लाद की वेदना सुन कर भिक्षुक बहुत ही शांत स्वर में बोले कि क्या तुमने वो जीव हत्याएं अपनी मर्जी से की थी?

जल्लाद ने कहा, नहीं मैं तो बस मेरे राजा की आज्ञा का पालन कर रहा था। मेरा कोई भाव नही था उन्हें मृत्युदंड या सजा देने का।

तब भिक्षुक ने कहा, तब तुम अपराधी कैसे हुए। तुम तो अपने राजा के आदेशों का पालन कर रहे थे।

जल्लाद को एहसास हुआ कि वह किसी गलत काम के लिए जिम्मेदार नहीं था उसका कोई दोष नहीं है, वह तो सिर्फ अपना दायित्व पूरा कर रहा था। इस प्रकार जल्लाद का मन शांत हुआ फिर भिक्षुक ने जल्लाद को उपदेश दिया और उस से विदा ले ली।

भिक्षुक को विदा कर के जब जल्लाद वापस घर में आया, उसकी मृत्यु हो गयी। जिसके बाद उसको मोक्ष प्राप्त हुआ।

इतना कह कर बुद्ध जी ने कहानी को विराम दिया।

सभी शिष्य बहुत ही आश्चर्य के साथ बुद्ध जी की ओर देख रहे थे। किसी को समझ नहीं आ रहा था कि जिसने इतनी हत्याएं की हो उसे मोक्ष कैसे प्राप्त हो सकता है।

तब एक शिष्य ने यह दुविधा बुद्ध जी के सामने रखी। बुद्ध जी ने तब शिष्यों को समझाया की भिक्षुक के उपदेश से जल्लाद को ज्ञान प्राप्त हो गया था। जल्लाद के जीवन में पहली बार किसी ने उसे ज्ञान का उपदेश दिया था। इसलिए मृत्यु के बाद उसे मोक्ष प्राप्त हुआ।

अपनी बात को विराम देते हुए अंत में बुद्ध जी बोले, बिना ज्ञान के हजार शब्दों का उपदेश भी बेकार है, किन्तु जब शांत मन से उपदेश का एक शब्द भी सुन लिया जाए तो वह ज्ञान दे देता है। और ज्ञान से ही मोक्ष की प्राप्ति संभव है।

कहानी से सीख

इस कहानी ने हमे सिखाया की अपने कर्तव्यों का पालन बिना किसी दुर्भाव के पूरी निष्ठा के साथ करना चाहिए। साथ ही अपना मन हमेशा शांत रखना चाहिए। क्योंकि शांत मन से उपदेश सुनने पर ही वास्तविक ज्ञान प्राप्त हो सकता है। जो मोक्ष की ओर ले जाता है।