07 March 2022

लक्खण मृग की कहानी | The Story Of The Two Deer In Hindi

कई वर्षों पहले मगध जनपद नामक एक नगर हुआ करता था। उसी के पास एक घना जंगल था, जहां हजार हिरणों का एक समूह रहा करता था। हिरणों के राजा के दो पुत्र थे, जिनमें से एक का नाम लक्खण और दूसरे का काला था। जब राजा बहुत बुढ़ा हो गया, तो उसने अपने दोनों बेटों को उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। दोनों के हिस्से में 500-500 हिरण आए।

लक्खण और काला के उत्तराधिकारी बनने के कुछ दिन बाद मगधवासियों के लिए खेतों में लगी फसल काटने का समय आ गया था। इसलिए, किसानों ने फसल को जंगली जानवरों से बचाने के लिए खेतों के पास कई तरह के उपकरण लगा दिए। साथ ही खाइयों का निर्माण करने लगे। इसकी जानकारी मिलते ही हिरणों के राजा ने दोनों बेटों को अपने-अपने समुह के साथ दूर सुरक्षित पहाड़ी इलाके में जाने के लिए कहा।

पिता की बात सुनते ही काला तुरंत अपने समुह के साथ पहाड़ी की ओर निकल गया। उसने जरा भी नहीं सोचा कि दिन के उजाले में लोग उनका शिकार कर सकते हैं और असल में हुआ भी यही। रास्ते में कई हिरण शिकारियों का शिकार बन गए। वहीं, लक्खण बुद्धिमान मृग था। इसलिए, उसने अपने साथियों के साथ रात के अंधेरे में पहाड़ी की ओर निकलने का फैसला किया और सभी सुरक्षित पहाड़ी तक पहुंच गए।

कुछ महीने बाद जब फसल कट गई तब लक्खण और काला वापस जंगल लौट आए। दोनों समूह के साथ वापस लौटे, तो उनके पिता ने देखा कि लक्खण के समूह के सारे मृग साथ है और काला के समूह में हिरणों की संख्या कम थी। इसके बाद सभी को लक्खण की बुद्धिमत्ता के बारे में पता चला, जिसकी सभी ने प्रशंसा की।

कहानी से सीख

कोई भी काम करने से पहले कई बार सोचना चाहिए, तभी उसको करना चाहिए। इससे हमेशा सफलता मिलती है।

 महाकपि का बलिदान | The Story Of Great Monkey In Hindi


The Story Of Great Monkey In Hindi-1

हिमालय के जंगल में ऐसे कई पेड़-पौधे हैं, जो अपने आप में अनोखे हैं। ऐसे पेड़-पौधे और कही नहीं पाए जाते। इन पर लगने वाले फल और फूल सबसे अलग होते हैं। इन पर लगने वाले फल इतने मीठे और खुशबूदार होते हैं कि कोई भी इन्हें खाए बिना रह नहीं सकता। ऐसा ही एक पेड़ नदी किनारे था, जिस पर सारे बंदर अपने राजा के साथ रहा करते थे। बंदरों के राजा का नाम महाकपि था। महाकपि बहुत ही समझदार और ज्ञानवान था।

महाकपि का आदेश था कि उस पेड़ पर कभी कोई फल न छोड़ा जाए। जैसे ही फल पकने को होता, वैसे ही वानर उसे खा लेते थे। महाकपि का मानना था कि अगर कोई पका फल टूटकर नदी के रास्ते किसी मनुष्य तक पहुंचा, तो ये उनके लिए बहुत हानिकारक हो सकता है। सभी वानर महाकपि की इस बात से सहमत थे और उनकी आज्ञा का पालन करते थे, लेकिन एक दिन एक पका फल नदी में जा गिरा, जो पत्तियों के बीच छुपा हुआ था।

वह फल नदी में बहकर एक जगह पहुंच गया, जहां एक राजा अपनी रानियों के साथ घूम रहा था। फल की खुशबू इतनी अच्छी थी कि आनंदित होकर रानियों ने अपनी आंखें बंद कर ली। राजा भी इस खुशबू पर मोहित हो गया।  राजा ने अपने आसपास निहारा, तो उसे नदी में बहता हुआ फल दिखाई दिया। राजा ने उसे उठाकर अपने सिपाहियों को दिया और कहा कि कोई इसे खाकर देखे कि यह फल कैसा है। एक सिपाही ने उस फल को खाया और कहा कि ये तो बहुत मीठा है।

इसके बाद राजा ने भी उस फल को खाया और आनंदित हो उठा। उसने अपने सिपाहियों को उस पेड़ को खोज निकालने का आदेश दिया, जहां से ये फल आया था। काफी मेहनत के बाद राजा के सिपाहियों ने पेड़ को खोज निकाला। उन्हें नदी किनारे वो सुंदर पेड़ नजर आ गया। उस पर बहुत सारे वानर बैठे हुए थे। सिपाहियों को ये बात पसंद नहीं आई और उन्होंने वानरों को एक-एक करके मारना शुरू कर दिया। वानरों को घायल देखकर महाकपि ने समझदारी से काम लिया। उसने एक बांस का डंडा पेड़ और पहाड़ी के बीच पुल की तरह लगा दिया। महाकपि ने सभी वानरों को उस पेड़ को छोड़कर पहाड़ी की दूसरी तरफ जाने का आदेश दिया।

वानरों ने महाकपि की आज्ञा का पालन किया और वो सभी बांस के सहारे पहाड़ी के दूसरी ओर पहुंच गए, लेकिन इस दौरान डरे-सहमे बंदरों ने महाकपि को बुरी तरह से कुचल दिया। सिपाहियों ने तुरंत राजा के पास जाकर सारी बात बताई। राजा, महाकपि की वीरता से बहुत प्रसन्न हुए और सिपाहियों को आदेश दिया कि महाकपि को तुरंत महल लेकर आएं और उसका इलाज करवाएं। सिपाहियों ने ऐसा ही किया, लेकिन जब महाकपि को महल लाया गया, तब तक वह मर चुका था।

कहानी से सीख

वीरता और समझदारी हमें इतिहास के पन्नों में जगह देती है। साथ ही इस कहानी से यह भी सीख मिलती है कि हर मुश्किल घड़ी में समझदारी से काम लेना चाहिए।

छद्दन्त हाथी की कहानी | Chaddanta Elephant In Hindi

Chaddanta Elephant In Hindi-1

सदियों पहले की बात है हिमालय के घने जंगलों में हाथियों की दो खास प्रजातियां पाई जाती थीं। एक प्रजाती थी छद्दन्त और दूसरी प्रजाती का नाम था उपोसथ। इनमें से छद्दन्त प्रजाती काफी मशहूर थी। विशाल छह दांतों की मौजूदगी के कारण ही इन्हें छद्दन्त के नाम से पुकारा जाता था। इन हाथियों का सिर और पैर किसी मणि की तरह सुर्ख लाल दिखाई देते थे। इन छद्दन्त हाथियों का राजा कंचन गुफा में रहा करता था। उसकी महासुभद्दा और चुल्लसुभद्दा नाम की दो रानियां थीं।

एक दिन हाथियों का राजा अपनी दोनों रानियों के साथ पास के एक सरोवर में नहाने के लिए जाता है। उसी सरोवर के किनारे एक पुराना विशाल वृक्ष लगा हुआ था। उस वृक्ष पर लगे फूल बड़े ही खूबसूरत और मनमोहक खुशबू वाले थे। गजराज ने खेल-खेल में अपनी सूंड से उस वृक्ष की एक डाल को कसकर हिलाया। इससे डाल पर लगे फूल महासुभद्दा पर झड़ने लगे और वह गजराज से बहुत प्रसन्न हुई। वहीं, वृक्ष की सूखी डाल पुराना होने के कारण गजराज की सूंड का जोर झेल न सकी और टूटकर फूल समेत गजराज की दूसरी रानी चुल्लसुभद्दा के ऊपर जा गिरी।

हालांकि, यह घटना संयोगवश घटी, लेकिन इसे चुल्लसुभद्दा ने अपना अपमान माना और उसी वक्त गजराज के निवास को छोड़कर कहीं दूर चली गई। जब गजराज को इस बात का पता चला, तो उसने चुल्लसुभद्दा को बहुत ढूंढा, लेकिन वह कहीं नहीं मिली।

कुछ समय बाद चुल्लसुभद्दा की मौत हुई और मरने के बाद वह मद्द राज्य की राजकुमारी के रूप में पैदा हुई। युवा होने पर उसकी वाराणसी के राजा से शादी हुई और वह वाराणसी की पटरानी बनी। पुनर्जन्म के बाद भी वह छद्दन्तराज द्वारा भूलवश हुए उस अपमान को भूली नहीं और उसका बदला लेने का सोचती रही।

एक दिन मौका पाकर उसके वाराणसी के राजा को छद्दन्तराज के दांत हासिल करने के लिए उकसाया। परिणामस्वरूप कुछ कुशल निषादों के समूह को राजा ने गजराज के दांत लाने के लिए भेज दिया। गजराज के दांत लाने के लिए रवाना हुई टोली का नेता था सोनुत्तर।

सोनुत्तर करीब 7 साल का सफर तय करके गजराज के निवास पर पहुंचा। उसने गजराज को पकड़ने के लिए और अपना शिकार बनाने के लिए उसके निवास से कुछ दूरी पर एक बड़ा गड्ढा बनाया। गड्ढे को छिपाने के लिए उसने उसे पत्तियों और छोटी लकड़ियों से ढक दिया और खुद झाड़ियों में छिप गया।

जैसे ही गजराज उस गड्ढे के करीब आया, तो सोनुत्तर ने विष बुझा तीर निकाल कर छद्दन्तराज पर निशाना लगा दिया। तीर से घायल होने के बाद जब गजराज की नजर झाड़ियों में छिपे सोनुत्तर पर पड़ी, तो वह उसे मारने के लिए दौड़ा। चूंकि, सोनुत्तर संन्यासियों के वस्त्र पहनकर आया था। इस कारण गजराज ने सोनुत्तर को जीवनदान दे दिया।

गजराज से जीवनदान पाकर सोनुत्तर का मन बदल गया और उसने गजराज को सारी कहानी कह सुनाई और गजराज पर निशाना साधने का उद्देश्य बताया। जीवनदान मिलने के कारण सोनुत्तर गजराज के दांत नहीं काट सकता था, इसलिए छद्दन्तराज ने मृत्यु से पहले खुद ही अपने दांत तोड़ कर सोनुत्तर को दे दिए।

गजराज के दांत पाकर सोनुत्तर वाराणसी लौट आया और गजराज के दांत रानी के समक्ष रख दिए। साथ ही सोनुत्तर ने रानी को यह भी बताया कि किस तरह गजराज ने उसे जीवनदान देकर खुद अपने दांत दे दिए।

पूरी बात जानने के बाद रानी गजराज की मौत बर्दाश्त न कर सकी और इस सदमे से उनकी भी तुरंत मौत हो गई।

कहानी से सीख

बदले की भावना सोचने समझने की क्षमता छीन लेती है।

 दो हंसों की कहानी | The Story Of Two Swans

बहुत पुरानी बात है हिमालय में प्रसिद्ध मानस नाम की झील थी। वहां पर कई पशु-पक्षियों के साथ ही हंसों का एक झुंड भी रहता था। उनमें से दो हंस बहुत आकर्षक थे और दोनों ही देखने में एक जैसे थे, लेकिन उनमें से एक राजा था और दूसरा सेनापती। राजा का नाम था धृतराष्ट्र और सेनापती का नाम सुमुखा था। झील का नजारा बादलों के बीच में स्वर्ग-जैसा प्रतीत होता था।

उन समय झील और उसमें रहने वाले हंसों की प्रसिद्धी वहां आने जाने वाले पर्यटकों के साथ देश-विदेश में फैल गई थी। वहां का गुणगान कई कवियों ने अपनी कविताओं में किया, जिससे प्रभावित होकर वाराणसी के राजा को वह नजारा देखने की इच्छा हुई। राजा ने अपने राज्य में बिल्कुल वैसी ही झील का निर्माण करवाया और वहां पर कई प्रकार के सुंदर और आकर्षक फूलाें के पौधों के साथ ही स्वादिष्ट फलों के पेड़ लगवाए। साथ ही विभिन्न प्रजाती के पशु-पक्षियों की देखभाल और उनकी सुरक्षा की व्यवस्था का आदेश भी दिया।

वाराणसी का यह सरोवर भी स्वर्ग-जैसा सुंदर था, लेकिन राजा के मन में अभी उन दो हंसों को देखने की इच्छा थी, जो मानस सरोवर में रहते थे।

एक दिन मानस सरोवर के अन्य हंसों ने राजा के सामने वाराणसी के सरोवर जाने की इच्छा प्रकट की, लेकिन हंसाें का राजा समझदार था। वह जानता था कि अगर वो वहां गए, तो राज उन्हें पकड़ लेगा। उसने सभी हंसों को वाराणसी जाने से मना किया, लेकिन वो नहीं माने। तब राजा और सेनापती के साथ सभी हंस वाराणसी की ओर उड़ चले।

जैसे ही हंसों का झुंड उस झील में पहुंचा, तो अन्य हंसों को छोड़कर प्रसिद्ध दो हंसों की शोभा देखते ही बनती थी। सोने की तरह चमकती उनकी चोंच, सोने की तरह ही नजर आते उनके पैर और बादलों से भी ज्यादा सफेद उनके पंख हर किसी को अपनी ओर आकर्षित कर रहे थे।

हंसों के पहुंचने की खबर राजा को दी गई। उसने हंसों को पकड़ने की युक्ति सोची और एक रात जब सब सो गए, तो उन हंसों को पकड़ने कि लिए जाल बिछाया गया। अगले दिन जब हंसों का राजा जागा और भ्रमण पर निकला, तो वह जाल में फंस गया। उसने तुरंत ही तेज आवाज में अन्य सभी हंसों को वहां से उड़ने और अपनी जान बचाने का आदेश दिया।

अन्य सभी हंस उड़ गए, लेकिन उनका सेनापती सुमुखा अपने स्वामी को फंसा देख कर उसे बचाने के लिए वहीं रुक गया। इस बीच हंस को पकड़ने के लिए सैनिक वहां आ गया। उसने देखा कि हंसों का राजा जाल में फंसा हुआ है और दूसरा राजा को बचाने के लिए वहां खड़ा हुआ है। हंस की स्वामी भक्ति देखकर सैनिक बहुत प्रभावित हुआ और उसने हंसों के राजा को छोड़ दिया।

हंसों का राजा समझदार होने के साथ-साथ दूरदर्शी भी था। उसने सोचा कि अगर राजा को पता चलेगा कि सैनिक ने उसे छोड़ दिया है, तो राजा इसे जरूर प्राणदंड देगा। तब उसने सैनिक से कहा कि आप हमें अपने राजा के पास ले चलें। यह सुनकर सैनिक उन्हें अपने साथ राजदरबार में ले गया। दोनों हंस सैनिक के कंधे पर बैठे थे।

हंसों को सैनिक के कंधे पर बैठा देखकर हर कोई सोच में पड़ गया। जब राजा ने इस बात का रहस्य पूछा, तो सैनिक ने सारी बात सच-सच बता दी। सैनिक की बात सुनकर राजा के साथ ही सारा दरबार उनके साहस और सेनापती की स्वामी भक्ति पर हैरान रह गया और सभी के मन में उनके लिए प्रेम जाग उठा।

राजा ने सैनिक को माफ कर दिया और दोनों हंसों को आदर के साथ कुछ और दिन ठहरने का निवेदन किया। हंस ने राजा का निवेदन स्वीकार किया और कुछ दिन वहां रुक कर वापस मानस झील चले गए।

कहानी से सीख

किसी भी परिस्थिति में हमें अपनों का साथ नहीं छोड़ना चाहिए।

 रुरु मृग | The Story Of Ruru Deer In Hindi

The Story of Ruru Deer in hindi-1

एक समय की बात है, जब एक रुरु मृग हुआ करते थे। इस मृग का रंग सोने की तरह, बाल रेशमी मखमल से भी अधिक मुलायम और आंखें आसमानी रंग की होती थीं। रुरु मृग किसी के भी मन को मोह लेता था। यह मृग अधिक सुंदर और विवेकशील था और मनुष्य की तरह बात कर सकता था। रुरु मृग अच्छी तरह जानता था कि मनुष्य एक लोभी प्राणी है। फिर भी वह मनुष्य के प्रति करुणा भाव रखता था।

एक दिन रुरु मृग जंगल में सैर कर रहा था, लेकिन तभी वह किसी मनुष्य के चिल्लाने की आवाज सुनता है। जब वह मौके पर पहुंचता है, तो उसे नदी की धारा में एक आदमी बहता हुआ नजर आता है। यह देखकर मृग उसे बचाने के लिए नदी में कूद पड़ता है और डूबते व्यक्ति को उसके पैर पकड़ने की सलाह देता है, लेकिन वह व्यक्ति उसके पैर पकड़कर मृग के ऊपर ही बैठ जाता है। अगर मृग चाहता, तो उसे गिराकर पानी से बाहर आ सकता था, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया। वह स्वयं तकलीफ सहकर उस व्यक्ति को किनारे तक ले आता है।

बाहर आते ही व्यक्ति मृग को धन्यवाद कहता है, तो इस पर मृग कहता है “अगर तुम मुझे सच में धन्यवाद करना चाहते हो, तो किसी को यह मत बताना कि तुम्हें एक स्वर्ण मृग ने डूबने से बताया है।” मृग ने उसे कहा “अगर मनुष्य मेरे बारे में जानेंगे, तो वे मेरा शिकार करने की कोशिश करेंगे।” यह कहकर रुरु मृग जंगल में चला जाता है।

कुछ समय बाद उस राज्य की रानी एक सपना देखती है, जिसमें उसे रुरु मृग दिखाई देता है। रुरु मृग की सुंदरता को देखने के बाद रानी उसे अपने पास रखने की लालसा करने लगती है। इसके बाद रानी, राजा को रुरु मृग को ढूंढकर लाने के लिए कहती है। राजा बिना देरी किए नगर में ढिंढोरा पिटवा देता है कि जो कोई भी रुर मृग को ढूंढने में मदद करेगा, उसे एक गांव और 10 सुंदर युवतियां इनाम में दी जाएंगी।

राजा की यह सूचना उस व्यक्ति तक भी पहुंचती है, जिसे मृग ने बचाया था। वह व्यक्ति बिना समय गंवाए राजा के दरबार में पहुंच जाता है और रुरु मृग के बारे में राजा को बताता है। राजा और सिपाही सहित वह व्यक्ति जंगल की ओर चल पड़ता है। जंगल में पहुंचने के बाद राजा के सिपाही मृग के निवास स्थान को चारों तरफ से घेर लेते हैं।

जब राजा मृग को देखता है, तो खुशी से फूले नहीं समाता, क्योंकि वह मृग बिल्कुल वैसा ही था जैसा रानी ने बताया था। मृग चारों ओर से सिपाही से घिरा हुआ था और राजा उस पर बाण साधे हुए था, लेकिन तभी मृग राजा से मनुष्य की भाषा में कहता है “हे राजन तुम मुझे मार देना, लेकिन पहले मैं यह जानना चाहता हूं कि तुम्हें मेरी जगह का रास्ता किसने बताया।” इस पर राज ने उस व्यक्ति की ओर इशारा किया जिसकी जान मृग ने बचाई थी। उस व्यक्ति को देख कर मृग कहता है –

“निकाल लो लकड़ी के कुन्दे को पानी से,

न निकालना कभी एक अकृतज्ञ इंसान को।”

जब राजा ने मृग से इन शब्दों का मतलब पूछा, तो मृग ने बताया कि उसने इस व्यक्ति को डूबने से बचाया था। मृग की बातें सुनकर राजा के अंदर की इंसानियत जाग गई। उसे खुद पर शर्म आने लगी और क्रोध में उस व्यक्ति की ओर तीर का निशान कर दिया। यह देखकर मृग ने राजा से उस व्यक्ति को न मारने की प्रार्थना की। मृग की दया भावना देखकर राजा ने उसे अपने राज्य में आने का निमंत्रण दिया। मृग राजा के निमंत्रण पर कुछ दिन राजमहल में रहा और फिर वापस जंगल लौट गया।

कहानी से सीख

इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि हमें किसी का अहसान कभी नहीं भूलना चाहिए। चाहे वह इंसान हो या जानवर।

चांद पर खरगोश | The Hare On The Moon Story In Hindi

The Hare On The Moon Story In Hindi

बहुत समय पहले गंगा किनारे एक जंगल में चार दोस्त रहते थे, खरगोश, सियार, बंदर और ऊदबिलाव। इन सभी दोस्तों की एक ही चाहत थी, सबसे बड़ा दानवीर बनना। एक दिन चारों ने एक साथ फैसला लिया कि वो कुछ-न-कुछ ऐसा ढूंढकर लाएंगे, जिसे वो दान कर सकें। परम दान करने के लिए चारों मित्र अपने-अपने घर से निकल गए।

ऊदबिलाव गंगा तट से लाल रंग की सात मछलियां लेकर आ गया। सियार दही से भरी हांडी और मांस का टुकड़ा लेकर आया। उसके बाद बंदर उछलता-कूदता बाग से आम के गुच्छे लेकर आया। दिन ढलने को था, लेकिन खरगोश को कुछ नहीं समझ आया। उसने सोचा अगर वो घास का दान करेगा, तो उसे दान का कोई लाभ नहीं मिलेगा। यह सोचते-सोचते खरगोश खाली हाथ वापस चला गया।

खरगोश को खाली हाथ लौटते देख उससे तीनों मित्रों ने पूछा, “अरें! तुम क्या दान करोगे? आज ही के दिन दान करने से महादान का लाभ मिलेगा, पता है न तुम्हें।” खरगोश ने कहा, “हां, मुझे पता है, इसलिए आज मैंने खुद को दान करने का फैसला लिया है।” यह सुनकर खरगोश के सारे दोस्त हैरान हो गए। जैसे ही इस बात की खबर इंद्र देवता तक पहुंची, तो वो सीधे धरती पर आ गए।

इंद्र साधु का भेष बनाकर चारों मित्रों के पास पहुंचे। पहले सियार, बंदर और ऊदबिलाव ने दान दिया। फिर खरगोश के पास इंद्र देवता पहुंचे और कहा तुम क्या दान दोगे। खरगोश ने बताया कि वो खुद को दान कर रहा है। इतना सुनते ही इंद्र देव ने वहां अपनी शक्ति से आग जलाई और खरगोश को उसके अंदर समाने के लिए कहा।

खरगोश हिम्मत करके आग के अंदर घुस गया। इंद्र यह देखकर हैरान रह गए। उनके मन में हुआ कि खरगोश सही में बहुत बड़ा दानी है और इंद्र देव यह देख बहुत खुश हुए। उधर, खरगोश आग में भी सही सलामत खड़ा था। तब इंद्र देव ने कहा, “मैं तुम्हारी परीक्षा ले रहा था। यह आग मायावी है, इसलिए इससे तुम्हें कोई नुकसान नहीं पहुंचेगा।”

इतना कहने के बाद इंद्र देव ने खरगोश को आशीर्वाद देते हुए कहा, “तुम्हारे इस दान को पूरी दुनिया हमेशा याद करेगी। मैं तुम्हारे शरीर का निशान चांद पर बनाऊंगा।” इतना कहते ही इंद्र देव ने चांद में एक पर्वत को मसलकर खरगोश का निशान बना दिया। तब से ही मान्यता है कि चांद पर खरगोश के निशान हैं और इसी तरह चांद तक पहुंचे बिना ही, चांद पर खरगोश की छाप पहुंच गई।

कहानी से सीख:

किसी भी काम को करने के लिए दृढ़ शक्ति का होना जरूरी है।